सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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रखिया बंधा ल भईया सावन आईल, जिय तू लाख बरिस हो

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रखिया बंधा ल भईया सावन आईल, जिय तू लाख बरिस हो
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राखी धागों का त्यौहार
बँधा हुआ एक एक धागे से
भाई बहन का प्यार,
राखी धागों का त्यौहार..
कितना कोमल कितना सुन्दर
भाई बहन का नाता,
इस नाते को याद दिलाने
ये त्यौहार है आता,
बहन के मन की आशाएँ
राखी के ये तार..
राखी धागों का त्यौहार..
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बहन कहे मेरे वीर तुझे ना
बुरी नजरिया लागे,
मेरे राजा भैय्या तुझको
मेरी उमरिया लागे,
धन हूँ पराया फिर भी मिलूँगी
साल में तो इक बार..
राखी धागों का त्यौहार..
भाई कहे ओ बहन मैं तेरी
लाज का हूँ रखवाला,
गूँथूँगा मैं प्यार से तेरे
अरमानों की माला,
भाई-बहन का प्यार रहेगा
जब तक है संसार..
राखी धागों का त्यौहार..

राखी पर्व पर कुछ लिखने बैठा तो मोहम्मद रफी जी का गाया हुआ फिल्म ‘राखी’ का गीत याद आने लगा। मैं सोचने लगा कि राखी शब्द का क्या अर्थ है ? राखी के अर्थ पर मैं कुछ देर विचार कर किया तो मुझे रामचरित मानस का एक दोहा याद आ गया- प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयँ राखि कौसलपुर राजा। मुझे लगा कि राखी का वास्तविक अर्थ किसी को ह्रदय में रखना है। हम उसे भूलें नहीं और सुख-दुःख में उसका साथ दें। एक दूसरे से दूर रहकर अपने सभी सांसारिक कर्म करते हुए भी भाई बहन को याद रखे और बहन भाई को याद रखे। राखी रूपी एक धागे की डोर बहन भाई की कलाई पर बांध उसे स्वस्थ रहने, उन्नति करने और जीवन के रणक्षेत्र में सदैव विजयी होने का आशीर्वाद देती है। भाई बहन के प्रेम रूपी धागे से बंधकर सदैव उसकी रक्षा करने का वचन देता है, इसीलिए इसे रक्षाबंधन का त्यौहार भी कहा जाता है.
इस त्यौहार को मनाने की शुरुआत कब हुई, यह कहना कठिन है। इतिहास और हिन्दू धर्मग्रंथों के पन्नों को देखें तो इस त्योहार की शुरुआत छह हजार साल से भी पहले होने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। इसके अनेकों साक्ष्य धर्मग्रंथों और इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। इस त्योहार के साथ जुडी हुई कुछ कहानियाँ साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत की जा रही हैं। सबसे पुरानी कथा इन्द्र की है. एक बार राक्षसों से कई दिन तक भयंकर युद्ध लड़ने के बाद इन्द्र निराश हो गए थे। इन्द्र को निराश और घबराया हुआ देखकर इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र पढ़कर इन्द्र के दाहिने हाथ मे एक डोरा बाँध दिया था और युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद दिया था। इन्द्राणी का रक्षाबंधन पहनकर इन्द्र जब पुन: राक्षसों से युद्ध करने गए तो इस बार इन्द्र की विजय हुई।
कहा जाता है कि तब से ही रक्षाबन्धन मनाने के त्योहार की शरुआत हुई। धार्मिक ग्रंथों की एक दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान कृष्णने दुष्ट राजा शिशुपाल को मारा था, तब युद्ध के दौरान घायल हो जाने से युद्ध के दौरान घायल हो जाने से भगवान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बह रहा था। द्रोपदी भगवान कृष्ण के बाएँ हाथ की अँगुली से खून बहता देख बहुत दुखी हुई थी और उसने अपनी साड़ी का टुकड़ा चीरकर कृष्ण की अँगुली में बाँधा था, जिससे उनकी अंगुली से खून बहना बंद हो गया था। तभी से भगवान कृष्ण ने द्रोपदी को अपनी बहन स्वीकार कर लिया था। इस घटना के कई वर्ष बाद जब पांडव द्रोपदी को जुए में हार गए थे और भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तब कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई थी। बहुत से लोग ये मानते हैं कि प्रामाणिक रूप से रक्षाबंधन मनाने की शरुआत यहीं से हुई थी।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो ऐसा लगता है कि रक्षाबंधन की शुरुआत राजस्थान से हुई थी। राजस्थान में सदियों से राखी का एक ही अर्थ है- बहन की रक्षा करने की जिम्मेदारी का आजीवन निर्वहन करना। उसकी रक्षा करते हुए यदि अपने प्राण भी न्यौछावर करना पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना। राजस्थान में बहुत पुराने समय से यह रिवाज चला आ रहा है कि यदि किसी औरत पर कोई मुसीवत आती है तो वह किसी वीर पुरुष को अपना भाई कहकर राखी भेज देती है और भाई आजीवन उसकी रक्षा की भार उठाता है। इतिहास में इस बात का सबसे बड़ा साक्ष्य जो दर्ज है, वो रानी कर्णावती व सम्राट हुमायूँ का हैं।
मध्यकालीन युग में जब राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब कर्णावती चितौड़ की रानी थीं। वो विधवा थीं, इसीलिए कमजोर समझ गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया। चितौड़ की सेना पराजित होने लगी तो अपनी और अपने प्रजा की सुरक्षा का कोई मार्ग न देख रानी कर्णावती ने सम्राट हुमायूँ की मदद पाने के लिए राखी भेजी थी। हुमायूं मुस्लिम होते हुए भी हिंदू परंपरा को अच्छी तरह से जानता था। राखी पाकर बहिन की रक्षा करने वाली हिन्दू परम्परा उसके दिल को छू गई थी, इसीलिए राखी का न्योता पाकर वो अपनी मुँह बोली बहिन की रक्षा के लिये चल पडा था।
सम्राट हुमायूँ ने रानी कर्णावती की रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था। इतिहास के पन्नों में रक्षाबंधन से संबंधित एक और घटना दर्ज है। हमेशा विजयी रहने वाला अलेक्जेंडर भारतीय राजा पुरू से युद्ध में हार की कगार पर पहुंच गया था। अलेक्जेंडर की पत्नी अपने पति को तनाव में देख विचलित हो उठीं। वो भारतीय संस्कृति की उदारता और रक्षाबंधन के त्योहार की महत्ता से भलीभांति परिचित थीं। उन्होंने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी। भारतीय राजा पुरू ने अलेक्जेंडर की पत्नी को बहन मान लिया और युद्ध को रोक दिया।
रक्षाबंधन भाई बहन के प्यार और एक दूसरे से भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।
बचपन में जब सभी भाई बहन साथ रहते हैं तो यह त्यौहार रुठने मनाने और मौज मस्ती करने तक सिमित रहता है, परन्तु बड़े होने के बाद एक दूसरे से दूर होने पर इस त्यौहार का वास्तविक महत्व समझ में आता है। मेरी तीन बहने हैं, परन्तु एक ही बहन रक्षाबंधन पर आ पाती हैं, बाकि दोनों बहनें मोबाईल पर उसदिन बात करती हैं तो उनका दर्द उनकी रुआंसी आवाज में झलकता है। भावनात्मक आवेश के कारण उसदिन मुझसे भी नहीं बोला जाता है। बहुत रोकने पर भी बिछुड़ने का दर्द आँखों से बह ही जाता है। मेरी दीदी को राखी का ये गीत बहुत पसंद था। रक्षाबंधन पर जब भी लता जी का गया हुआ ‘लागी नाही छूटे रामा’ फिल्म का ये गीत मैं सुनता हूँ, उनकी बहुत याद आती है..
रखिया बंधा ल भईया सावन आईल
जिय तू लाख बरिस हो,
तोहरा के लागे भईया हमरी उमिरिया
बहिना त देले आशीष हो..
राखी के धागा बाँधीं तोहरी कलइया,
मांथे लगाईं टीका ले के बलईंया,
आज के शुभदिन आरती उतारीं,
करीं तोहार मुंह मीठ हो..
रखिया बंधा ल भईया सावन आईल
जिय तू लाख बरिस हो,
तोहरा के लागे भईया हमरी उमिरिया
बहिना त देले आशीष हो..
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जहिया तू भउजी के डोली ले अइबअ,
दिदिया क नेग से त बचे न पईबअ,
अचरा में भरी भरी लेइब रुपइया,
गहिना लेइब दस बीस हो..
रखिया बंधा ल भईया सावन आईल
जिय तू लाख बरिस हो,
तोहरा के लागे भईया हमरी उमिरिया
बहिना त देले आशीष हो..
राखी के लाज देखअ हरदम निभइह,
दीदी के प्यार कभी तू न भूलइह,
एइसन न हो कहीं अँखियाँ निहारें,
जाये सावन रुत बीत हो..
रखिया बंधा ल भईया सावन आईल
जिय तू लाख बरिस हो,
तोहरा के लागे भईया हमरी उमिरिया
बहिना त देले आशीष हो..

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आलेख और प्रस्तुति=सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी,प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम,ग्राम-घमहापुर,पोस्ट-कन्द्वा,जिला-वाराणसी.पिन-२२११०६.
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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 24, 2015

रक्षा बंधन की महत्ता और और उससे जुडी सच्ची एवं प्रचलित कहानियों और गीतों का ज़िक्र करके एसा लगा कि आपने इस पावन पर्व को गंगा जल से सिंचित कर के और पवित्र एवं भावुक कर दिया है, पढ़ कर बहुत अच्छा लगा आदरणीय सद्गुरु जी .सादर शुभ कामनाएं .

amitshashwat के द्वारा
August 24, 2015

आदरणीय सद्गुरू जी, राखी या रक्षाबंधन के विषय में बडे सारयुकत बातों की प्रसतुति हुई है । भाव से ओत प्रोत गीतों ने पुराने दिनों को सहज ही ताजगी दे दी । अतयंत आभार सहित ।

sadguruji के द्वारा
August 25, 2015

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सादर अभिनन्दन ! मेरी दो बहनें काफी दूर रहती हैं ! रक्षा बंधन पर उनकी भेजी राखियां ही मिलती हैं ! इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने उन्हें याद किया है ! पोस्ट को पसंद कर उसे सार्थकता प्रदान करने के लिए सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
August 25, 2015

आदरणीय अमित शाश्वत जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! ब्लॉग में प्रस्तुत दोनों गीत मेरी तीनों बहनों को बहुत पसंद हैं ! आपने सही कहा है कि ये गीत पुराने दिनों की याद ताजा करने वाले हैं ! समय का सितम देखिये कि आज राखियाँ तो हर साल आ जाती हैं, परन्तु बहने नहीं आ पाती हैं ! अब तो रक्षा बंधन के दिन उनकी भेजी राखियों के सामने बैठ के अश्रुपूरित नेत्रों से राखियों को निहारता हूँ और सोचता हूँ कि राखी बंधवाने से पहले अब किसे परेशान करूँ ! बचपन में राखी बंधवाने से पहले इकलौता भाई होने के कारण उन्हें खूब परेशान करने के बाद पिताजी की डांट खाकर राखी बँधवाता था ! वक्त के बहाव में वो सबकुछ बहुत पीछे छूट गया है, परन्तु राखी के दिन वो पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं ! ब्लॉग पर आने और सुन्दर भावनाओं से परिपूर्ण प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 25, 2015

राखी का वास्तविक अर्थ किसी को ह्रदय में रखना है। हम उसे भूलें नहीं और सुख-दुःख में उसका साथ दें। एक दूसरे से दूर रहकर अपने सभी सांसारिक कर्म करते हुए भी भाई बहन को याद रखे और बहन भाई को याद रखे।

sadguruji के द्वारा
August 25, 2015

बचपन में जब सभी भाई बहन साथ रहते हैं तो यह त्यौहार रुठने मनाने और मौज मस्ती करने तक सिमित रहता है, परन्तु बड़े होने के बाद एक दूसरे से दूर होने पर इस त्यौहार का वास्तविक महत्व समझ में आता है।

rameshagarwal के द्वारा
August 26, 2015

जय श्री राम  सद्गुरुजी  बहुत  अच्छा लेख  राखी  के ऊपर लिख  कर  भारतीय  संस्कृति के एक  विशिस्ट त्यौहार पर जानकारी देने के लिए धन्यवाद् के पात्र.शायद लक्ष्मीजी  ने  रजा  वाली  को  रक्षा सूत्र  बाँध लार  विष्णु  भगवानजी  की छुडवाया था .आपकी कविताओ ने इस पर ४ चाँद लगा  दिए.

sadguruji के द्वारा
August 26, 2015

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! रक्षाबंधन से संबंधित बहुत सी कथाएं हैं ! मैंने कुछ प्रसिद्द कथाओं का वर्णन किया है ! प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
August 27, 2015

रक्षा बंधन पर बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय सद्गुरु जी, पर हम पुरुषों कोभी अपनी बहन के साथ साथ दूसरों की बहन की इज्जत की रक्षा का धर्म निभाना चाहिए सादर!

sadguruji के द्वारा
August 27, 2015

आदरणीय सिंह साहब ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! आपने सही कहा है कि हमें दूसरी बहनों की रक्षा का भी संकल्प लेना चाहिए ! जो लोग अपनी बहनों से स्नेह रखते हैं, उनमे से अधिकतर दूसरे की बहनों की भी इज्जत करते हैं ! अधिकतर दुष्कर्मी अपने खुद की बहनों की भी परवाह और इज्जत नहीं करते हैं ! पोस्ट का उद्देश्य रक्षाबंधन रूपी हमारे प्राचीन संस्कारों को प्रसारित और प्रचारित करना था, जिसकी शुरुआत हमारे घरों से ही होती है ! ब्लॉग पर आने और विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !


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