सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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अवधू ऐसा ज्ञान न देखा-कबीर वाणी व्याख्या सहित

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अवधू ऐसा ज्ञान न देखा
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अवधू ऐसा ज्ञान न देखा।
पहले मोरी माई मरि गई,
पीछे जन्म हमारा।
बब्बा चले है व्याह करन को,
हमहूँ चले बरियाई।
अवधू ऐसा ज्ञान न देखा।

संत कबीर साहब के अनुसार पढ़ना और सुनना वास्तविक ज्ञान नहीं है। वास्तविक ज्ञान तो ये है कि ज्ञान को देख लिया जाये यानि महसूस कर लिया जाये। पहले त्रिगुणात्मक प्रकृति यानि सत,रज और तम रूपी मेरी माँ मरी, फिर मेरा जन्म हुआ। प्रकृति के गुणो से छुटकारा पाने के बाद ही व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरुप का दर्शन करता है। मेरे बब्बा यानि गुरुदेव महाराज ध्यान में बैठकर व्याह करने यानि परमात्मा से मिलने गए हैं। मैं भी जबर्दस्ती और बेमन से ध्यान लगाने की कोशिश कर रहा हूँ।
पांच भाई हम इक संग जन्मे,
चार को मरते देखा।
पांच पच्चीस भौजाई मरि गईं,
हमहीं लगावत लेखा।
अवधू ऐसा ज्ञान न देखा।

जन्म के साथ ही मुझे पांच भाई-शब्द,रूप,रस,गंध और स्पर्श मिले। हर मनुष्य को जन्म से ही ये पांचो भाई यानि प्रकृति के पांचों तत्वो के ये सूक्ष्म रूप प्राप्त होते हैं। प्रकृति के यही पांचों गुण मनुष्य को सांसारिक मायाजाल में फंसाये रखते हैं। संतजन कहते हैं कि हिरन प्रकृति के एक गुण गंध के पीछे भागकर अपनी जान गँवा बैठता है, फिर मनुष्य तो प्रकृति के इन पांचों गुणो के प्रति आसक्त होकर रातदिन भाग रहा है, उसकी क्या गति होगी ?
गुरु महाराज कबीर साहिब फरमाते हैं कि साधू जब भगवान की साधना में लीन होता है तो लगाव ख़त्म होते जाने के कारन उसे धीरे धीरे चार भाईयों यानि रूप, रस, गंध और स्पर्श से छुटकारा मिल जाता है। यही चारों भाईयों का मरना है। साधना में और आगे बढ़ने पर पांचों तत्वों और उनकी पच्चीस भौजाइयों अर्थात पांच तत्व, पांच उनके सूक्ष्मरूप, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ और प्राण, मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार आदि से छुटकारा मिल जाता है. इसका अनुभव भी किसी दूसरे को नहीं बल्कि साधू को स्वयं होता है। वास्तविक ज्ञान वही है जो हमारे अनुभव में उतर आये।
ईक चिउँटी के मृत्यु भये से,
नौ लाख गिद्ध अघाई।
कुछ खाईल, कुछ भुइंया गिरावल,
कुछ छकडन ले जाई।
अवधू ऐसा ज्ञान न देखा।

एक चिउँटी के मरने से नौ लाख गिद्धों का पेट भर जाये, ये बड़े आश्चर्य की बात लगती है। यहांपर गुरु महाराज कबीर साहिब अपनी सधुक्कड़ी भाषा में कह रहे हैं कि एक मन रूपी चिउँटी के मरने से नौ लाख इच्छा रूपी गिद्ध तृप्त हो जाते हैं अर्थात मन के मरने से इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं। साधना करने वाले व्यक्ति को कई जन्म-जन्मांतर के कुछ संस्कार भोगने पड़ते हैं, कुछ संस्कार गुरु की कृपा से समाप्त हो जाते है और कुछ संस्कार ईश्वर की दया से उसके द्वारा हर लिए जाते हैं। ये अनुभगम्य ज्ञान है, जिसे ईश्वर-पथ पर चलते वाला पथिक स्वयं अनुभव करता है।
संतोष तखत पर बन राजा,
विवेक की लगी है दरबानी।
जगमग ज्योति जरे घट भीतर,
मुक्ति भरे जहाँ पानी।
अवधू ऐसा ज्ञान न देखा।

साधना करने वाले व्यक्ति के मन में जब संतोष का भाव स्थायी रूप से आ जाता है तो वो अपने शरीर रूपी राज्य का राजा बन जाता है। उस व्यक्ति के मन के भीतर विवेक रूपी चौकीदार जागृत होकर हर पल उसकी काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार और ईर्ष्या-द्वेष से रक्षा करता है। ऐसा व्यक्ति अपने ही शरीर के भीतर स्वयं को और परमात्मा को प्रकाश के रूप में देखता है। शरीर ही वो काशी है, जिसके भीतर जीते जी मोक्ष पाया जा सकता है। ये सब अनुभवगम्य ज्ञान है, जो हमारी नर-नारायणी देह के भीतर ही दिखाई देगा। ये ज्ञान संसार में कहीं बाहर नहीं दिखेगा।
शून्य आईल,शून्य गईल,
शून्य भईल प्रवेशी।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
कमी रही न।
अवघू ऐसा ज्ञान न देखा।

गुरु महाराज कबीर साहिब कहते हैं कि मन जब शांत होकर शून्य की अवस्था में आ जाये और चित्तवृत्तियों का पूर्णत: निरोध हो जाये तब मनुष्य की चैतन्य आत्मा परमात्मा में प्रवेश कर जाती है। परमात्मा एक ऐसी अवस्था का नाम है, जहाँ पर न कोई कमी है और न कोई बेसी है अर्थात परमात्मा एक ऐसा अकाल पुरुष या स्थिर समय है, जहांपर न तो भूतकाल है और न ही भविष्यकाल है। परमात्मा निराकार और समय से परे है। परमात्मा रूपी ज्ञान को साधना करने वाले व्यक्ति अपने अनुभव के द्वारा देखते हैं। मानस में इसीलिए कहा गया है कि- जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता। ।।हरि ॐ तत्सत हरि ।।
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(सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी,प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम,ग्राम-घमहापुर,पोस्ट-कंदवा,जिला-वाराणसी.पिन-२२११०६)



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
February 10, 2014

कबीर उलट्वांसिया,उनके संत साहित्य की अमूल्य धरोहर है !सद्गुरु जी ,बहुत बहुत आपको बधाई !और साधुवाद !यह सारा साहित्य लगभग आज की हलचल भरी दुनिया से अनजाना सा हो गया है ! उसका साक्षात करा कर ,एक जागरूक ता ऐसे सत्साहित्य के प्रति जगा कर आपने एक पुनीत कार्य किया है !!सादर !!

sadguruji के द्वारा
February 10, 2014

आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ताजी,ब्लॉग पर आकर आपने में मेरे सदप्रयास की सराहना की,इसके लिए आपको ह्रदय से धन्यवाद.मेरी यह कोशिश आगे भी जारी रहेगी.पुन:आभार.

sanjay kumar garg के द्वारा
February 10, 2014

“पांच भाई हम इक संग जन्मे, चार को मरते देखा.पांच पच्चीस भौजाई मरि गईं,हमहीं लगावत लेखा” बहुत सुन्दर श्लोक आपने प्रस्तुत किये है, आदरणीय सद्गुरु जी! कबीर दास जी ने इंसान के शऱीर की “नश्वरता” पर लिखा है, “दस द्वारे का पिंजरा तामे पंछी कौन, रहे तो अचरज है मगर गये अचम्भा कौन” सद्गुरु जी, मैंने भी कबीर दास जी को थोड़ा सा पढ़ा है, हर एक दोहा, गागर में सागर है, अध्यात्म व् ज्ञान की गंगोत्री हैं कबीर दास जी के दोहे, अध्यात्मिक ज्ञान से भरे ब्लॉग के लिए धन्यवाद सद्गुरु जी!

sadguruji के द्वारा
February 10, 2014

आदरणीय संजयजी,इतनी सार्थक और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए आपको ह्रदय से धन्यवाद.मेरा उद्देश्य भी यही है कि संतों की वाणियों को लोगों तक भावार्थ सहित पहुंचाया जाये.

jklm के द्वारा
March 26, 2014

AADARNIYA GURUJ, PRANAM………MAINE SUCHITRA Q MAHAN HAI PADHA…..WO SACHMUCH YAH KAHLANE LAYAK HAIN………..MAIN UNHE KYA SAMBODHAN DUN????????SAMAJH NQHI AATA AAP HI THODA HINT KAR DIJIYE…..AUR UNHE V MERA PRANAM KAHIYEGA……….

sadguruji के द्वारा
March 26, 2014

आदरणीय jklm जी,आपने संस्मरण पढ़ा और आपको बहुत अच्छा लगा,इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद.सुचित्रा जी को किसी सम्बोधन की आवश्यकता नहीं है.सांसारिक दृष्टि से अड़तालीस साल की वो अधेड़ महिला आप सब के लिए माता के समान हैं.मेरे किसी से वो कोई मतलब भी नहीं रखती हैं.हम दोनों की ओर से सभी को आशीर्वाद-सब लोग स्वस्थ ओर सुख शांति से रहें.

RAVI के द्वारा
May 21, 2015

मन की आखे खोल दी है ज्ञान तो ज्ञान लेन के लिए विनम्रता की आवश्कता है \

sadguruji के द्वारा
May 23, 2015

आदरणीय रवि जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! कीमती समय निकालकर पोस्ट को पढ़ने और उसे पसंद करने के लिए हार्दिक आभार ! भविष्य में भी आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी !


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