सद्गुरुजी

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कामाख्या मंदिर में दिव्य माहवारी या हिन्दू समाज से छल

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कामाख्या मंदिर में दिव्य माहवारी या हिन्दू समाज से छल
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कामाख्या मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थ्ति है। ये मंदिर गुवाहाटी की नीलांचल पहाड़ियों में स्थित है। इस मन्दिर में मुख्य देवी कामाख्या के अलावा देवी काली के अन्य रूप जैसे धूमावती, मातंगी, बगला, तारा, कमला, भैरवी, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी और त्रिपुरा सुंदरी भी हैं। ये मन्दिर कामाख्या रूपी एक तांत्रिक देवी को समर्पित है। कलिका पुराण’ में शिव की युवा दुल्हन और मुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति को कामाख्या कहा गया है। ऐसी कथा हैं कि समाधिस्थ भगवान शिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जागने पर भगवान शिव ने उसे भस्म कर दिया था। भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत पर देवी शक्ति के जननांगों और गर्भ से कामदेव को भगवान शिव के श्राप से मुक्ति थी और उन्हें पुन नया जीवनदान व एक नया सुन्दर रूप मिला था, इसीलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से प्रसिद्द हुआ। कहा जाता है कि नया रूप पाने के बाद कामदेव ने ऋषि विश्वकर्मा से इस मंदिर का निर्माण कराया था और इसका नाम आनंदाख्य मंदिर रखा था, जो आगे चलकर कामाख्या हो गया।
संस्कृत भाषा में काम शब्द का अर्थ है प्रेम। ऐसी लोक मान्यता हैं कि इसी स्थान पर देवी सती और भगवान शिव के बीच प्रेम की शुरुआत हुई थी। उसी समय से ही यहाँ कामाख्या देवी की मूर्ति को रखा गया और उसकी पूजा शुरू हुई। पोराणिक मान्यता के अनुसार अपने पिता दक्ष के यज्ञ में शरीर-दहन करने वाली देवी सति के मृत देह का योनि भाग यहाँ पर गिरा था, इसलिए इस जगह पर सति यानि शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहां पर देवी-देवताओं की मूर्तियां सिंहासन पर रखी हुई हैं। मंदिर के भीतरी भाग से गर्भ-गृह की ओर जाने वाला एक संकरा रास्ता है, जिसे प्रद्क्षिणा-पथ भी कहते हैं। सीढयों से होकर नीचे गर्भ गृह में जाया जाता है। गर्भगृह में देवी की कोई मूर्ति नहीं है। वहां पर योनि के आकार का एक शिलाखंड है, जिसके ऊपर लाल रंग की गेरू के घोल की धारा गिराई जाती है। देवी का यह प्रतीक स्वरुप अंग हमेशा लाल कपड़े से ढ़्का रहता है। उस शिलाखंड के पास ही धरती में भीतरी योनि की आकृति की एक दरार है, जिससे एक फव्वारे की तरह जल निकलता है। श्रद्धालु उस जल को दिव्य मानते हुए उसकी पूजा करते हैं।
इस मंदिर में प्रतिवर्ष ‘अम्बूवाची’ पर्व का आयोजन होता है। लाखों लोंगो के एकत्रित होने से इस विशाल मेले को कामरूपों का कुंभ भी कहा जाता है। इसमें देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के ज्योतिषी, साधु और तांत्रिक हिस्‍सा लेते हैं। शक्ति के ये उपासक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बूवाची’ मेले’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। कामाख्या देवी मंदिर में अम्बुबाची मेला’ इस वर्ष सन २०१५ में २२ जून से प्रारम्भ होकर २६ जून तक आयोजित हुआ। इस मेले में दस लाख से भी ज्यादा देशी-विदेशी लोंगो के शामिल होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इस मेले में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना हेतु, सभी प्रकार की सिद्धियाँ एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी बहुत बड़ी संख्या में आने वाले तांत्रिकों-मांत्रिकों, साधुओं और अघोरियों का बहुत विशाल जमघट लगा था। ऐसा माना जाता हैं कि अम्बूवाची पर्व पर विभिन्न प्रकार की दिव्य आलौकिक शक्तियों का अर्जन किये हुए तंत्र-मंत्र में पारंगत साधक अपनी-अपनी मंत्र-शक्तियों को पुरश्चरण अनुष्ठान कर स्थिर और सुरक्षित करते हैं।
कामाख्या देवी मंदिर वाममार्ग साधना का सर्वोच्च पीठ माना जाता है। कहा जाता है कि मछन्दरनाथ, गोरखनाथ, लोनाचमारी, ईस्माइलजोगी इत्यादि तंत्र साधक जो सांवर तंत्र में अपना विशेष स्थान बनाकर अमर हो गये हैं, वो सब यही पर अपनी तंत्र साधना पूर्ण किये थे। इस वर्ष मनाये गए अम्बूवाची पर्व के दौरान २२, २३ और २४ जून को देवी को दिव्य माहवारी हुई। देवी की दिव्य माहवारी के दौरान तीन दिन के लिए मंदिर का द्वार बंद कर दिया गया। चौथे दिन विशेष पूजा-अर्चना के पश्चात मंदिर के बंद कपाट खुलेे। बहुत से साधुओं और तांत्रिकों के अनुसार अम्बूवाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार अम्बूवाची पर्व के दौरान माँ भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भ गृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर तीन दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है।
करोड़ों हिन्दू कलिकाल में इसे एक अद्भुत आश्चर्य का विलक्षण नजारा मानते है। इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा (योनि के आकार का शिलाखंड) पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं। मंदिर के पुजारियों द्वारा मनमानी दक्षिणा लेकर ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं। बहुत से ज्योतिषी, साधू और तांत्रिक यहीं से ये वस्त्र खरीदते हैं और उसे अपने यहाँ ले जाकर उस वस्त्र के छोटे छोटे टुकड़े कर उसे ‘कमिया सिंदूर’ और ‘कमिया वस्त्र’ आदि नामों से मनमाने दामों पर बेचते हैं। मेरे एक ब्रह्मलीन गुरुदेव इसे ढोंग-पाखंड और कमाने-खाने का एक घटिया धंधा कहते थे। वो कहते थे कि किसी पत्थर को मासिक धर्म हो ही नहीं सकता है। उनके अनुसार उन्होंने अपनी युवावस्था में बकायदे इसकी खीजबीन भी की थी और छानबीन करने पर उन्होंने सत्य यह पाया था कि देवी को दिव्य माहवारी की बात झूठी है। जिसे लोग दिव्य माहवारी समझते हैं, वो दरअसल वहां पर काटे गए निरीह और बेजुबान पशुओं का खून होता है।
वो हमेशा यही कहते रहे कि सरकार को एक निष्पक्ष जांच कराकर इस झूठे अन्धविश्वास की सच्चाई आम जनता के सामने उजागर करनी चाहिए। यदि पूज्य गुरुदेव की बात सत्य साबित होती है तो यह करोड़ों हिन्दुओं के साथ की जा रही एक बहुत बड़ी धार्मिक ठगी सिद्ध होगी। ऐसी लोक मान्यता है कि कामाख्या देवी को मासिक धर्म होने के समय उनके दिव्य रक्त से ब्रह्मपुत्र नदी भी लाल हो जाती है। हालाँकि इस बात का कोई पौराणिक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि सालभर में एक बार होने वाली देवी के रजस्वला रक्त से ही नदी लाल होती है। बहुत से स्थानीय लोंगो का कहना है कि देवी के रजस्वला होते ही ब्रह्मपुत्र नदी में कामाख्या देवी मंदिर के पुजारियों द्वारा सिन्दूर डाल दिया जाता है जिससे नदी का पानी लाल रंग का प्रतीत होता है। यदि यह सत्य है तो लाखों-करोड़ों आस्थावान हिन्दू समाज के साथ धर्म के नाम पर किया जाने वाला इससे बड़ा छल-कपट और क्या हो सकता है? फिर तो देवी के रजस्वला होने या दिव्य माहवारी होने की बात भी झूठी साबित होगी। धर्म के नाम पर सदियों से ये ढोंग-पाखंड और ठगी हो रही है।
कहते हैं कि इन्ही सब बातों का खुलासा होने पर १६वीं सदी में इस मंदिर को नष्ट कर दिया गया था। आगे चलकर फिर १७वीं सदी में में कूच बिहार के हिन्दू राजा नर नारायण द्वारा इस मंदिर को पुन: बनवाया गया था। कामाख्या देवी को बहते हुए खून की देवी भी कहा जाये तो कोई गलत बात नहीं होगी। वहां पर रोज ही निरीह और बेजुबान पशुओं का रक्त पानी की तरह से बहता है। कामाख्या मां को रोज ही अनगिनत काले रंग के नर भैंसे, बकरी, बन्दर, कछुए, कबूतर और मछली इत्यादि की बलि चढ़ाई जाती है। प्राचीन काल में देवी को प्रसन्न करने के लिए आदमियों और नवजात शिशुओं की बलि भी चढाई जाती थी। बहुत से समाज सेवकों के विरोध करने पर और धीरे धीरे लोगों के जागरूक होने पर इस प्रथा को बंद कर दिया गया। सन १९९० की बात बात है। मै और मेरे एक मित्र कुछ काम से गुहाटी गये थे। कामाख्या देवी का हमने बहुत नाम सुना था, अतः उनके दर्शन करने का हमने विचार बनाया। हमलोग प्रात: पांच बजे नित्य क्रियाओं से निपट कामाख्या मंदिर का दर्शन करने गए।
वहाँ पर मंदिर के प्रांगण में पशुओं की बलि होते देख मेरा मन बहुत दुखी हो गया। मै सोचने लगा- ये कैसी माँ है, जिसके सामने रोज सैकड़ों पशुओं का खून पानी की तरह से बहता है और इसे बिलकुल भी दया नहीं आती है। इतना बड़ा खूनखराबा और इतनी बड़ी क्रूरता सबकुछ चुपचाप देखती है। हम लोग जल्दी से दर्शन कर मंदिर के बाहर निकल आये। मेरा मन बहुत दुखी और खिन्न हो गया था। ऐसे हिंसक हिन्दू धर्म से घृणा सी हो गई थी। उस क्षण मुझे सभी धर्मों से अच्छा बौद्ध धर्म लगा। इस मंदिर में मादा पशुओं की बलि नहीं दी जाती है, लेकिन नर पशुओं पर कोई दया नहीं की जाती है। आद्य-शक्ति कामाख्या देवी के कौमारी रूप में सदा विराजमान होने से सती स्वरूपिणी आद्यशक्ति महाभैरवी कामाख्या तीर्थ को विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी कहा जाता है, क्योंकि इस शक्तिपीठ में कौमारी-पूजा अनुष्ठान में आद्य-शक्ति की प्रतीक सभी कुल व वर्ण की कौमारियाँ वंदनीय और पूजनीय मानी जाती हैं। उसमे किसी जाति का भेद नहीं होता है। कहा जाता है कि कौमारी पूजन में वर्ण-जाति का भेद करने पर साधक की सिद्धियां नष्ट हो जाती हैं। इंद्र को ऐसा करने पर स्वर्ग के सिंहासन से हाथ धोना पड़ा था।
इस मंदिर कि सबसे बड़ी विशेषता यही समझ में आती है कि जगत जननी कामाख्या देवी की दिव्य माहवारी स्त्री की मासिक माहवारी के महत्व को दर्शाता है और हमें ये बताता है कि इस ब्रह्माण्ड की जननी होने के कारण स्त्री का सम्मान करना चाहिए। मासिक चक्र के दौरान उसे अपवित्र और अछूत मान उसके साथ बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए, जैसा कि हिन्दू ही नहीं बल्कि सभी धर्म वाले करते हैं। बहुत से लोग यह कुतर्क देते हैं कि जैसे शिवलिंग पर उसकी दिव्यता के कारण जल चढ़ता हैं, आम आदमी के लिंग की वैसी पूजा नहीं होती हैं, वैसे ही भगवती कामाख्या देवी की माहवारी दिव्य होने के कारण पूजनीय हैं और आम महिलाओं की माहवारी एक सामान्य प्राकृतिक बात होने के कारण पूजनीय नहीं हैं। कोई उनसे ये पूछे कि इस सृष्टि को प्रत्यक्ष रूप में कौन आगे बढ़ा रहा हैं, शरीरधारी एक आम स्त्री या फिर कोई काल्पनिक देवी, जिसे लोग प्रगट रूप में देख और जान भी नहीं सकते हैं। यदि इस बारे में मेरी राय पूछी जाये तो मैं प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान एक आम स्त्री के साथ खड़ा होना पसंद करूंगा। मेरी आत्मा मुझसे ऐसा ही करने को कहेगीा।
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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी.पिन- २२११०६)
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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
July 24, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आपने कमाख्या देवी के प्रसंग को ले कर लेख लिखा है मैं आस्था पर कुछ कहना नहीं चाहती क्योंकि यह वहां के लोगों का विशवास है हाँ आपने बड़ी खूबसूरती से इस प्रसंग के हर विषय का स्पष्टीकरण किया हैं लेख के अंत मैं इस प्रसंग का बहुत अच्छा विवेचन किया है मैने पहली बार आसाम के विशवास को जाना है

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! धर्म और आस्था के नाम पर करोड़ों हिन्दुओं से किये जा रहे छल-प्रपंच को देखते हुए ही यह लेख लिखा ! लेख के अंत में किसी देवी की बजाय किसी सामान्य स्त्री के साथ मैंने खड़ा होना पसंद किया ! बहुत भावुक हो गया था वहां पर ! लेख लिखने के साथ साथ पूरी शिद्दत के साथ उसे जीता भी हूँ ! सदा की भांति सहयोग और समर्थन देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

इस पर्व में मां भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह स्थित महामुद्रा (योनि के आकार का शिलाखंड) पर सफेद वस्त्र चढ़ाये जाते हैं, जो कि रक्तवर्ण हो जाते हैं।

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

मंदिर के पुजारियों द्वारा मनमानी दक्षिणा लेकर ये वस्त्र प्रसाद के रूप में श्रद्धालु भक्तों में विशेष रूप से वितरित किये जाते हैं।

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

बहुत से ज्योतिषी, साधू और तांत्रिक यहीं से ये वस्त्र खरीदते हैं और उसे अपने यहाँ ले जाकर उस वस्त्र के छोटे छोटे टुकड़े कर उसे ‘कमिया सिंदूर’ और ‘कमिया वस्त्र’ आदि नामों से मनमाने दामों पर बेचते हैं।

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

मेरे एक ब्रह्मलीन गुरुदेव इसे ढोंग-पाखंड और कमाने-खाने का एक घटिया धंधा कहते थे। वो कहते थे कि किसी पत्थर को मासिक धर्म हो ही नहीं सकता है।

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

उनके अनुसार उन्होंने अपनी युवावस्था में बकायदे इसकी खीजबीन भी की थी और छानबीन करने पर उन्होंने सत्य यह पाया था कि देवी को दिव्य माहवारी की बात झूठी है।

sadguruji के द्वारा
July 24, 2015

पूज्य गुरुदेव के अनुसार जिसे लोग देवी की दिव्य माहवारी समझते हैं, वो दरअसल वहां पर काटे गए निरीह और बेजुबान पशुओं का खून होता है। सति अपने पिता के यज्ञ में कूदकर अपने शरीर का दहन कर लीन थीं और मृत हो गईं थीं ! मृत देह को मासिक धर्म नहीं हो सकता है ! इस समय तो वहां पर मृत देह भी नहीं, मात्र एक शिलाखंड है ! हिन्दू जनमानस को इस अन्धविश्वास, छल-प्रपंच और उनकी धार्मिक भावनाओं से हो रही व्यावसायिकता को समझ इससे दूर ही रहना चाहिए !

rajuahuja के द्वारा
July 24, 2015

123

rajuahuja के द्वारा
July 24, 2015

पोस्ट नहीं हो रहा !

rajuahuja के द्वारा
July 24, 2015

पोस्ट ???

sadguruji के द्वारा
July 25, 2015

आदरणीय राजू आहूजा जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
July 25, 2015

आदरणीय राजू आहूजा जी ! ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद ! आप कॉमेंट भेजिए !

sadguruji के द्वारा
July 25, 2015

आदरणीय राजू आहूजा जी ! इस मंच की नई व्यवस्था के अनुसार अब आपका कमेंट सीधे प्रकाशित नहीं होगा ! कमेंट आप भेज सकते हैं, परन्तु उसे प्रकाशित करने का अधिकार अब लेखक के पास होगा !

San के द्वारा
July 26, 2015

बीच की कुछ पंक्तियों में आपने लिखा की ऐसे हिसक हिन्दू धर्म से मुझे घृणा हो गयी और सबसे अच्छा बौद्ध धर्म लगा. लेकिन हिन्दू धर्म के ही अनेको ऐसे स्थान है जहा इस तरह की बलि निषिद्ध है लेकिन उनके बारे में आपने कुछ नहीं लिखा. आपको भी ज्ञात है की यह वाममार्गी लोगो की सिद्धि का स्थान है तो फिर सिर्फ एक ही स्थान की वजह से पूरे हिन्दू धर्म के बारे में इस तरह की बात कैसे कर सकते है.

Sudasa के द्वारा
July 26, 2015

Try to reveal another Places…like you become saint in india….

sadguruji के द्वारा
July 27, 2015

आदरणीय सुदासा जी ! ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद ! बहुत सी ऐसे धार्मिक जगहे हैं, जहाँ पर उस जगह का महत्व बढ़ाने के लिए और उसे व्यावसायिक रूप देने के लिए ढोंग पाखण्ड जारी है ! ये हिन्दू जन मानस की धार्मिक भावनाओं से छल है ! हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए समूचे हिन्दू समाज को एकजुट होना होगा और हिन्दू समाज में फैलीं तरह तरह की बुराइयो को दूर करना होगा ! रही बात संत बनने की तो उस विषय में बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि मेरे लिए बस इतना ही काफी है कि मै आजीवन उस हृदयस्थ भगवान का भक्त बना रहूँ, जिसका अनुभव मैंने अपने भीतर किया है ! प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 27, 2015

आदरणीय सान जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! इसमें कोई संदेह नहीं कि हिन्दू दर्शन सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में जब हम इसकी कमियां और बुराइयां देखते हैं तो हिन्दू धर्म के खिलाफ विचार उठने स्वाभाविक हैं ! रही बात धर्म परिवर्तन की तो आप निश्चिन्त रहे ! हर धर्म के अनगिनत लोंगो से मेरा परिचय है, परन्तु मैं हिन्दू धर्म छोड़ के भागने वाला नहीं हूँ ! इसी में रहकर इसकी बुराइयों और कमियों को दूर करेंगे और हिन्दू धर्म को सर्वश्रेष्ठ बनाएंगे ! प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 27, 2015

सद्र गुरु जी नइ राह  पर बधाइ ,,,गतानुगति को लोकः …..दुखी पीड़ित मनुष्य यही समझता है | जो सब कर रहे हैं वाही धर्म होता होगा | वैसा ही करने मैं क्या बुराई है | वेद उपनिषद ,शाश्त्र तर्क सांगत होते हैं । विज्ञान ही हैं यह । किंतु भेड चाल तो अंध भक्ति ही होकर ओम शांति शांति का भास कराती है । 

sadguruji के द्वारा
July 27, 2015

आदरणीय हरीश चन्द्र शर्मा जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! नई रह पर चलने के लिए आपने बधाई दी है ! मेरे लिए यह नई राह नहीं थी ! दरअसल राह तो पुरानी थी, पर उसका स्वरूप बिगड़ गया था ! कुछ सुधार की जरुरत है ! इसी दृष्टिकोण से इस लेख के रूप में एक मौज बह गई ! जानता हूँ इतनी जल्दी कुछ सुधार नहीं होगा, पर बीज तो बो सकते हैं ! ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार !

manoj verma के द्वारा
July 29, 2015

जनाब, किसी मुस्लिम धर्म के आडम्बर पर कटाक्ष कर के तो देखिये..

sadguruji के द्वारा
July 29, 2015

आदरणीय मनोज वर्मा जी ! ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद ! आडम्बर कहीं भी हो, उसका विरोध होना चाहिए और ऐसा हो भी रहा है ! दूसरे के घर पर नजर डालने से पहले हम अपना घर तो ठीक कर लें ! हिन्दू धर्म से प्रेम का ये मतलब नहीं कि हम अपनी कमियों और बुराइयों पर नजर ही न डालें ! विश्व गुरु के स्तर तक पहुंचना है तो हिन्दू धर्म में सुधार भी जरुरी है, ताकि विश्व समुदाय हमारे दर्शन ही नहीं बल्कि व्यवहार से भी प्रभावित हो ! उम्मीद है कि सिर्फ भावना में बहने की बजाय लेख की गंभीरता को आप समझेंगे ! प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार !

Uma Shankar Parashar के द्वारा
July 31, 2015

इस्लाम को छोड़कर संसार के लगभग सभी धर्म इंसान को बुराइयों से दूर रहते हुए एक अच्छा इंसान बनकर दूसरों से मेलमिलाप और भाईचारे के साथ रहने की ही प्रेरणा देते हैं। आप अपने को सद्गुरु समझते हैं, तो इतना तो आप को भी पता होगा कि स्वयं रामायण में भी भय बिन होए न प्रीति का जिक्र है। अर्थात ईश्वर और माता-पिता का डर यदि मन में न हो, तो बच्चे उद्दंड एवं उच्छृंखल हो जाते हैं। जैसे आज के इस तथाकथित आधुनिक हिन्दू समाज में भी माता-पिता पर आश्रित रहते बच्चों के चरित्र का पतन इतनी आसानी से नहीं होता, क्यूँकि उनके मन में माता-पिता के रुष्ट हो जाने का स्वाभाविक डर होता है, लेकिन जब वो बच्चे कुछ बड़े हो जाते हैं, तो अपनी मनमर्ज़ी करने लगते है, क्यूंकि तब वो इस बात के प्रति आश्वस्त हो चुके होते हैं कि माता-पिता द्वारा घर से निकाले जाने पर भी वह कोई काम करके अपना भरण-पोषण करने में समर्थ हो जायेंगे। जैसा कि पाश्चात्य सभ्यता(जिसमें किशोरावस्था में ही सभी मर्यादाओं को तिलांजलि दे दी जाती है और विवाहपूर्व व् विवाहेतर चारित्रिक पतन को भी सामान्य समझा जाता है) पर चलने वाले अधिकांश पश्चिमी देशों में 100% बच्चे अपनी किशोरावस्था में ही अपना कौमार्य गँवा चुके होते हैं और उनमें से 90% से भी अधिक बच्चे किशोरावस्था में ही अपना घर बार स्थाई रूप से त्याग देते हैं। कमोबेश यही हाल आजकल भारत में बड़े कहे जाने वाले घरों में भी अब देखने को मिल रहा है। उसी प्रकार जिन्हे आप ढोंग या अंधविस्वास बता रहे हैं, दरअसल ऐसे ही रीतिरिवाजों ने अधिकांश इंसानों को भगवान का भय दिखाकर इंसान से हैवान बनने से रोका हुआ है। इंसानियत आज भी कहीं बाकी है, तो वो केवल इन्ही धर्म-भीरु लोगों में बाकी है, वरना आप ही बताईये कि इस तथाकथित आधुनिकता ने इंसानों के गिरे हुए चरित्र और मानव मूल्यों के पतन के सिवा समाज को दिया ही क्या है? धर्म का मज़ाक उड़ाने वाले इन्हीं आधुनिक कहे जाने वाले लोगों में जानवरों की भांति विवाहपूर्व व् विवाहेतर पर स्त्री-पुरुष से सम्बन्ध बनाना आज एक आम बात समझी जानी लगी है। इन्हीं लोगों में सभी नैतिकता को त्यागकर भाई-बहन, बाप-बेटी और यहाँ तक की माँ-बेटे के बीच भी उजागर हुए शारीरिक सम्बन्ध समय समय पर समाज की आत्मा तक को झिझोंड कर रख देते हैं। और तो और क्या साधु-सन्यासी नहीं इससे अछूते बचे हैं, क्या वो नहीं भटकते? कौन जाने कि आप भी उन्हीं भटके हुए लोगों में से एक हों? जिसे आप अन्धविश्वास कह रहे हो, वो भला किस धर्म में नहीं हैं?

Uma Shankar Parashar के द्वारा
July 31, 2015

मैं जानता हूँ कि आपको मेरे कमेंट में लिखी चुभती हुई सच्ची बातें आपको उसे प्रकाशित करने से अवश्य रोक देंगी, क्यूंकि कटु सत्य हर किसी को आसानी से हज़म ही नहीं होता। इसके बावजूद, इस पोस्ट के प्रत्युत्तर में मैंने अपना कमेंट आपको भेज दिया है। आप एक सच्चे सद्गुरु की भांति आलोचनात्मक कटु सत्य को स्वीकारते हुए मेरे कमेंट को प्रकाशित भी करके अपने उचित जवाब से मुझे भी संतुष्ट करते करेंगे।

sadguruji के द्वारा
July 31, 2015

आदरणीय उमा शंकर पराशर जी ! ब्लॉग पर आपका स्वागत है ! परिवतन प्रकृति का नियम है ! एक समय तो वहां पर नर बलि और शिशु बलि तक दी जाती थी ! क्या धर्म के नाम पर वो भी जायज था ! धर्म वस्तुतः है क्या, इसे समझने के लिए आप से आग्रह है कि स्वामी अड़गड़ानंद जी के द्वारा रचित ‘यथार्थ गीता’ पढ़िए, जो प्रधानमंत्री जी ने कई देशों के प्रधानमंत्रियों को उपहार स्वरुप दिया है ! ये इंटरनेट पर भी उपलब्ध है ! लोंगो अँधेरे में रखने वाले और ठगने वाले आडम्बर धर्म नहीं है, ये सब धर्म को कलंकित कर रहे हैं ! हर धर्म में ऐसे बुद्धिजीवी मौजूद हैं, जो अपने धर्म की कमियों और बुराइयों को दूर करने का प्रयास कर रहे हैं ! हिन्दू धर्म भी इससे अछूता नहीं है ! रोज बहुत से हिन्दू मिलने के लिए आते हैं, जो धर्म के मामले कभी आप से भी ज्यादा कट्टर थे, परन्तु आज वो परमात्मा रूपी सच्चे धर्म से परिचित हैं ! जागे हुए लोंगो को गिरा हुआ बताकर आत्मा- परमात्मा का अपमान मत कीजिये ! आप दूसरों को गिरा हुआ बताकर स्वयं बड़े नहीं हो जायेंगे ! अपने बौद्धिक स्तर को उन्नत बनाइये और इस बात की खोज कीजिये की वास्तव में धर्म है क्या ? शुभकामनाओं सहित !

sadguruji के द्वारा
July 31, 2015

आदरणीय उमा शंकर पराशर जी ! ब्लॉग पर आपका स्वागत है ! शिष्टाचार का पालन करते हुए यदि आप कमेंट भेजंगे तो इस ब्लॉग पर आप का हमेशा हार्दिक स्वागत होगा और कमेंट का जबाब भी जरूर मिलेगा ! कमेंट जागरण मंच द्वारा अब सेंसर किया जा रहा है, जो बहुत हद तक उचित भी है ! आप कमेंट क्यों कर रहे हैं, ये कमेंट भेजने वाले को,भी ज्ञात होना चाहिए ! कमेंट में केवल अपनी अज्ञानता, धार्मिक कट्टरता और अपना अहंकार भर प्रदर्शित मत कीजिये ! कोई जानकारी चाहिए तो शिष्टाचार पूर्ण ढंग से पूछिये, जबाब जरूर मिलेगा ! ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 5, 2015

वहाँ पर मंदिर के प्रांगण में पशुओं की बलि होते देख मेरा मन बहुत दुखी हो गया। मै सोचने लगा- ये कैसी माँ है, जिसके सामने रोज सैकड़ों पशुओं का खून पानी की तरह से बहता है और इसे बिलकुल भी दया नहीं आती है। इतना बड़ा खूनखराबा और इतनी बड़ी क्रूरता सबकुछ चुपचाप देखती है। हम लोग जल्दी से दर्शन कर मंदिर के बाहर निकल आये। मेरा मन बहुत दुखी और खिन्न हो गया था |———–मै भी २०१० में कामाख्या देवी के दर्शन करने गई थी तो यही विचार आये थे थालियों में छोटे बकरी के बच्चों के कटे हुए सर सजा कर देवी का पूजन करने ले जा रहे थे ,चेतना जाग्रत करने वाला आलेख आदरणीय सद्गुरुजी .

sadguruji के द्वारा
August 6, 2015

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सादर अभिनन्दन ! ब्लॉग पर आपका स्वागत है ! मंच पर आपकी उपस्थिति अब काफी कम हो गई है ! आप जैसे कवि और बुद्धिजीवी ब्लागरों की अनुपस्थिति मंच को बहुत महसूस होती है ! पोस्ट को पसंद करने और प्रतिक्रिया देने के लिए आभार ! बहुत पहले चौबीस साल की उम्र में कामाख्या गया था ! वहां पर होने वाली जीव हत्या देख ऐसा मन खराब हुआ कि वहां दुबारा फिर कभी नहीं गया ! ये पोस्ट सामाजिक चेतना जगाने के उद्देश्य से ही लिखी गई है ! आपके सहयोग एवं समर्थन का ह्रदय से आभारी हूँ !

jlsingh के द्वारा
July 25, 2016

आदरणीय सद्गुरु जी, इस क्रांतिकारी आलेख के लिए आप बधाई के पात्र हैं… धर्म के नाम पर विभिन्न समुदायों में इस तरह के अन्धविश्वास को मान्यता मिली हुई है. …अब लोग अंधश्रद्धा में लोग leen हैं तो हमलोग क्या कर सकते हैं… aapne jagane ka kaam kiya है इसलिए आपको कोटिश: अभिननदन!


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