सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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वैदिक काल में पिता-पुत्री के यौन-संबंध अनुचित माने जाते थे

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‘वैदिक काल में पिता-पुत्री व भाई-बहन के यौन-संबंध अनुचित माने जाते थे

‘वैदिक काल में पिता-पुत्री और भाई-बहन के यौन-संबंध उचित माने जाते थे’,ऐसी गलत जानकारी देने वाली कई पोस्ट मैं फेसबुक समेत कई वेबसाइटों के ब्लॉग पेज पर देखा, जिसके प्रस्तुतकर्ता एक छदम नाम रखकर हिन्दुओं को भड़काने वाला घोर निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। बहुत से नास्तिक और हिन्दू धर्म के कट्टर विरोधी अपने ब्लॉग पर कॉपी पेस्ट करके ऐसी अशोभनीय और बहुत आपत्तिजनक जानकारियां दे रहे हैं। किसी अन्य धर्म का अनुयायी या नास्तिक होना मैं कोई बुराई नहीं मानता, परन्तु यदि आप अपने धर्म के प्रति कट्टर हैं अथवा नास्तिक हैं तो किसी दूसरे धर्म की आलोचना क्यों और वो भी सिर्फ हिन्दू धर्म की? ‘वैदिक काल में पिता-पुत्री और भाई-बहन के यौन-संबंध उचित माने जाते थे’, यह कुविचार “हिन्दूइजम धर्म या कलंक” नामक पुस्तक से चोरी करके लिया गया है, जिसके लेखक एस आर बाली जी हैं।

मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि किसी दूसरे के विचार को आप अपने विचार कैसे कह सकते हैं? किसी के विचारों का कुछ अंश प्रसंगवश उद्धृत किया जा सकता है, परन्तु पुस्तक का दो पेज अपने नाम से प्रकाशित करना एक तरह से चोरी ही कही जाएगी। इसका एक ही मकसद हो सकता है और वो है, हिन्दू धर्म को भ्रष्ट साबित करना। ये हिन्दुओं को बदनाम करने की एक गहरी साजिश है और इसी के तहत आजकल इंटरनेट मीडिया पर कई मुस्लिम भाई हिन्दू नाम रखकर हिन्दू धर्म की बुराई करने में लगे हैं।

हिन्दू ऐसा छल प्रपंच नहीं करते हैं। वो तो साफ़ कहते हैं, ‘भाई आओ, जिस विषय पर चर्चा करनी हो, आप करिये। हम जबाब देंगे।’ एस आर बाली जी द्वारा लिखित पुस्तक “हिन्दूइजम धर्म या कलंक” का सहारा लेकर ये लोग सारी दुनिया को ये समझाना चाह रहे हैं कि हिन्दू धर्म कितना भ्रष्ट है? वैदिक काल में बाबा-पोती, पिता-पुत्री और भाई-बहन के मध्य शारीरिक संबंध उचित माने जाते थे। इस बात को प्रमाणित करने के लिए वो लोग वेदों के कुछ श्लोकों का अनर्थ कर उदाहरण देते हैं, जैसे- ‘वसिष्ठ ने अपनी पुत्री शतरूपा से विवाह रचाया, मनु ने अपनी पुत्री इला से विवाह किया, जहानु ने अपनी बेटी जहान्वी से शादी की, सूर्य ने अपनी बेटी उषा से ब्याह किया।

धहप्रचेतनी और उस के पुत्र सोम दोनों ने सोम की बेटी मारिषा से संभोग किया। दक्ष ने अपनी बेटी अपने ही पिता ब्रह्मा को विवाह में दी और इन वैवाहिक-संबंधों से नारद का जन्म हुआ।’ ये जितने भी उदाहरण और नाम दिए गए हैं, वो सब किसी व्यक्ति के नहीं बल्कि सिर्फ अलंकारिक हैं। अलंकारिक और गूढ़ भाषा में वेद के कहने का अर्थ कुछ और है। आप लोग वेद को समझ ही नहीं पाये। जैसे- सूर्य और उषा कोई व्यक्ति नहीं हैं, एक प्रकाश है तो दूसरी उसकी किरण। नारद जी ब्रह्मा के शारीरिक नहीं बल्कि मानस पुत्र हैं और उनकी कोई देह नहीं है। वेद में यम और यमी आपस में भाई-बहन के रूप में आते हैं। आप लोगों ने दोनों की बातचीत को सेक्स के लिए आमंत्रण समझ लिया गया है।

यहाँ पर अलंकारिक भाषा में यम दिन को और यमी रात को कहा गया है, दोनों मिलकर मनुष्यों को यह समझाना चाहते हैं कि भाई-बहन आपस में सेक्स करने जैसा निंदनीय कर्म कभी न करे। वेदों में बहिन भाई या पिता-पुत्री के व्यभिचार का कितना कठोर दंड हैं, इसका एक उदहारण देखिये। अथर्ववेद [xv] में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘यदि तुझे सोते समय स्वप्न में भी तेरा भाई अथवा तेरा पिता भूलकर भी प्राप्त हों तो वे दोनों गुप्त पापी औषधि प्रयोग से नपुंसक करके मार डाले जाएँ।’

भाई-बहन के आपसी यौन-संबंधों की बात भी पूर्णत: झूठी है। वैदिक काल में भाई-बहन की बात तो दूर रही, मौसी की लडकी, मामी की लडकी बुआ की लडकी आदि जैसे सगे सम्बन्धियों की कन्या से भी यौन-सम्बन्ध बनाना निषेध था। भाई-बहन के यौन-संबंध की तो स्पष्ट रूप से मनाही थी। ”पापामाहुर य: स्वसार निग्च्छात”-अथर्ववेद १८/१/१४ अर्थात “वो पापी है जो बहन से सम्बन्ध या विवाह करता है।”

हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने के लिए और हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए बहुत से नास्तिकों और विधर्मियों द्वारा वेदों के दिव्य श्लोकों के गलत अर्थ बताये जाते हैं। वेदों में रहस्यमय और अलंकारिक भाषा में बहुत सी गूढ़ बातें कही गईं हैं, जिसे समझना आसान नहीं है। अलंकारिक भाषा में गूढ़ बात कहने का अदभुद कमाल देखिये। ऋग्वेद 7/33/11 के अनुसार मित्र-वरुण का उर्वशी अप्सरा को देख कर वीर्य स्खलित हो गया। वह घड़े में जा गिरा, जिससे वसिष्ठ ऋषि पैदा हुए।

इस गूढ़ बात का असली अर्थ क्या है, अब ज़रा ध्यान दीजिये। ऋग्वेद 5/41/18 के अनुसार उर्वशी बिजली हैं और वसिष्ठ वर्षा का जल है। यानि जब आकाश में ठंडी-गर्म हवाओं (मित्र-वरुण) का मेल होता हैं तो आकाश में बिजली (उर्वशी) चमकती हैं और वर्षा (वसिष्ठ) की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार से ऋग्वेद की अलंकारिक कला का एक और उदहारण देखिये। ऋग्वेद १/१६४/३३ और ऋग्वेद ३/३/११ में कहा गया है कि प्रजापति अपनी दुहिता (पुत्री) उषा और प्रकाश से सम्भोग करने की इच्छा व्यक्त करते हैं, जिसे रूद्र विफल कर देते हैं, तब प्रजापति का वीर्य धरती पर गिर कर नाश हो जाता है। यहाँ पर प्रजापति का अर्थ सूर्य और उसकी पुत्री उषा का अर्थ प्रातःकाल के सूर्य की लालिमा है। वीर्य का अर्थ वर्षा है। सूर्य और उसकी पुत्रियों के सहयोग से वर्षा होती है। हिन्दू धर्म के आलोचक रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रंथो का प्रमाण देकर कहते हैं कि स्वर्ग का राजा इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या पर आसक्त होकर उससे सम्भोग किया।

इस कथा में अलंकारिक रूप से इन्द्र सूर्य हैं, अहिल्या रात्रि हैं और गौतम चंद्रमा है। चन्द्रमा रूपी गौतम और रात्रि रूपी अहिल्या का संबंध इंद्र रूपी सूर्य के आते ही ख़त्म हो जाता है। अलंकारिक भाषा में यही बात कही गई है। यह झूठ है कि वैदिक समाज में मादक द्रव्यों व नशे का प्रयोग होता था और वो जुआ खेलने तथा जादू-टोना करने के आदि थे। ये भी मनगढंत बात है कि आर्य खुलेआम सेक्स करते थे और यहाँ तक कि वो पशुओं से भी सम्भोग करते थे। यदि आर्य ये सब घृणित कर्म करते तो ज्ञान से लेकर विज्ञान तक हर क्षेत्र में असीम उन्नति नहीं करते। उनके समय में उन रहस्य्मय और दिव्य वेदों की रचना भी नहीं हो पाती, जिसका वास्तविक अर्थ पूरी तरह से समझने में विद्वान आज भी असमर्थ हैं। अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि हिन्दू धर्म एक समुद्र की तरह से है, इसमें गोता लगाओ तो सिर्फ कमियां ही नहीं मिलेंगी, बल्कि दिव्य ज्ञान रूपी हीरे जवहाररात भी मिलेंगे। मेरे भाई उसे ढूंढों। इस भ्रम में भी मत रहना कि हिन्दू धर्म में वेद का अर्थ मात्र चार पुस्तकें हैं। यहाँ पर वेद का अर्थ है सत्य का ज्ञान, जो किसी भी भक्त के ह्रदय में कभी भी प्रकट हो सकता है।
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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 1, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आप हमारी संस्कृति और धर्म तथा वेदों की अति सुंदर व्याख्या करते हैं मैं अधिक नहीं समझ पाती परन्तु आप सरल कर समझा रहें है | बच्चे वैसे ही धर्म से विमुख हो रहे हैं |रहमान ने ईरानी फिल्म में संगीत दिया ईरान में फिल्म चल रही है परन्तु फतवे भारत में जारी हो रहे हैं हमारे धर्म पर आघात करते हैं तो हमारे अपने बाली वुड वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं मुस्लिम अपनी कटटरता से अपने आप को बचा कर दूसरे धर्मों पर आघात करते हैं बहुत कुछ जानती हूँ बहुत पढ़ा है परन्तु कह नहीं सकती | वेदों की अर्नगल व्याख्या पर मन दुखता है आर्य समाज वाले वेदों की बात करते हैं विद्वानों से उसकी सही व्याख्या क्यों नहीं करवाते | बस मूर्ति पूजा की बुराई करते हैं |

sadguruji के द्वारा
October 1, 2015

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! हर मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए ! हिन्दू धर्म व् संस्कृति के प्रति जो मेरा कर्तव्य है, उसे निभाने की कोशिश कर रहा हूँ ! आपने एक कड़वी सच्चाई बयान की है, “वेदों की अर्नगल व्याख्या पर मन दुखता है आर्य समाज वाले वेदों की बात करते हैं विद्वानों से उसकी सही व्याख्या क्यों नहीं करवाते | बस मूर्ति पूजा की बुराई करते हैं |” यही सब देखकर मैंने सच्चाई लोंगो तक पहुंचाने के लिए एक छोटी से कोशिश शुरू की है ! आपके सहयोग और समर्थन के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

जबसे सर्वोच्च न्यायालय ने अविवाहित सहजीवन यानि अविवाहित “मस्ती” को वैध ठहराया है, तबसे भारतीय संस्कृति और मर्यादा के विरोधी ख़ुशी के मारे उछल रहे हैं ! बहुत से बुद्धिजीवी इसे आधुनिक युग की जरूरत बता रहे हैं। हालाँकि ये बात अलग है कि उन अतिआधुनिक बुद्धिजीवियों के अपने घर में यदि कोई ऐसा करे तो वे उसे न स्वीकार कर पाएंगे और न ही झेल पाएंगे !

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

“कामसूत्र” के रचयिता आचार्य वात्स्यायन ने भी बिना विवाह किये परस्त्री गमन को गलत ठहराया है ! कामसूत्र में वे कहते हैं, “राजाओं, मंत्रियों, वरिष्ठों को उचित है कि वे परस्त्री गमन जैसे निन्दनीय कार्य में प्रवृत्त न हों !” और वे आगे कहते हैं, “पराई स्त्रियों से संबंध दोनों लोकों को नष्ट करता है।”

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

आज के कुछ अतिआधुनिक लोग जो अविवाहित सहजीवन वाली जिंदगी जी रहे हैं ! वो लोग वैदिक काल में एक परिवार के बीच आपसी यौन-संबंधों की झूठी बात करते हैं, जबकि वो इस बात को भूल जाते हैं कि वैदिक काल से पूर्व ही सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लग गया था ! एक ही गोत्र में शादी करने पर संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात से ही पाये जाने पर ये पाबंदी लगाई गई थी !

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

आधुनिक नारी अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि वैदिक काल में उसे इसका समाधान मिल गया था ! ऋग्वेद का ये मंत्र समाज में उसकी गौरवान्वित स्थिति बयान करता है ! ”जायेदस्तम् मघवनत्सेदु योनिस्तदित त्वा युक्ता हस्यो वहन्तु। यदा कदा च सुनवाम् सोममग्निष्टवा द्रतो धन्वात्यछा।(ऋ 3.83.4)। भावार्थ यह है कि पत्नी ही घर होती है। वहीं घर में सब लोगो का आश्रय स्थान है। स्त्री के कारण ही परिवार का संगठन होता है।

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

वेदों में बहिन भाई या पिता-पुत्री के व्यभिचार का कितना कठोर दंड हैं, इसका एक उदहारण देखिये ! अथर्ववेद [xv] में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘यदि तुझे सोते समय स्वप्न में भी तेरा भाई अथवा तेरा पिता भूलकर भी प्राप्त हों तो वे दोनों गुप्त पापी औषधि प्रयोग से नपुंसक करके मार डाले जाएँ !’

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

भाई-बहन के आपसी यौन-संबंधों की बात भी पूर्णत: झूठी है ! वैदिक काल में भाई-बहन की बात तो दूर रही, मौसी की लडकी, मामी की लडकी बुआ की लडकी आदि जैसे सगे सम्बन्धियों की कन्या से भी यौन-सम्बन्ध बनाना निषेध था ! भाई-बहन के यौन-संबंध की तो स्पष्ट रूप से मनाही थी ! ”पापामाहुर य: स्वसार निग्च्छात”-अथर्ववेद १८/१/१४ अर्थात “वो पापी है जो बहन से सम्बन्ध या विवाह करता है !”

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

कन्या को वेदों में दुहिता कहा है जिसका अर्थ है– ”दुहिता दुर्हिता दुरे हिता भवतीत” अर्थात जिसका दूर (गोत्र या देश ) में विवाह होना ही हितकार हो ! वैदिक काल में जब कन्या का विवाह दूर होना हितकारी माना जाता था, तब पिता-पुत्री और भाई-बहन के आपसी संबंधों कि बात करना ही मूर्खता है !

sadguruji के द्वारा
October 2, 2015

अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि हिन्दू धर्म एक समुद्र की तरह से है, इसमें गोता लगाओ तो सिर्फ कमियां ही नहीं मिलेंगी, बल्कि दिव्य ज्ञान रूपी हीरे जवहाररात भी मिलेंगे। मेरे भाई उसे ढूंढों। इस भ्रम में भी मत रहना कि हिन्दू धर्म में वेद का अर्थ मात्र चार पुस्तकें हैं। यहाँ पर वेद का अर्थ है सत्य का ज्ञान, जो किसी भी भक्त के ह्रदय में कभी भी प्रकट हो सकता है।

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 5, 2015

बहुत सुन्दर और सार्थक रचना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हुयी कभी इधर भी पधारें

sadguruji के द्वारा
October 6, 2015

आदरणीय मदन मोहन सक्सेना जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट को पसंदकर उसे सार्थकता प्रदान करने के लिए सादर आभार ! ऐसे विषय पर हर स्वाभिमानी हिन्दू को विचार करना चाहिए ! आपके ब्लॉग पर जरूर आऊंगा ! निमंत्रण देने के लिए सादर धन्यवाद !

deepak pande के द्वारा
October 6, 2015

ये सब महज़ धर्म को बदनाम करने की समाज विरोधी लोगों की करतूत है जो पब्लिसिटी के लिए कुछ भी कर सकते हैं

sadguruji के द्वारा
October 8, 2015

आदरणीय दीपक पांडे जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपने सही कहा है कि ये सब हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए और पब्लिसिटी हासिल करने के लिए किया जा रहा है ! सादर आभार !


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