सद्गुरुजी

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ध्यान व् समाधि एक प्राकृतिक प्रक्रिया

Posted On: 6 Aug, 2013 Religious में

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ध्यान व् समाधि एक प्राकृतिक प्रक्रिया.बहुत से लोग जो आध्यात्मिक उद्देश्य से मुझसे मिलने आतें हैं उनमे से अधिकतर यह कहतें हैं की मैं इतनी देर तक ध्यान लगाता हूँ. इतनी देर तक समाधि लगाता हूँ.मै उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ की ध्यान व् समाधि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है ये कोई कर्म नहीं जो आप करें.आप का प्रयास मात्र इतना होगा की आसन में बैठें.जैसे रात्रि में हम बिस्तर पर लेट जातें हैं और नींद स्वत:आती है.नींद को लाने का प्रयास करेंगें तो नींद दूर भागेगी.नींद इस्वर द्वारा निर्मित समाधि है जो रात भर में शारीर की शारीर थकान मिटा सुबह उठने पर नयी स्फूर्ति और नया जीवन प्रदान करती है.मै अपना अनुभव बताता हूँ.वर्षों पहले जब मै पूजा करता था तो पूजा करते करते भगवान के प्रति इतना प्रेम उत्पन्न होता था की भाव समाधि लग जाती थी न समय का पता और न शारीर की सुध बुध.ये मेरा निजी अनुभव है की जब तक आप सांसारिक लगाव नहीं कम करेंगें और परमात्मा से प्रेम नहीं होगा तब तक ध्यान समाधि लगेगी ही नहीं.पूजा शब्द का अर्थ है पूरी तरह से जाना यानि भगवान की शरण में पूरी तरह से जाना.इसी तरह से रोंजा शब्द है जिसका अर्थ है परमात्मा के निकट रोज जाना.ध्यान हो जाता है और समाधि लग जाती है.मेरे अनुभव से ध्यान समाधि एक ऐसा ईश्वरीय राज्य है जहाँ सब कुछ होता है कुछ करना नहीं पड़ता.जबकि ये बाहरी ससार माया का एक ऐसा राज्य है जहाँ सब कुछ करना पड़ता है.मनुष्य के भीतर ईश्वरीय साम्राज्य है.आप खाना पकाने और मुंह में चबाने तक कर्म करतें हैं और गले से नीचे जाने के बाद सबकुछ अपनेआप होता है.खाए हुए भोजन से रस.खून,मांस.हड्डी,रज और वीर्य सबकुछ स्वत:बनता है.परमात्मा के राज्य में रहने को ही भक्ति कहा जाता है और भगवान सिर्फ भक्तजनों के है बाकि सब का हिसाब कर्मानुसार माया करती हैभजन पर विचार कीजिये-ॐ जय जगदीश हरे.प्रभु जय जगदीश हरे.भक्जनों के संकट क्षण में दूर करें.अर्थात भक्त होना जरूरी है तभी भगवान सुनतें है.हरिओम तत्सत.((सद्गुरु राजेंद्र ऋषिजी प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम ग्राम-घमहापुर पोस्ट-कन्द्वा जिला-वाराणसी पिन-२२११०६)



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