सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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ऐसे बुद्धिजीवी ब्राह्मण और हिन्दू होने का बोझा भी त्याग दें

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ऐसे बुद्धिजीवी ब्राह्मण और हिन्दू होने का बोझा भी त्याग दें

आज के समय में गोवध और गोमांस का समर्थन करने वाले और हिन्दुओं को इस मुद्दे पर खुला चैलेन्ज देने वाले देश के ऐसे कई प्रसिद्द लोग हैं, जो जन्म से ब्राह्मण हैं। कई बुद्धिजीवी जिनसे अक्सर मेरी भेंट होती है, वो इस मुद्दे पर चर्चा छिड़ते ही हँसते हुए पूछने लगते हैं, “क्या हो गया है देश के कुछ बुद्धिजीवी ब्राह्मणों को? जो मिडिया पर अपने गोमांस खाने की खुलकर चर्चा करने लगे हैं और तरह तरह के तर्क देकर गोमांस खाने की वकालत कर रहे हैं। वो लोग हिन्दुओं को उकसाकर देश में अराजकता फैलाने वाला और गोहत्या को बढ़ावा देने वाला घृणित और अत्यंत निंदनीय कार्य कर रहे हैं।”
उनकी बातों से सहमति जताते हुए मैं भी इस सोच में डूब जाता हूँ कि हिन्दू समाज को सनातन काल से तप और संयम का सन्मार्ग दिखाने वाले ब्राह्मण समाज में ये चार्वाक के अवतार कहाँ से उत्पन्न हो रहे हैं। कहीं मैंने पढ़ा था कि ब्राह्मण कुल में जन्मे चार्वाक दुर्योधन के परम मित्रों में से एक थे। दुर्योधन की दुर्गति का कारण चार्वाक की गलत सलाह भी थी। कहा जाता है कि ब्राह्मणों को रुष्ट करने के कारण उनके तेज़ से वह जलकर भस्म हो गया था, किन्तु सूक्ष्म शरीर से वो आज भी सर्वत्र विद्यमान है। उसे कहीं राक्षस तो कहीं शैतान भी कहा गया है।

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जी ने पहले हिंदुआें के गोमांस खाने की बात की और बाद में सफाई दी- “मेरे मुंह से शैतान ने गोमांस खाने वाली बात बुलवाई थी। ‘गोवध’ करने और ‘गोमांस’ खाने जैसे अत्यंत संवेदनशील मुद्दे पर शैतान ने लालू जी को ही नहीं बल्कि देश के कई नेताओं, कुछ बुद्धिजीवियों और यहाँ तक कि दुनियाभर के अनगिनत मांसाहारियों को परेशान कर रखा है। सवाल ये है कि ये शैतान है कहाँ पर? हर मनुष्य के मन के भीतर भगवान के साथ साथ शैतान भी बैठा हुआ है। मन में अहंकार, नास्तिकता और क्रूरता के भाव पैदा होने पर उसे कुसंगति और कुमार्ग की ओर जाने को प्रेरित करता है।

हिन्दू धर्म में इसलिए कहा गया है कि मन के अंदर राम हैं तो रावण भी है। हम जिससे प्रभावित होंगे, उधर चल पड़ेंगे। मुस्लिम भाई भी मानते हैं कि शैतान का अस्तित्व है और वो सूक्ष्म रूप में हमारे भीतर विद्यमान रहता है। उसका कार्य ही यही है कि इंसान को ईश्वर, इंसानियत और अच्छाई से विमुख कर अहंकार, बुराई और विनाश की ओर अग्रसर करो। काम, क्रोध, लोभ, मोह, नशा, पशुता, क्रूरता, अहंकार और ईर्ष्या-द्वेष ये सब शैतान के अस्त्र-शस्त्र हैं। यही वजह है कि हर धर्म ने मन के भीतर बैठे शैतान के झांसे में न आने और उसके अस्त्र-शस्त्र से बच के रहने की सलाह दी है।

एक सम्मानित लेखक ने अपने ब्लॉग में भवभूति के प्रसिद्ध नाटक ‘उत्तररामचरित’ के माध्यम से संत वशिष्ठ या वशिष्ठ मुनि के मांसाहारी होने की बात कहते हुए यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि प्राचीन भारत में अतिथि का सत्कार माँस से किया जाता था। उन्हें सत्य को जानने के लिए वाल्मीकि रामायण के बाल कांड सर्ग ५२ एवं सर्ग ५३ श्लोक १-६ का अध्ययन करना चाहिए, जिसमे बताया गया है कि जब ऋषि विश्वामित्र ऋषि वशिष्ठ जी के आश्रम में पधारते हैं तब ऋषि वशिष्ठ ऋषि विश्वामित्र जी का सत्कार माँस आदि से नहीं अपितु सब प्रकार से गन्ने से बनाये हुए पदार्थ, मिष्ठान, भात, खीर, दाल और दही आदि से करते हैं। यहाँ पर माँस आदि का किसी भी प्रकार से कोई उल्लेख नहीं हैं। अतः वाल्मीकि रामायण उनकी बात को मिथ्या साबित करती है।

उन्होंने अपने ब्लॉग में राजा रन्तिदेव का जिक्र करते हुए कहा है कि वो एक अच्छा मेजबान राजा था, जो अपने अतिथियों के लिए हर दिन २०,१०० जानवरों का कत्ल करवाता था। यह भी झूठी बात है। महाभारत के अनुशासन पर्व के जिन पांच श्लोकों में बहुत से राजाओं के नाम गिनाये गए हैं जिन्होंने कभी मांस नहीं खाया, उसमे राजा रन्तिदेव का नाम भी है। सोचने वाली बात है कि जिस राजा ने अपने जीवन में कभी मांस नहीं खाया, उसकी पाकशाला में प्रतिदिन २०,१०० पशुओं की हत्या मांस के लिए की जा सकती है?

सत्य जानने के लिए नारद जी और संजय के मध्य हुए इस संवाद पर गौर कीजिये, जिसमे नारद जी संजय से कहते हैं, “संजय! सुना है कि संकृति के पुत्र रन्तिदेव भी जीवित न रह सके। उन महामना के दरबार में दो लाख रसोइये थे जो घर आये हुए अतिथियों को दिन रात कच्चे और पक्के उत्तम अन्न से बने हुए भोजन दिन रात परोसते थे।” नारद जी की बात से स्पस्ट है कि राजा रन्तिदेव के यहाँ अतिथियों को अन्न परोसा जाता था, मांस या गोमांस नहीं।

ब्राह्मण सनातन काल से ही हिन्दू समाज को सही मार्गदर्शन देने का कार्य करते रहे हैं, इसलिए वो सदैव पूजनीय रहे हैं और हिंदू समाज में उनका स्थान ऊंचा रहा है। किन कारणों से ऊंचा रहा है, उसपर विचार किया जाये। हिन्दुओं के सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रन्थ वेद के इन मंत्रों को देखिये-
यजुर्वेद के २२वें अध्याय के २२वें मन्त्र में ईश्वर से प्रार्थना कि गई है कि ‘आ ब्रह्मन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्’ अर्थात ब्रह्मतेज से युक्त ब्राह्मण हिंदू समाज में उत्पन्न हों। जो भगवान के बारे में जाने, उसमे लीन हों और हिन्दू समाज में भगवान का प्रचार-प्रसार करें।

ब्राह्मणों को वेदों में कितना सम्मान दिया गया है, इस मंत्र में देखिये- ‘पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसव: समिंधंतां पुनर्ब्रह्मणो वसुनीथ यज्ञै:’ (यजु. 12/44) इस मन्त्र में बताया गया है कि यज्ञ आदि में रूद्र व् आदित्य आदि देवताओं के बाद ब्राह्मणों का ही नाम लिया जाता है।

भगवान मनु भी ब्राह्मणों को सम्मान देते हुए मनुस्मृति में लिखते हैं कि-
विधाता शासिता वक्तास मैत्रो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥
‘शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करनेवाला, शिष्यादि का तारण कर्ता, वेदादि का वक्ता् और सर्व प्राणियों की हितकामना करनेवाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं’ (मनु; 11-35)।

भगवान मनु ब्राह्मण होने की परिभाषा देते हुए मनुस्मृति में कहते हैं कि-
यक्षरक्षःपिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम् ।
तद्ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानां अश्नता हविः ।। ११.९५[९४ं] ।।
मद्य, माँस आदि यक्ष, राक्षस और पिशाचों का भोजन हैं। देवताओं की हवि खाने वाले ब्राह्मणों को इसे कदापि न खाना चाहिए। मनु स्मृति ११/७५

अंत में यजुर्वेद के एक मन्त्र का जिक्र करना चाहूंगा-
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजन्य: कृत:।
उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ:यां शूद्रो अजायत॥(यजु. 32/12)।
अर्थात ‘विराट् भगवान के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ, अथवा मुख स्थानीय हुआ, क्षत्रिय बाहु से या बाहुस्थानीय, वैश्य जंघा से अथवा जंघा स्थानीय और शूद्र पाँव से अथवा पाँवस्थानीय।’

ब्राह्मण सर्वव्यापी भगवान के मुख से उत्पन्न हुए हैं, मेरी समझ से इसका अर्थ ये है कि ब्राह्मण भगवान के मुख हैं, ब्राह्मण समाज का ये धर्म है कि वो अध्ययन करके भगवान के बारे में जाने और तप करके भगवान में लीन हो उनकी बात सुने और उसके बारे में हिन्दू समाज को बताएं। समय के परिवर्तन के साथ साथ ब्राह्मणों का कार्यक्षेत्र भी बदला है। आज भले ही ब्राह्मण समाज धर्म के अतिरिक्त अन्य बहुत सारे कार्य व्यवसाय या नौकरी कर रहे हैं, किन्तु अपने मूल कर्तव्य ईश्वर स्मरण और हिन्दू समाज का मार्गदर्शन करने से वो भाग नहीं सकते हैं। ये उनका संस्कारगत और नैसर्गिक कर्म है।

इस सत्य में मेरी दृढ धारणा है कि ‘जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।’ महर्षि मनु महाराज का कथन है कि मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा अच्छे ज्ञान और संस्कार से ही द्विज बनता है और ‘ब्रह्म जानाति ब्राह्मण:’ अर्थात ब्रह्म को जानने के बाद ही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी होता है। इस युग में ब्राह्मण कुल में जन्म न लेकर भी अनगिनत लोगों ने इस बात को सत्य सिद्ध किया है। उन सबको मेरा नमन। जिनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है, उनमे से कुछ लोग क्यों भौतिकता, भोगविलास और जीभ के स्वाद के आगे अपना ब्राह्मणत्व त्याग रहे हैं और हिन्दू समाज को गलत और भ्रमित करने वाला संदेश दे रहे हैं, ये तो उन्हें ही सोचना होगा।

यदि अतिआधुनिक होने की दौड़ में वो ये सब कर रहे हैं तो ब्राह्मण और हिन्दू होने का बोझा क्यों ढ़ो रहे हैं, इसे भी त्याग दें। नहीं तो फिर एक दिन हिन्दू धर्म के हित के लिए हिन्दू समाज को ही उनका सामाजिक बहिष्कार करना पड़ेगा। ‘गोवध’ और ‘गोमांस’ जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर उलजुलूल वक्तव्य देने वाले नेताओं, बुद्धिजीवियों और अभिनेताओं के खिलाफ सख्त से सख्त क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए, क्योंकि ये लोग अशोभनीय और निंदनीय बोल बोलकर हिन्दू समाज में न सिर्फ फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि देश में अशांति और अराजकता का माहौल भी पैदा कर रहे हैं।

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 8, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आज के बुद्धि जीवी तर्क के लिए कुतर्क करते हैं अपने आप को विद्वान सिद्ध करने के लिये बड़ी -बड़ी बातें करते हैं | एक समय ऐसा था जिसे इतिहास में स्टोन ऐज कहते हैं इन्सान पत्थरों से शिकार करता था कच्चा मॉस खाता था नर भक्षी भी था क्या हम अपने तर्क के लिए कहें मानव ऐसे भी मॉस खा सकता है | मॉस भक्षियों को खाने के लिए ऐसी इस लिए मिलता है कम हिन्दू मीट खाते हैं जिन्होंने खाया भी हैं तो छोड़ भी दिया हमारे धर्म में गाय को माता मानते हैं मुस्लिम इस लिए जिद करते हैं वह सस्ती पड़ती है यदि हर इंसान मांसभक्षी हो जाएगा फिर तो की अन्य देशों के समान चूहे अन्य जीव जंतु खाने की खाने की नौबत आ जायेगी कम से कम गाय माता को तो बक्श दे

sadguruji के द्वारा
October 8, 2015

आदरणीय डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! बहुत सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया आपने दी है ! समय निकालकर ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 9, 2015

श्रद्धेय सद्गुरु जी , सादर श्री हरि स्मरण ! आप का आलेख बहुत कुछ कह गया | आज के परिप्रेक्ष्य में बिलकुल सटीक ! हार्दिक आभार !!

Dr Shailesh G के द्वारा
October 9, 2015

सद्गुरु जी, आप भी काशी से हैं, जानके अच्छा लगा. जो बात आपने कही है, शास्त्रीय उद्धरणों के माध्यम से, सत्य है. जो ब्राह्मण का आपने सन्दर्भ दिया है वो भी उपयुक्त है, पर आपने कैसे मान लिया कि अभी जितने खुद को ब्राह्मण कहते हैं वो ब्राह्मण हैं ही ? वो हिन्दू भी नहीं, वास्तव में वो भारतीय ही नहीं हैं . उत्सुकता निवारण के लिए मेरे लेख की प्रतीक्षा करें .. धन्यवाद डा शैलेश. काशी

deepak pande के द्वारा
October 9, 2015

is desh ko utna nuksaan aam aami kee chuppi se nahee hua jitna sasti lokpriyta chahne waale buddijeevion ke badbolepan se hua

sadguruji के द्वारा
October 10, 2015

आदरणीय आचार्या विजय गुंजन जी ! सादर अभिनन्दन ! देश के कुछ बुद्धिजीवियों और जानी-मानी हस्तियों के द्वारा गोमांस खाने का प्रचार-प्रसार करने मैं बहुत दुखी था ! इस विषय में चुप रहना ठीक नहीं था ! आपने लेख के इस मर्म को समझा, इसके लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 10, 2015

आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी ! सादर अभिनन्दन ! मैंने ब्लॉग बुलेटिन पर जाकर देखा ! बहुत अच्छा लगा ! साहित्य के प्रति आपका प्रेम बहुत अनुपम है ! इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 10, 2015

आदरणीय डॉक्टर शैलेश जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! इस समय जो सत्य सामने है, उसे ही स्वीकार करना होगा ! रही बात आपके शोधपूर्ण लेख की तो उसे जरूर पढ़ा जाएगा ! ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
October 10, 2015

आदरणीय दीपक पांडे जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! पब्लिसिटी हासिल करने के लिए गोमांस खाने की घोषणा करना और हिन्दुओं को चुनौती देना बेहद अशोभनीय और निंदनीय कर्म है ! ऐसे लोंगो के खिलाफ क़ानूनी कार्यवाही जरूर होनी चाहिए ! ब्लॉग पर आने के लिए सादर आभार !

Santlal Karun के द्वारा
October 12, 2015

आदरणीय सद्गुरु जी, आप ने ज्वलंत तथा प्रासंगिक विषय को उठाया है | इस शोधपूर्ण और पठनीय आलेख के सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

sadguruji के द्वारा
October 12, 2015

आदरणीय संतलाल करुण जी ! हार्दिक भिनन्दन ! अभिनन्दन ! पोस्ट को पसंदकर लेख को महत्ता और सार्थकता प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार !

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 12, 2015

सदगुरू जी आपका यह लेख काबिलेतारिफ है । बहुत ही गहन विवेचना व विश्लेषण से परिपूर्ण यह लेख पठनीय है । हिंदुओं मे ऐसे लोगों की कमी नही जो हिंदु धर्म को बदनाम कर रहे हैं । लेकिन जब तक आप जैसे लोग धर्म पर अपनी लेखनी चलाते रहेंगे दुष्प्रचार से कुछ नही होगा । यह कलयुग का प्रभाव है कि अपने ही धर्म पर इस तरह की बातें की जा रही हैं । यह इन लोगों के मानसिक दिवालियेपन का प्रतीक है । तथ्यपरक इस लेख के लिए आपको पुन: बधाई ।

sadguruji के द्वारा
October 14, 2015

आदरणीय एल.एस. बिष्ट् जी ! हार्दिक अभिनंदन ! आपने लेख का गंभीरता से अध्ययन किया और इसके मर्म को समझा ! इसके लिए आपका ह्रदय से आभारी हूँ ! आपने सही कहा है कि हिन्दू धर्म के प्रति कुछ बुद्धिजीवियों निम्न स्तर की सोच एक तरह का मानसिक दिवालियापन ही है ! ऐसी विषम परिस्थिति में निश्चित रूप से हम लोंगो को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए ! ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार !


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