सद्गुरुजी

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धर्मनिरपेक्ष लेखक "दोहरे मानक" अपना रहे हैं - जागरण मंच

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धर्मनिरपेक्ष लेखक “दोहरे मानक” अपना रहे हैं – जागरण मंच

बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा रहे भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लेखकों पर ‘दोहरे मानक’ अपनाने का आरोप लगाया है। भारत में निर्वासन की जिन्दगी बिता रहीं इस चर्चित लेखिका ने कहा है कि भारतीय लेखक अपनी असहमति को लेकर दोहरे मानक अपनाने के दोषी हैं। एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत के अधिकांश धर्मनिरपेक्ष लोग कट्टर मुस्लिम समर्थक और पूरी तरह से हिन्दू विरोधी हैं। वे हिन्दू कट्टरपंथियों के कामों पर तो विरोध प्रदर्शन करते हैं, पर मुस्लिम कट्टरपंथियों की घृणित कार्रवाइयों का बचाव करते हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश लेखक उस समय चुप थे जब पश्चिम बंगाल में मेरी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया गया, जब मेरे खिलाफ भारत में पांच फतवे जारी किए गए, जब मुझे पश्चिम बंगाल से बाहर निकाल दिया गया, जब मैं दिल्ली में घर में महीनों कैद रही, मुझे भारत छोडऩे को मजबूर किया गया और मेरे सीरियल पर भी रोक लगाई गई।

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बांग्लादेश की विवादित और चर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस भेंटवार्ता में कहा कि मैंने जीवन के अधिकार के लिए और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अकेले ही रहकर संघर्ष किया। भारत के धर्मनिरपेक्ष लेखक उस समय न केवल चुप थे बल्कि सुनील गांगुली और शंख घोष जैसे प्रख्यात लेखकों ने तो पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य से यह अपील तक की कि वे मेरी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाएं। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या आप मानती है कि प्रधानमंत्री को उस समय ज्यादा सहानुभूति के साथ बोलना चाहिए जब मुसलमान और भारतीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का मामला हो? तस्लीमा नसरीन ने कहा कि भारत में राजनीतिक नेता वोटों की खातिर लोगों को खुश रखते हैं। मुसलमानों को ज्यादा तवज्जो दिए जाने से अनेक हिन्दू नाराज हो जाते हैं। भारत में मुस्लिमों के उत्पीड़न के बारे में उन्होंने कहा कि यह सच है कि भारत में मुसलमानों को कभी कभी उनके मुसलमान होने के कारण उत्पीडि़त किया जाता है।

लेकिन यह अन्य धर्मों के लोगों के साथ भी होता है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष २०१३ में मुस्लिम धर्मान्ध लोगों द्वारा पश्चिम बंगाल के एक गांव में बहुत से हिन्दुओं के घर जला दिए गए थे। उन्होंने कहा कि भारत में यदि मुसलमानों को निर्दयता से प्रताडि़त किया गया होता तो वे भारत छोड़कर पडो़सी मुस्लिम देशों की ओर रुख कर गए होते जिस तरह से हिन्दू अल्पसंख्यक निर्दयता से प्रताड़ित किये जाने पर विभाजन के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गए थे। इस साक्षात्कार की सबसे विशेष बात यह रही कि तस्लीमा नसरीन ने हाल ही में साहित्यकारों द्वारा अपने साहित्य पुरस्कार लौटाए जाने के मुद्दे पर उनकी पोलपट्टी खोलते हुए कहा है कि भारत के धर्मनिरपेक्ष लेखक अपनी असहमति को लेकर दोहरे मानक अपनाने के दोषी हैं। एक तरफ वो कट्टर मुस्लिम समर्थक हैं तो दूसरी तरफ घोर हिन्दू विरोधी। इस बातचीत में तस्लीमा नसरीन ने देश के उन तथाकथित सेकुलर बुद्धिजीवियों को बेनकाब किया है, जिनकी विचारधारा कभी भारत विरोधी रहती है तो कभी हिन्दू विरोधी।

आज वो लोग देश में साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता बढ़ाने का मोदी जी पर झूठा आरोप लगा रहे हैं, जबकि सच ये है कि कांग्रेस के शासनकाल में साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता आज से कहीं ज्यादा थी। कांग्रेस के शासनकाल में वामपंथी और नेहरूवादी विचारधारा न सिर्फ पूजित होती रही, बल्कि पुरस्कृत भी। उस समय धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दू विरोधी प्रचार-प्रसार अपने चरम पर था। चाहे प्रोफेसर कलबुर्गी हों, कामरेड पानसरे हों या डा नरेन्द्र दाभोलकर हों, तीनों ही वामपंथी विचाधारा के थे और मूर्तिपूजा की घोर मुखालिफत करते थे। दो हजार चौदह में प्रोफेसर कालबुर्गी ने मूर्ति पूजा के विरोध में एक बेहद आपत्तिजनक बयान दिया था। तब उन्होंने कहा था कि बचपन में वो भगवान की मूर्तियों पर पेशाब करके ये देखा करते थे कि वहां से कैसी प्रतिक्रिया मिलती है। उनके इस बयान ने करोड़ों मूर्तिपूजकों की भावनाओं को आहत किया था। वो लिंगायत समाज के अराध्य बासव और उनकी पत्नी व बेटी के बारे में भी विवादित लेखन किये थे, जिसका लिंगायत समाज के द्वारा भारी विरोध करने पर उन्हें लिंगायत समुदाय से माफ़ी मांगनी पड़ी थी।

तीनों के ही क़त्ल की जितनी भी निंदा की जाये वो कम है, क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष की विचारधारा से एक बड़े समुदाय की भावनाएं आहत होने पर कानून की शरण लेनी चाहिए, जहांपर उसके लिए सुनवाई का क़ानूनी प्रावधान है, किन्तु यह सरासर गलत है कि किसी का कत्ल कर दिया जाए। प्रोफेसर कलबुर्गी, कामरेड पानसरे और डा नरेन्द्र दाभोलकर के समर्थक कहते हैं कि वो लोग समाज में वैज्ञानिक सोच का प्रचार-प्रसार कर रहे थे और पुरानी रूढ़ियों को ख़त्म करने की कोशिश कर रहे थे। रूढ़ियों को ख़त्म करने का उनका तरीका सही नहीं होने पर भी चलिए हम ये मान लेते हैं कि वो एक अच्छा कार्य था, परन्तु फिर ये सवाल पैदा होता है कि क्या रूढ़ियाँ हिन्दू धर्म में ही हैं अन्य धर्मों में नहीं हैं? आप उनकी आलोचना करने से क्यों बचते हो? किसी धर्म विशेष की ही आलोचना कर आप धर्मनिरपेक्ष कहाँ रह जाते हो? आप कबीर साहब की तरह सभी धर्मों की बुराइयों और सदियों से चलीं आ रही सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार कीजिये। दरअसल सच ये है कि मोदी जी के सत्ता में आने के बाद से हिंदूवादी संगठनों के मजबूत होने से हिन्दू-विरोधी अभियान पर अंकुश लगा है। यही सबसे बड़ी तकलीफ सेकुलर बुद्धिजीवियों को है।

साहित्य अकादमी और अन्य पुरस्कार वापस कर वो एक तरह से अपनी खीझ मिटा रहे हैं और अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। कोई उनसे पूछे कि देश में सम्प्रायिक सदभाव कायम करने के लिए वो लोग कितने घरों में गए हैं या फिर साम्प्रदायिकता से पीड़ित कितने लोंगो की उन्होंने मदद की है? इस सवाल के जबाब में वो लोग चुप हो जायेंगे। कांग्रेस और अन्य दलों के शासनकाल में सुख-सुविधा और पुरस्कार सम्मान भोगने के आदि हो चुके वो लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि मोदी सरकार के शासनकाल में उन्हें ये सब आसानी से मिलने वाला नहीं है। केंद्र व राज्यों की साहित्य अकादमी और उसके द्वारा वितरित पुरस्कार वर्षों से किस तरह से लेखकों और नेताओं की पक्षपातपूर्ण राजनीति का शिकार होते चले आ रहे हैं, ये सभी जानते हैं। महंत आदित्यनाथ जी के हाथों पुरस्कृत होने वाले एक साहित्यकार ने इसे कभी “कुत्ते की हड्डी” तक कहा था। यदि ये सही है, फिर तो पुरस्कार लौटाकर इससे छुटकारा पाना ही अच्छा है, भले ही देश में साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता बढ़ने का झूठा बहाना ही क्यों न बनाया जाये, जिसे वस्तुतः बढ़ाने का काम देश के सेकुलर बुद्धिजीवी और सेकुलर मीडिया बखूबी कर रहे हैं।

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

हिंदी के प्रख्यात मार्क्‍सवादी आलोचक डॉक्टर नामवर सिंह का कहना है कि लेखक अख़बारों में सुर्खियां बटोरने के लिए इस तरह पुरस्कार लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि लेखक क्यों पुरस्कार लौट रहे हैं। अगर उन्हें सत्ता से विरोध है तो साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, क्योंकि अकादमी तो स्वायत संस्था है और इसका अध्यक्ष निर्वाचित होता है। यह देश की अन्य अकादमियों से भिन्न है। आखिर लेखक इस तरह अपनी ही संस्था को क्यों निशाना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि लेखकों को साहित्य अकादमी के पुरस्कार नहीं लौटाने चाहिए, बल्कि उन्हें सत्ता का विरोध करने के और तरीके अपनाने चाहिए, क्योंकि साहित्य अकादमी लेखकों की अपनी निर्वाचित संस्था है।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

दादरी कांड के बहाने देशभर के कई वरिष्ठ साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है और पुरस्कार व् सम्मान लौटाने का यह क्रम अभी भी जारी है. इस मामले में प्रतिक्रिया देते हुए हिंदी के लेखक और विद्वान नामवर सिंह ने कहा है कि मैं सभी साहित्यकारों का सम्मान करता हूं, लेकिन उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस नहीं करने चाहिए. उन्होंने कहा कि यह पुरस्कार उन्हें सरकार नहीं बल्कि साहित्य अकादमी द्वारा दिया जाता है.

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राना ने कहा है कि, “लोग घुमाकर बहस को नरेंद्र मोदी पर ले जाते हैं लेकिन मुल्क का माहौल ख़राब करने के लिए नरेंद्र मोदी नहीं बल्कि देश के लोग ज़िम्मेदार हैं. नफ़रत के इस माहौल को दूर करने की ज़िम्मेदारी सभी नागरिकों पर है.”

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

उर्दू के जाने माने शायर मुनव्वर राना ने अपना साहित्य अकादमी अवॉर्ड लौटाने का ऐलान करते हुए कहा है कि “ये सरकार के ख़िलाफ़ विरोध नहीं है, ये समाज के ख़िलाफ़ विरोध है, लेकिन समाज की देखभाल सरकार करती है. अगर सौ आदमी ये फ़ैसला करें कि इसके घर में गाय का या भैंस का गोश्त है या इसने लव जेहाद किया है. इसका मतलब ये है कि सरकार या पुलिस की कोई भूमिक नहीं रह गई है.”

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

केवल दो ऐसे मशहूर साहित्यकार हैं जो आपातकाल और १९८४ के दंगों के विरोध में अपना सम्मान लौटाए थे। आपातकाल के विरोध में हिन्दी के मशहूर कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु ने पद्मश्री लौटाया था जबकि १९८४ के दंगों के विरोध में जाने-माने पत्रकार एवं अंग्रेजी के लेखक खुशवंत सिंह ने पद्मभूषण लौटाया था।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

संचार एवं प्रोद्यौगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कुछ दिन पहले कहा था कि लेखकों ने आपातकाल में पुरस्कार नहीं लौटाए, 1984 के दंगों के विरोध में पुरस्कार नहीं लौटाए और मुजफ्फरनगर में हुए दंगे के विरोध में भी उन्होंने पुरस्कार नहीं लौटाए। बड़ी-बड़ी घटनाएं हुई, लेकिन उन्होंने पुरस्कार नहीं लौटाए। उन्होंने कहा कि वह लेखकों की विद्वता का सम्मान करते हैं। उन्हें उनकी योग्यता के लिए पुरस्कार मिलते हैं तो उन्हें भी पुरस्कारों का सम्मान करना चाहिए।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

केंद्रीय विदेश और कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्यमंत्री वीके सिंह ने कहा कि पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकारों ने 20 वर्षों तक तो पुरस्कारों का फायदा उठाया और अब अवार्ड लौटा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया की ओर से जिस तरह से चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया या किया जा रहा है, वह ठीक नहीं है। धार्मिक असहिष्णुता की घटनाएं पहले भी हुई हैं। मीडिया को लोगों के सामने खबरें सोच-समझकर परोसनी चाहिए।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

केंद्रीय विदेश और कार्यक्रम क्रियान्वयन राज्यमंत्री वीके सिंह ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ये साहित्यकार उस वक्त कहां थे, जब सिखों का नरसंहार हुआ। हादसे तो पिछले 25 वर्षों में बहुतेरे हुए हैं, तब साहित्यकारों ने विरोध का यह तरीका क्यों नहीं अपनाया? बेशक विरोध लोकतंत्र में जरूरी है, पर इसे राजनीतिक रूप नहीं देना चाहिए, जोकि अब हो रहा है।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

देशभर में दादरी हिंसा, बीफ पॉलिटिक्स, साहित्यकारों की हत्या समेत तमाम मुद्दों पर हो रही केंद्र सरकार की तीखी आलोचनाओं का जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा कि देश में जो भी चल रहा है, वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक बड़ी दुर्भावनापूर्ण साजिश के तहत हो रहा है। दादरी की घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ऐसे मामले पहले भी आते रहे हैं, ये कोई पहला मामला नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था राज्य सरकार का मुद्दा है, उस पर राज्य सरकार से जवाब मांगा जाए।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

केन्द्रीय मंत्री एम वेंकैया नायडू का यह कहना बहुत मायने रखता है कि सहिष्णुता भारतीयों के खून में आनुवंशिक रूप से घुला हुआ है और बुद्धिजीवी वर्ग को देश में होने वाली ‘छिटपुट घटनाओं’ को तूल देने से बचना चाहिए, जो विदेशों में हमारे देश की छवि खराब कर रही हैं ! सबसे ज्यादा विचारणीय बात ये है कि थोड़ी बहुत हिंसक घटनाएं देश में हमेशा से होती चली आ रही हैं और ऐसा नहीं है कि आगे नहीं होंगी, चाहे केंद्र व राज्यों में किसी भी दल का शासन क्यों न हो ! पुरस्कार वापसी लेखकों की घटिया राजनीति ही कही जाएगी, यदि उसका मूल कारण किसी व्यक्ति विशेष (मोदी जी) या पार्टी विशेष (भाजपा) से नफरत है ! यदि ये सच है तो लेखक खुद ही वैचारिक असहिष्णुता और फिरकापरस्ती के शिकार हैं, जो कि बुद्धिजीवियों के लिए अत्यंत निंदनीय कृत्य है ! यह लेखकों की पब्लिसिटी पाने की चाह भी हो सकती है, जैसा कि डॉक्टर नामवर सिंह जी ने कहा है !

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा है कि, हम आजकल देश में नया चलन देख रहे हैं। कुछ लोग देश में हुई हिंसा की कुछ छिटपुट घटनाओं को तूल देने का प्रयास कर रहे हैं। वे उसे बड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। वे दिखाना चाहते हैं कि देश में सहिष्णुता का स्तर घटा है। वे कहते हैं कि देश में सहिष्णुता घट रही है। यह देश का अपमान कराएगा। हम घटनाओं की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन देश की नहीं। उन्होंने कहा है कि दुनिया में भारत ही एकमात्र देश है, जहां सहिष्णुता है, यदि १०० प्रतिशत नहीं तो कम से कम ९९ प्रतिशत तो है ही।

sadguruji के द्वारा
October 21, 2015

डॉक्टर नामवर सिंह ने कहा है कि अगर लेखकों को कलबुर्गी की हत्या का विरोध करना है तो उन्हें राष्ट्रपति, संस्कृति मंत्री या मानव संसाधन मंत्री से मिलकर सरकार पर दबाव बनाना चाहिये और उनके परिवार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिंदी के इस शीर्षस्थ लेखक का यह भी कहना है क़ि लेखकों को कुछ ठोस कार्य करना चाहिए न क़ि इस तरह के नकारात्मक कदम उठाने चाहिए। उनका यह भी कहना है कि इस मुद्दे पर अकादमी को लेखकों का एक सम्मेलन भी करना चाहिए, जिसमें इन सवालों पर खुल कर बात हो।


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