सद्गुरुजी

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संतों सतगुरु अलख लखाया: गुरुपूर्णिमा समारोह का आयोजन

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प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम में गुरु-पूर्णिमा महोत्सव का आयोजन
वाराणसी में घमहापुर (कंदवा) स्थित प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम में गुरु-पूर्णिमा महोत्सव का शुभारम्भ प्रातः ११ बजे आश्रम के भक्तों द्वारा गए भजनों से हुआ। प्रमुख भजन गायकों में श्री त्रिलोकीनाथ पाण्डेय, अशोक मौर्य, रामकीर्ति, शिवशंकर सिंह, सूरज भक्त, शिवशंकर दूबे, ब्रजभूषण गिरी आदि रहे। भजन गायन कार्यक्रम के अंत में श्रीमती दुर्गा देवी वर्मा ने बहुत मधुर स्वर में संत मीराबाई का ये भजन सुनाकर उपस्थित जन-समूह को भाव-विभोर कर दिया-
पायो जी मैने राम रतन धन पायो
वस्तु अमोलिक दी मेरे सत्गुरु
किरपा कर अपनायो – पायो जी मैने..
सत की नाव खेवटिया सत्गुरु
भवसागर तरवायो- पायो जी मैने..

दोपहर १२ बजे आश्रम के आसपास और बहुत सुदूर क्षेत्रों से भी एकत्रित सतसंगियों की भीड़ के बीच प्रवचन करते हुए आश्रम के आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक श्री राजेन्द्र ऋषि जी ने कहा, “परमात्मा सत्य है, परन्तु एक ऐसा सत्य जिसका अनुभव कर पाना जीव के लिए सरल नहीं है। सत्य और अलख (आँखों के द्वारा जो न दिखे) रूपी परमात्मा का अनुभव प्राप्त करने के लिए जिस शरीरधारी गुरु की जरुरत पड़ती है, उसे सतगुरु कहा जाता हैै। संत कबीरदास जी ने उस सतगुरु के बारे में कहा है-
सतगुरु अलख लखाया,
साधू भाई सतगुरु अलख लखाया।
परम प्रकाश पुंज ज्ञान धन
घट भीतर दर्शाया।
साधू भाई..
जप, तप, नेम, व्रत और पूजा
सब जंजाल छुड़ाया।
रे साधू भाई..
कहे कबीर, कृपाल कृपा कर
निज स्वरुप दर्शाया।
साधू भाई सतगुरु अलख लखाया।”

उन्होंने अपने प्रवचन में आगे कहा, “मानव शरीर एक ऐसा दिव्य मंदिर है, जिसमे आत्मा-परमात्मा रूपी परम इष्ट का निवास है। अतः शरीर रूपी दुर्लभ प्राकृतिक एवं ईश्वरीय कृति के प्रति वैसी ही श्रद्धा का भाव मन में रखना चाहिए, जैसी श्रद्धा हम मंदिर और मस्जिद के प्रति रखते हैं। शरीर रूपी परम पवित्र मंदिर में मांस, मदिरा, पान, बीड़ी, सिगरेट, गुटका व् अन्य नशीली तथा तामसिक चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
ये त्यागने योग्य तामसिक चीजें शरीर के भीतर रोग रूपी विकृति पैदा करती हैं। शरीर रूपी प्रकृति की भयावह विकृति कैंसर जैसे रोग में होती है, जिसे देखकर आपकी रूह कांप रूठेगी और कई दिन तक नार्मल नहीं रह पाएंगे। आप अपने शरीर की कद्र करना सीखिये। ईश्वर की जो प्रतीक मात्र मंदिर मस्जिद आदि है, उसमे आप हाथ पैर धोकर श्रद्धा भाव के साथ प्रवेश करते हैं और जिस शरीर के भीतर वास्तव में आत्मा-परमात्मा हैं, उसकी दिन रात बेकद्री करते हैं।”
अपने विस्तृत प्रवचन के दौरान वर्मान जीवन शैली की चर्चा करते हुए संत राजेन्द्र ऋषि जी ने कहा, “इस मानव देह के भीतर जो मन का साम्राज्य है, उसे धर्म और अधर्म दोनों की ही सत्ता क्रियाशील रहती है। उसमे राम और रावण दोनों के ही गुण और अवगुण भरे हुए हैं। आज संसार में बहुत से मनुष्यों के मन से राम के गुण नहीं, बल्कि रावण के अवगुण दिन-रात बाहर निकल रहे हैं, इसलिए आज मनुष्य दुखी है और सारा विश्व अशांत व् भयभीत है।
आज के संतों का यही कर्तव्य है कि वो जिसे भी शिष्य के रूप में अपनाये, उसका ऐसा दिव्य रूपांतरण हो कि उसके मन के भीतर से सदैव राम के गुण ही बाहर निकलें, जिससे उसका आत्मकल्याण होने के साथ साथ समाज का भी कल्याण हो। संतों की शरण में जाने से मन शुद्ध हो ईश्वर-पथ की ओर उर्ध्वगामी है। हमारा विकारों से परिपूर्ण चंचल मन सतगुरु और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाने से भजनानंदी और निर्मल होकर पूर्णतः शांत हो जाता है। तब साधक अपने शांत और विशुद्ध अंतःकरण में ईश्वर के होने की अनुभूति प्राप्त करता है। सद्गुरु शिष्य की शंकाओं और जिज्ञासाओं का समाधान करते हैं, इसलिए शंकर के रूप भी कहे जाते हैं।”
आश्रम के आध्यात्मिक मार्गदर्शक संत राजेन्द्र ऋषि जी के लगभग डेढ़ घंटे तक चले प्रवचन के पश्चात प्रसाद वितरण का कार्यक्रम शुरू हुआ, जो रात आठ बजे तक जारी रहा। इस पावन अवसर पर विभिन्न तरह के जनकल्याणकारी सेवा कार्य हुए। सतसंगियों ने मांस, मदिरा और जुए से आजीवन दूर रहने का दृढ संकल्प लिया। समारोह में शामिल हुए सभी अतिथियों और सतसंगियों को आश्रम के सचिव श्री वशिष्ठ नारायण सिंह ने धन्यवाद दिया। समाचार संकलन और संपादन श्री बेचैन राम जी के द्वारा किया गया है।
(३००वीं पोस्ट ब्लॉग पर आने पर मेरी ओर से कुछ शब्द समर्पण- आदरणीय जागरण जंक्शन मंच के संपादक महोदय, सभी सम्मानित ब्लॉगर मित्र और अनगिनत कृपालु पाठक और प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम के असंख्य सतसंगीजन ये ३००वीं पोस्ट आप सभी को समर्पित है। आप लोग ब्लॉग पर आकर पढ़ते हैं और अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए लिखने की प्रेरणा मिलती है। आप सबका प्रेम यूँ ही सदैव बना रहे। मेरा हार्दिक आभार स्वीकार कीजिये- सद्गुरुजी)
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sadguruji के द्वारा
August 5, 2015

संतों की शरण में जाने से मन शुद्ध हो ईश्वर-पथ की ओर उर्ध्वगामी है। हमारा विकारों से परिपूर्ण चंचल मन सतगुरु और ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाने से भजनानंदी और निर्मल होकर पूर्णतः शांत हो जाता है। तब साधक अपने शांत और विशुद्ध अंतःकरण में ईश्वर के होने की अनुभूति प्राप्त करता है।

sadguruji के द्वारा
August 5, 2015

शरीर रूपी परम पवित्र मंदिर में मांस, मदिरा, पान, बीड़ी, सिगरेट, गुटका व् अन्य नशीली तथा तामसिक चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। ये त्यागने योग्य तामसिक चीजें शरीर के भीतर रोग रूपी विकृति पैदा करती हैं।


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