सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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वेश्‍याओं के देहरी की धूल पर चढ़ाएंगी कुलवधुएं श्रद्धा के फूल

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वेश्‍याओं के देहरी की धूल पर चढ़ाएंगी कुलवधएं श्रद्धा के फूल
शारदीय नवरात्र निकट आ रहा है। मूर्तिकार इस समय मां दुर्गा की एक से बढ़कर एक सुंदर व् भव्य मूर्तियाँ बनाने में लगें हुए हैं। बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि मां जगदम्बा की प्रतिमा को आकार देने के लिए मूर्तिकार द्वारा जो मिटटी गूंथी जाती है, उसमे नगरवधुओं यानि वेश्याओं के देहरी की मिटटी लाकर मिलायी जाती है। हमारे वर्तमान सामाजिक संरचना की ये कितनी बड़ी बिडम्बना है कि जो नगरवधुएं समाज की दृष्टि में, खासकर सम्मानित घरों की कुलवधुओं की दृष्टि में अछूत, अपवित्र, वहिष्कृत और तिरष्कृत हैं, उन्ही के देहरी की धूल मिलाकर मां दुर्गा की प्रतिमा बनती है और जब वो प्रतिमा पंडालों में सज जाती है तो अमीर-गरीब सभी घरों की सम्मानित कुलवधुएं उस प्रतिमा पर अपने श्रद्धा के फूल चढ़ाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। नगरवधुओं के देहरी की धूल लाने के लिए मूर्तिकार जब झोली फैलाये उस नगरवधू की देहरी पर खड़ा होता है, जो अपवित्र व् तिरष्कृत समझी जाती है, तब उस समय के दृश्य की कल्पना करते ही साहिर लुधियानवी साहब की ये पन्क्तियां याद आ जाती हैं-

संसार की हर एक बेशर्मी,
गुर्बत की गोद में पलती है,
चकलों ही में आ के रूकती है,
फांकों से जो राह निकलती है,
मर्दों की हवस है जो अक्सर,
औरत के पाप में ढलती है.
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाज़ार दिया,
जब जी चाह मसाला कुचला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया।

देहरी की धूल के लिए झोली फैलाये मूर्तिकार की झोली में सजी-धजी नगरवधू अपनी अंजुरी से उठा अपने देहरी की धूल डाल देती है। उसकी आँखों से आंसू छलकतें हैं, कुछ बोल नहीं पाती। कहना चाहती है कि ‘मां मुझे इस नरक से छुटकारा दिलाओं।’ जो नगरवधू बूढी हो चुकी है, कई रोगों की शिकार है. वो खांसते-हांफते हुए अपने अंजुरी में बटोरी धूल मूर्तिकार की झोली में डालती है और अपने आंसू पोछते हुए बोल ही पड़ती है कि ‘मां! ये जनम तो बीता, अब अगले जनम में या तो मुझे बेटी का जनम मत देना या फिर किसी अच्छे कुल में जनम देना ताकि मै तुझे ये आंसुओं से नम धूल नहीं बल्कि कुलवधू के रूप में हंसी-ख़ुशी के साथ तेरे चरणों में अपनी श्रद्धा के फूल चढ़ाऊं।’

ये सब देख सुनकर बहुत भावुक हो गया मूर्तिकार अपनी आँखे पोछता हुआ माँ की मूर्ति गढ़ने के लिए वहां से चल पड़ता है। भारत में बहुत पहले जब देश में स्त्रियाँ बहुत अधिक अधिकार संम्पन्न थीं, तब उन्होंने वैश्या को नगरवधू रूपी अत्यंत सभ्य नाम दिया था और सार्वजनिक दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए सबसे पहले नगरवधुओं की देहरी से मिटटी लाना अनिवार्य कर दिया, ताकि समाज में उन्हें भी सम्मान मिल सके।

वो समाज को इस सच्चाई से भी अवगत करना चाहती थीं कि मज़बूरी और बेबसी में पेट की आग बुझाने के लिए अपना शरीर बेचने का धंधा करने वाली नगरवधुएं भी जगतजननी माँ दुर्गा की ही अंश हैं, इसलिए उनकी उपेक्षा मत करो और उनसे घृणा मत करो। उनकी मदद करो, उन्हें भी प्यार और सम्मान दो। उस समय के समाज पर इसका बहुत अच्छा असर हुआ और उन्हें भी समाज से प्रेम और सम्मान मिलने लगा, परन्तु कालांतर में पुरुष प्रधान समाज ने उनसे मुंह फेरकर फिर से उन्हें तिरस्कृत और उपक्षित बना दिया। ये कितने शर्म की बात है कि आज़ादी के ६८ वर्ष बीतने के बाद भी हम अपने देश की नगरवधुओं को कोई रोजगार नहीं दे सके हैं, उन्हें वेश्यावृति रूपी नरक से नहीं निकाल सके हैं और उन्हें सम्मान के साथ जीने का हक नहीं दिला सके हैं। हमारे रहनुमाओं को गंभीरता से इस समस्या का कोई हल ढूँढना चाहिए। साहिर लुधियानवी साहब ने हमारे देश के दोहरे चरित्र वाले भ्रष्ट नेताओं के बारे में बहुत सही कहा है-

जरा मुल्क के रहबरों को बुलाओ,
ये कूंचे, ये गलियां, ये मंजर दिखाओ,
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ,
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?, कहाँ हैं?, कहाँ हैं?

वैश्यावृति में लगी स्त्रियों को क़ानूनी मान्यता या फिर कोई अन्य सम्मानजनक रोजगार मिलना ही चाहिए। गंदी बस्तियों में वो अनेक गुप्त रोगों की शिकार होकर हर सांस के साथ घुट घुट कर और तिल तिल कर मर रही हैं। वो भी इंसान हैं। क्या केंद्र और राज्य सरकारें कभी उनकी तरफ समाज सुधार और नारी उद्धार की कल्याणमयी सोच वाली दृष्टि से देखेंगी या फिर संवेदनहीन होकर उनसे हमेशा यूँ ही मुंह मोडे रहेंगी? यदि बेबसी, गंदगी और रोग के बीच घुट घुट के जीना मरना वेश्याओं की नियति है तो फिर सरकार किसलिए है? उन्हें और जनता को जरूर ये सोचना चाहिए। कम से कम यही सोचकर कुछ तो शर्म करो कि नारी सामान्य मनुष्य से लेकर अवतार तक सबको जन्म देने वाली है, हम उसके ऋणी हैं, इसलिए हमें उनके कल्याण के लिए अपनी सामर्थ्य से बढ़कर काम करना चाहिए। साहिर लुधियानवी साहब के शब्दों में-

औरत संसार की किस्मत है,
फिर भी तकदीर की हेटी है,
अवतार पयम्बर जनती है,
फिर भी शैतान की बेटी है.

देश की जनता से मै आग्रह करूँगा कि वो नगरवधुओं के उत्थान के लिए सोशल मीडिया पर इसे एक अहम मुद्दा बनायें, इसपर चर्चा करें और सरकर पर भी दबाब बनायें कि वो नगरवधुओं के चहुमुंखी उत्थान के लिए, उन्हें पुलिस की प्रताड़ना से बचाने के लिए, उनके विवाह व् पुनर्वास के लिए, उन्हें चिकित्सा सुविधा देने के लिए, उनको उचित रोजगार और सम्मानजनक जीवन देने के लिए त्वरित रूप से समुचित कदम उठाये। अपनी इन्ही मांगों को लेकर देश के कई शहरों में नगरवधुएं या आधुनिक नाम सेक्सवर्कर पिछले कई सालोँ से धरना-प्रदर्शन कर रही हैं, परन्तु उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। सरकारें गूंगी बहरी बनी बैठी हैं।
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ISWR Day 2012 Sangli - Burn the construction of sex work as Sin!

देश की सभी सम्मानित नारियों से मेरी गुजारिश है कि ‘हे कुलवधुओं! आप भी उनके समर्थन में कुछ बोलिए और कीजिये। उनका सम्मानित नाम नगरवधू नारी जाति ने ही कभी रखा था। नगरवधुएं नारी होने के नाते आपकी शत्रु नहीं मित्र हैं। अधिकतर नगरवधुओं ने आपका घर तोड़ने से ज्यादा जोड़ने का ही कार्य किया है।’ मैं उन आदमियों के बारे में क्या कहूँ, सिर्फ जानवर शब्द ही उनके लिए काफी है, जो नगरवधुओं को मांस का सुन्दर लोथड़ा और मनोरंजन का साधन भर समझते हैं। जरा वो सोचें कि उन्हें सुख देने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाली नगरवधुओं के उत्थान के लिए क्या उनका कोई कर्तव्य नहीं बनता है?

वर्षों पहले एक नगरवधू मेरी कुटिया में दर्शन करने आई थी। कोई भी शिष्य उसे मुझ तक नहीं पहुँचने दे रहा था। सबके चेहरे पर घृणा का भाव था। मेरे पास आकर कुछ शिष्यों ने मुझे उसके बारे में बताया और उससे नहीं मिलने का सुझाव दिया। मैं उनकी बात नहीं माना और अपने कमरे से बाहर निकलकर उस नगरवधू को आदर के साथ आश्रम के भीतर लाया। उसके दुःख सुने और आध्यात्मिक दृष्टि से उसे कुछ उपाय भी बताये। वो बहुत संतुष्ट और प्रसन्न थी। जाते समय उसने आश्रमं के नियमों के विरुद्ध मेरे पैर छूने की इच्छा जाहिर की। उसे जल्द से जल्द आश्रम से बाहर भगाने की फ़िराक में लगे मेरे शिष्यों ने गद्दी से दूर रहने को कहा और मेरे पैर छूने से मना किया। इस तरह के अश्पृश्यतापूर्ण व्यवहार से वो बहुत शर्म और संकोच महसूस कर रही थी तथा उसकी आँखों से अपनी अपमानजनक सामाजिक स्थिति पर आंसू बह रहे थे।

मुझे अपने शिष्यों का व्यवहार बहुत ख़राब लगा। मेरी दृष्टि में उनका आचरण मानवता के विरुद्ध भी था। शिष्यों की नाराजगी मोल लेते हुए मैंने उस युवती को पास बुलाया और आशीर्वादस्वरूप उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। वो मेरे पैर छूकर अपनी आँखे पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। संसार की बहुत सी चीजों से विरक्त और उदासीन होने पर भी उसके लिए मेरी आखों में आंसू झलक आये थे। उससे मिलने के कारण मेरे कई शिष्य मुझसे नाराज होकर बहुत दिनों तक आश्रम में दिखाई नहीं दिए। उनका अपना विकारी मन अपवित्र हो गया था, परन्तु उनकी दोष दृष्टि गुरु पर थी। कुछ दिनों के बाद उन्हें इस सच का अहसास हुआ और वो सब फिर पहले की भांति आश्रम में आने लगे।

वो नगरवधू और उसका असीम दुःख कई दिन तक मुझे कष्ट देता रहा। प्रेम प्रपंच में वो प्रेमी द्वारा दिए गए धोखे की शिकार हुई थी। उसका प्रेमी वैश्यावृति के नरक मे उसे बेचकर भाग गया था। मैंने उस युवती को अपने घर लौटने कि सलाह दी थी, परन्तु उसका कहना था कि ‘वो अब अपने घर नहीं लौट सकती, क्योंकि घर लौटने पर घरवाले उसे काटकर फेंक देंगे।’ उसके कष्टदायी जीवन की कितनी अजीब विसंगति थी कि वो शरीर बेचने का धंधा मर्दों से करती थी और उसी मर्द जाति से वो बेहद घृणा भी करती थी। ये घटना कई साल पहले की है। जहाँ पर वो रहती थीं, आज उस जगह पर नगरवधुओं की बस्ती नहीं है, सम्मानित कुलवधुओं के विरोध और सरकारी व् प्रशासनिक डंडे ने उन्हें भगा दिया। जो नगरवधू कभी मेरा दर्शन करने आई थी, वो कहाँ गई, पता नहीं। उसके दुखमय और द्वन्द् मय जीवन के बारे में और क्या कहूँ, ये पोस्ट पूरे सम्मान के साथ अश्रुपूरित ह्रदय से उस नगरवधू को समर्पित कर रहा हूँ। उसके ह्रदय की असीम पीड़ा क़मर जलालाबादी जी के लिखे एक गीत के ये बोल काफी हद तक बयान करते हैं-

औरों को पिलाते रहते हैं और खुद प्यासे रह जाते हैं
ये पीनेवाले क्या जाने, पैमानों पे क्या गुज़री है ?

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट-कन्द्वा, जिला- वाराणसी। पिन-२२११०६)
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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pooja singh के द्वारा
September 23, 2015

परनाम गुरूजी, ब्लॉग पढ़कर रो परी और देर तक रोटी रही.दिवाली पर बनारस आउन्गि तो आपके दरसन जरूर करुँगी,परनाम.

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

कोई सेक्स वर्कर्स की समस्याओं और विचारणीय मुद्दों पर जल्दी चर्चा ही नही करना चाहता है ! उनके लिये कुछ करने की मेरी अपनी भी कुछ सीमाएँ और मर्यादाएं हैं, किन्तु फिर भी यथासंभव उनके हित के लिए मेरा प्रयास जारी रहेगा !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

नगरवधुओं यानी सेक्सवर्करों की दुनिया का कटु सत्य समाज के सामने जल्दी नही आ पाता है, क्योंकि मीडिया तक उनकी इतनी पहुंच नही है और दूसरे मीडिया को उनमे इंटरेस्ट भी नही है ! समर्थ लोग भी इनकी मदद नही करना चाहते हैं ! मनोरंजन के लिए ओर हवस की भूख मिटाने के लिये जो उनके पास जाते हैं, उनमे से भी अधिकतर लोग ‘यूज एंड थ्रो’ यानी ‘भोग करो और भूल जाओ’ मे यकीन करते हैं ! परवाह किसे है, न कोई अपने सम्बन्धी हैं वो और न ही कोई अपने प्रिय परिजन !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

कुछ विषय जो हृदय के बेहद करीब होते है, उनपर कुछ लिखना ईश्वर की आराधना करने जैसा ही है !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

इंदिरा गांधी नेशनल ओपेन यूनिवर्सिटी की हमे प्रशन्सा करनी चाहिये कि उसने देशभर के सेक्स वर्कर्स को शिक्षित करने का बीड़ा उठा लिया है ! यह यूनिवर्सिटी व्यावसायिक यौन कर्मियों के लिए उम्मीद की किरण लेकर आई है ! फिलहाल अभी तो इग्नू कोलकाता, अहमदाबाद और नागपुर के ‘रेड लाइट एरिया’ की संकरी और गंदी गलियों में बदतर जीवन जी रही यौन कर्मी महिलाओं के लिये अंडर-ग्रेजुएट डिग्री प्रोग्राम चला रही है, किन्तु उसने देशभर के सेक्स वर्कर्स को शिक्षित करने का एक बहुत अच्छा संकल्प लिया है ! इस अच्छे कार्य के लिये इग्नू को बहुत बहुत बधाई !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

एक समाचार के अनुसार अधिकतर यौनकर्मी महिलाएँ अपने अंधकारमय जीवन से व्यथित हो चुकी हैं और अब उन्हें त्योहारों में कोई रुचि नहीं है ! रंगों से कोई लगाव नहीं है, दिये जलाने की हसरत भी नही है और वो कोई भी त्योहार नहीं मनाना चाहती हैं, क्योंकि अपने असीम दुखों के कारण वो यह समझती हैं कि उनके पास खुशियां मनाने की कोई वजह नहीं है ! उनके जीवन में अब कुछ भी शेष नहीं बचा है, इसलिये अब उनके लिये त्योहारों के कोई मायने नहीं रह गए हैं ! कितने शर्म की बात है की हम त्योहारों पर खुशियाँ मनाते हैं और हमारे ही देश और समाज का एक हिस्सा व्यथित और अंधकारमय जीवन जी रहा है !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता दिये जाने की मांग बहुत समय से सेक्स वर्करों द्वारा हो रही है ! इसके अलावा उनके साथ अक्सर होने वाले बलात्कार (जी ये सच जानकर आप को आश्चर्य होगा) सहित पुलिस द्वारा दी जाने वाली यातनाओं पर भी वो सवाल खड़े करते हैं ! कानून के जानकार सरकार को पिछले कई सालों से ये सलाह दे रहे हैं कि जो महिलायें मजबूरन इस व्यवसाय में आयी हैं उन्हें होने वाली अनेकों तरह की परेशानियों से छुटकारा दिलाने के लिये और महिलाओं को जबरन इस पेशे में धकेलने वालों को रोकने के लिए इसे कानूनी मान्यता दी जानी चाहिये !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

आज़ादी के पहले और आजादी के कुछ समय बाद तक भी देश के अनेकों छोटे बड़े शहरों मे मुजरा हुआ करता था ! उस वक्त अंग्रेज़, जमींदार, बड़े-बड़े सेठ और रसूखदार लोग वहाँपर नृत्य देखने और शराब पीने के लिए आते थे ! रात से लेकर भोर होने तक नर्तकियों से इश्कबाजी करने के साथ साथ नाच गाने और पीने पिलाने की महफ़िल सज़ा करती थी ! अब वह परम्परा तो वहांपर लगभग ख़त्म ही हो गई है, किन्तु उनमे से अधिकतर जगहों पर आधुनिक वैश्यावृति और नशे के अड्डे स्थापित हो गये हैं !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

पूरे देशभर मे अवैध तरीके से लगभग हर छोटे-बड़े शहरों मे देह व्यापार चल रहा है ! ये नशे, जुए, बॉल यौन-शोषण से लेकर और भी कई तरह के अपराधों के अड्डे बन गये हैं ! देह व्यापार को भारत में क़ानूनी मान्यता नहीं मिलना इस तरह के अन्य अपराधों के पनपने का सबसे बड़ा कारण है ! कही धड़ल्ले से तो कहीं चोरी-छिपे से चल रहे इस व्यवसाय को कोई भी सरकार पूरी तरह से खत्म नही कर सकती है ! इस बात से कोई इंकार नही कर सकता है कि प्राचीन काल से ही सामाजिक रूप से इस धंधे को स्वीकारा जाता रहा है ! सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिये ! आगे चलकर देश के लिये ये एक बहुत बड़ी समस्या बनने वाला है और इसके साथ साथ नशे, जुए, बॉल यौन-शोषण से लेकर और भी अन्य कई तरह के अपराध भी बढ़ने वाले हैं !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

एक समाचार के अनुसार देह व्यापार वाली जगहों पर स्वास्थय सम्बन्धी बीमारियों बहुत अधिक हैं ! देह व्यापार से जुड़ी अधिकतर औरतें कम पढ़ी-लिखी हैं या फिर पूरी तरह से अनपढ़ हैं, इसलिये सुरक्षित यौन-सम्बन्ध का तरीका न मालूम होने की वजह से वो गंभीर यौन-रोगों से ग्रस्त हो चुकी हैं और उनमे से बहुत सी एड्स आदि की गिरफ्त में भी आ चुकी हैं ! वो हमारे सभ्य समाज से जाने वाले लोंगो को यही सब खतरनाक बीमारियाँ बांट भी रही हैं ! ये समाज में लाइलाज रोग एड्स के तेजी से फैलने के खतरे की बजती हुई घंटी है ! इस खतरे के प्रति सरकारी उपेक्षा का रवैया देखिये कि देश के अधिकतर राज्यों मे स्वास्थय विभाग की ओर से वैश्याओं को रेगुलर चेकअप जैसी कोई भी सुविधा उपलब्दध नहीं है !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

देह व्यापार वाली जगहों पर अधितर लड़कियां अपनी मर्ज़ी से देह व्यापार करती हैं, किन्तु यह भी एक बहुत बड़ा सच है कि वहा पर बहुत सी लड़कियां इधर उधर से अगवा करके भी लाई जाती हैं या फिर उनके धोखेबाज प्रेमी उन्हे वहां पर धोखे से बेच जाते हैं ! ऐसी बहुत सी लड़कियों को ज़बरदस्ती वहा पर रखा जाता है ! उन्हे डराकर और यातना देकर देह व्यापार के धंधे मे धकेल दिया जाता है ! समय समय पर पुलिस की मदद से अगवा की हुई कुछ भाग्यशाली लड़कियों को इस नरक से मुक्ति मिल जाती है, किन्तु दुर्भाग्य से अधिकतर लड़कियां इतनी भाग्यशाली नही होती है कि उनके चंगुल से बच सकें ! स्त्री मुक्ति संगठनों का ऐसी लड़कियों को मुक्त कराने मे बहुत बड़ा योगदान है ! संकरी गंदी-गलियाँ और छोटे-छोटे ढेर सारे कमरों वाले मकान मे किसी अगवा की हुई लड़की को ढूंढ़ना बेहद कठीन काम है ! इस कठिन कार्य को करने के लिए पुलिस और नारी मुक्ति संगठनों की तारीफ करनी चाहिये ! आज के धोखेबाजी वाले युग मे लड़कियों को प्रेम-प्रपंच और धोखेबाज प्रेमियों से दूर ही रहना चाहिये, नही तो धोखे से बेचे जाने पर ऐसे नरक में फंसकर जीवन भर बेइज्जती और दुर्गति झेलनी पड सकती है और पूरा जीवन बर्बाद हो सकता है !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

एक समाचार के अनुसार देह व्यापार वाली बहुत सी जगहों पर कुछ स्वयं सेवी संस्थाएँ सेक्स वर्करों के स्वास्थय, सुरक्षा एवं रीहैब्लीटेशन के लिये अच्छा काम कर रही हैं ! लेकिन वहा पर सेक्स वर्करों की संख्या इतनी ज्यादा है और उनकी संकरी गंदी बस्तियों के हालात इतने ज्यादा बदतर हैं कि उनका सारा सद्प्रयास उंट के मुंह मे जीरा ही साबित हो रहा है !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

अब अंत मे कुछ चर्चा और करूंगा ! इस धंधे को सरकारी मान्यता नही मिलने से दो बड़े नुकसान हो रहे हैं ! पहला किसी लड़की को सौ रुपये मिलते हैं तो कोठे के मालिक या मालकिन, दलाल और पुलिस ही ७० प्रतिशत रकम खा जाते हैं और महज ३० प्रतिशत रकम ही उसके हाथ आ पाती है ! देह व्यापार के धंधे में यह एक बहुत बड़ा शोषण है, जो सेक्स वर्करों को क़ानूनी मान्यता मिलने से ही रुक सकता है ! दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सेक्स वर्कर नही चाहते हैं कि उनके बच्चे इस घृणित कार्य को करें ! वो अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर हमारे सभ्य समाज का एक सम्मानित हिस्सा बनाना चाहते हैं, परन्तु बहुत अफ़सोस कि बात है कि कोई भी स्कूल उनके बच्चों को पढ़ाने के लिये जल्दी तैयार नही होता है ! सेक्स वर्करों के समाज से और उनके बच्चों से अछूतपन और घृणा वाले व्यवहार की ये बदतर हालत है ! प्रधानमन्त्री जी से मेरी गुजारिश है की वो इस ओर ध्यान दें, ताकि उनका दिया हुआ नारा ‘सबका साथ सबका विकास’ सच साबित हो सके ! जयहिंद ! वन्देमातरम् !

Shobha के द्वारा
September 24, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी न जाने कैसे यह लेख मुझे दिखाई नहीं दिया आज चर्चित लेख की श्रेणी में देशा न पढ़ पाती अफ़सोस रहता बहुत ही स्कारात्म्ल सोच से पूर्ण लेख बहुत ही अच्छा लेख आप से बड़ी हूँ आपको मन से आशीर्वाद देती हूँ मुझे अपने शिष्यों का व्यवहार बहुत ख़राब लगा। मेरी दृष्टि में उनका आचरण मानवता के विरुद्ध भी था। शिष्यों की नाराजगी मोल लेते हुए मैंने उस युवती को पास बुलाया और आशीर्वादस्वरूप उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया। वो मेरे पैर छूकर अपनी आँखे पोंछते हुए कमरे से बाहर निकल गई। संसार की बहुत सी चीजों से विरक्त और उदासीन होने पर भी उसके लिए मेरी आखों में आंसू झलक आये थे। उससे मिलने के कारण मेरे कई शिष्य मुझसे नाराज होकर बहुत दिनों तक आश्रम में दिखाई नहीं दिए। उनका अपना विकारी मन अपवित्र हो गया था, परन्तु उनकी दोष दृष्टि गुरु पर थी। कुछ दिनों के बाद उन्हें इस सच का अहसास हुआ और वो सब फिर पहले की भांति आश्रम में आने लगे।इनको सहानुभूति की जरूरत है यह भी सामाजिक प्राणी हैं

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! आपका ह्रदय से दिया हुआ आशीर्वाद मैंने अपने ह्रदय में समाहित कर लिया है ! ये मेरे लिए अनमोल है ! मेरा हार्दिक आभार स्वीकार कीजिये ! आश्रम की एक पुरानी शिष्या हैं- पूजा सिंह ! वो मुंबई में रहती हैं ! बहुत भावुक स्वभाव की और बेहद निर्मल ह्रदय की महिला हैं ! कुछ समाज सेवा भी वो करती हैं ! उनकी भेजी हुई प्रतिक्रिया से ज्ञात हुआ कि पोस्ट पढ़कर वो काफी दुखी हुईं ! मेरा उद्देश्य किसी को दुःख पहुंचाना नहीं, बस समाज सेवा के लिए प्रेरित करना है ! आप तो बहुत समय से इस कार्य में लगी हुई हैं ! आप जैसे सभी लोंगो को मैं ह्रदय से नमन करता हूँ और आप लोगों से सामाजिक परिवर्तन करने की बहुत अपेक्षा भी रखता हूँ ! जब १९९१ में छब्बीस साल की उम्र में समाज सेवा करने के लिए मैं आश्रम की बागडोर सम्भाला तो उस समय मेरे अपने व्यक्तिगत दुःख पहाड़ की तरह ऊँचे थे ! ईश्वर के सानिध्य में रहकर और लोकसेवा करके मैं अपने व्यक्तिगत दुखों के पहाड़ के ऊपर बैठ गया ! इस तरह से उनके नीचे दबकर मरने से बच गया और एक आध्यात्मिक नवजीवन पा गया ! ईश्वर और सद्गुरुओं को कोटि कोटि नमन ! यही उपदेश मैं प्रतिदिन लोंगो को देता हूँ कि अपने व्यक्तिगत दुखों को अपने मन पर और अपनी आत्मा पर हावी मत होने दो ! अपने निजी दुखों के पहाड़ पर बैठकर जो ध्यान समाधि लगा ले और कुछ भी यथासामर्थ्य लोकसेवा कर ले, वह सर्वश्रेष्ठ और धन्य है ! जिस नगरवधू का जिक्र पोस्ट में मैंने किया है वो १९९५ की घटना है ! दुःख होता है कि एक अच्छे कुल की सुन्दर और शिक्षित लड़की ने प्रेमप्रपंच के चक्कर में फंसकर अपना पूरा जीवन तबाह कर लिया ! आज के युवक युवतियों को मैं यही शिक्षा देता हूँ कि सच्चे प्यार का वो आदर करें, परन्तु फंसाद लव (किसी धोखेबाज प्रेमी के जाल में फंसना, जो किसी बड़ी मुसीबत में फंसा दे) और जिहाद लव (किसी दूसरे धर्म वाले के छलीय प्रेम के झांसे में आना, जो पूरा जीवन ही बर्बाद कर दे) से वो दूर रहें ! अंत में ह्रदय को छूने वाली अनमोल प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

आदरणीया पूजा सिंह ! शुभ आशीर्वाद ! आप के आंसू मेरे लिए अनमोल हीरे हैं, किन्तु केवल रोने से काम नहीं चलेगा ! आप वर्षों से समाज सेवा कर रही हैं ! सेक्स वर्करों के विषय को भी अपनी समाज सेवा का एक हिस्सा बनाइये ! मेरा आशीर्वाद सदा आपके साथ है ! इस विषय पर जब आप बनारस आएँगी तब विस्तृत चर्चा होगी ! ब्लॉग पर आकर पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार !

Shobha के द्वारा
September 24, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी मै सूर्या संस्थान संस्था की सदस्य हूँ इस संस्था की संस्थापिका आशा रानी वोहरा जी ने अपनी छोटी सी पूंजी से 70 वर्ष की उम्र में संस्थान शुरू किया था उन्होंने लगभग ११० पुस्तके लिखीं सभी महिलाओं पर ही हैं वह लिखती है आर्थिक कारणों से औरतें भी अपना घर ,गाँव व कस्बा छोड़ कर शहरों की और आ रही हैं | कई औरतों की दशा बहुत सोचनीय हैं इन्हें बहला फुसला कर नौकरी का झांसा दे कर शहरों में लाया जाता है यहीं से इनके शोषण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है इन्हें देह व्यापार में धकेल दिया जाता है पीछे लौटना भी संभव नहीं रह जाता |समाजिक कार्यकर्ता पुलिस की मदद से इन्हें छापा मार कर बचा कर लाते हैं इन महिलाओं को सुधार ग्रहों में रखा जाता है परन्तु कई संस्थाओं के अधिकारियों और पुलिस की मिली भगत से यह अवैध व्यापार चलता रहता है यही नहीं विधवा आश्रमों में भी यह कुकृत्य चलता है इन कुत्सित और घिनौनी स्थिति में से इन महिलाओं को निकाल कर उन्हें सुरक्षित स्थान पर रख कर उन्हें नये जीवन की शिक्षा दे कर आर्थिक रूप से मजबूत करना आसान काम नहीं है | आगे वह कहती हैं ‘ग्लैमर की दुनिया में अपना स्थान बनाने के लिए, महानगरों में अपना खर्च निकालने के लिए फिल्म थियेटर , गायन ,टी.वी. माडलिंग आदि की कुछ विफल हस्तियाँ भी इस क्षेत्र में आ जाती हैं | उनके पास बहाना होता है क्या करें ? पैसे की जरूरत है झेलना पड़ता है | कई शातिर ट्रेंड कालगर्ल स्कूलों – कालेजों में एडमिशन लेकर भोली भाली जरूरत मंद लड़कियों को फुसलाकर दलालों के चुंगल में फसा देती हैं | वह दलदल से निकलना भी चाहें तो निकल नहीं पाती क्योंकि मेहनत का रास्ता उन्हें मुश्किल लगता है | ” दिल्ली में यह बहुत देखने में आता है | समाज इनसे घृणा न कर इनको बदलने की कोशिश करे इन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करे

sadguruji के द्वारा
September 24, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! समाज सेवा से जुड़ने के लिए आपका अतिशय हार्दिक अभिनन्दन ! मैं इस बात को जानता हूँ ! आपने इस पर एक विस्तृत पोस्ट भी लिखी थी ! बहुत अच्छा है, इसे जारी रखें ! सादर आभार !


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