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बाल यौन शोषण करने वालों का बधिया करो- कोर्ट का सुझाव

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बाल यौन शोषण करने वालों का बधिया करो- कोर्ट का सुझाव

बहुत कम लोंगो को ये मालूम होगा कि अमेरिका, पोलैंड और रूस जैसे देशों में बच्चों के खिलाफ होने वाले सेक्स अपराधों को रोकने के लिए अपराधी को नपुंसक बना देने की सजा वर्षों पहले से लागू है। अब भारत में भी ऐसी ही सजा लागू किये जाने की मांग उठने लगी है। कुछ दिन पहले मद्रास हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वो चाइल्ड सेक्शुअल केस में अपराधी को नपुंसक बना देने की सजा देने का कानून बनाये। कोर्ट के माननीय न्यायाधीश किरुबकरण ने कहा, ‘कोर्ट को विश्वास है कि चाइल्ड रेपिस्ट को नपुंसक बनाए जाने की सजा जादुई परिणाम लेकर आएगी।’ न्यायाधीश एन किरुबकरण ने अपने आदेश में कहा, ‘बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पोस्को) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध बदस्तूर बढ़ रहे हैं। इस बुराई से निपटने में ये कानून बेअसर और नाकाबिल साबित हो रहे हैं।’ कोर्ट ने कहा, ‘बधिया करने का सुझाव बर्बर लग सकता है, लेकिन इस प्रकार के क्रूर अपराध ऐसी ही बर्बर सजाओं के लिए माहौल तैयार करते हैं।’ माननीय मद्रास हाई कोर्ट ने सही सलाह दी है। केंद्र सरकार को इसपर विचार करना चाहिए। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि जो लोग नाबालिग बच्चों को हवस का शिकार बनाते हैं, वह पशु हैं।

मेरे विचार से तो वो पशुओं से भी गए गुजरे हैं, क्योंकि पशु भी ऐसा नहीं करते हैं। पशु एक समयावधि विशेष में प्रजनन के लिए उत्तेजित होते है, बाक़ी समय सेक्स के बारे में नहीं सोचते हैं। अधिकतर इंसान हर समय प्राकृतिक-अप्राकृतिक सेक्स के बारे में ही सोचते रहते हैं। इंसानों की अधिकतर गन्दी गालियों में सेक्स का भाव मौजूद रहता है। ऐसी गंदी गालियों वाला मौखिक सेक्स जो गाली देने वाला सामाजिक मर्यादा के कारण खुद नहीं करता, किन्तु गुस्से में आ दूसरे पर ऐसा करने का झूठा आरोप लगाता है। ये भी एक तरह की सेक्सुअल मानसिक विकृति है। समाज में बलात्कार की घटनाएं बढ़ने का कारण गंदी गालियां भी हैं। अधिकतर अपराधी बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते समय गन्दी गालिया भी बकते हैं। गालियां क्रोध और बदले की भावना को उकसाने का काम करती हैं। इसपर भी कठोर प्रतिबंध लगना चाहिए। बढ़ती हुई असभ्यता और मानसिक विकृति के कारण इस समय पूरे देशभर में ओरतों, लड़कियों और कम उम्र के मासूम बच्चों के प्रति सेक्स अपराधों में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। बच्चों की बात करें तो बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद बच्चों के खिलाफ अपराध बदस्तूर बढ़ रह हैं।

सन २०१२ में बच्चों के प्रति सेक्स अपराधों की संख्या ३८,१७२ थी, जो २०१४ तक बढ़कर ८९,४२३ तक पहुंच गई थी। इस आंकड़े से यह जाहिर होता है कि पिछले कुछ सालों में बाल यौन शोषण (पीडोफीलिया) बहुत तेजी से बढ़ा है। दरअसल बाल यौन शोषण या पीडोफीलिया एक ऐसी मनोवैज्ञानिक बिमारी है, जिससे ग्रस्त व्यक्ति छोटे बच्चों की ओर भावुक और बारम्बार यौन आग्रहों की दिशा में कल्पनाशील हो जाता है और जिसके बाद वह यथार्थ में इसे पूरा करता है। इस तरह के रोगी बारह तेरह साल के किशोर से लेकर वयस्क उम्र के युवा और उम्रदराज बूढ़े भी हो सकते हैं, यहाँ तक कि महिलाएं भी इस तरह की मानसिक रोगी हो सकती हैं। हर व्यक्ति को यह जानकारी भी होनी चाहिए कि बाल यौन शोषण के अंतर्गत केवल प्राकृतिक या अप्राकृतिक संभोग ही नहीं आता है, बल्कि बच्चे को गलत नियत या गलत ढंग से छूना, छेड़ना और उसे उत्तेजित करने के लिए उकसाना भी शामिल है। मासूम बच्चों को स्कूलों में इस बात का बोध कराये जाने की नितांत आवश्यकता है कि गुड टच क्या है और बेड टच क्या है? बाल यौन शोषण के शिकार अधिकतर मासूम बच्चे शुरू में इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि उनके साथ अच्छा हो रहा है या बुरा और अंततः वो एक दिन बड़े यौन शोषण के हादसे का शिकार बन जाते हैं। बच्चों के माता-पिता को अपने घर आने वाले परिचितों और रिश्तेदारों पर भी कड़ी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि बाल यौन शोषण के ज्यादातर मामलों में अपराधी वही निकलते हैं।

बाल यौन शोषण में लिप्त अपराधी कई तरह की यौनिक कुप्रवृति के आदती हो चुके पाये जाते हैं। एक तरफ जहाँ कुछ अपराधी समलैंगिक प्रवृति के पाये जाते हैं तो वहीँ दूसरी तरफ कुछ अपराधी ऐसे पाये जाते हैं जो हस्तमैथुन की अति के कारण अपनी कामेच्छा को खो देते हैं और फिर बाद में अपनी यौन भूख मिटाने के लिए बच्चों की ओर आकृष्ठ हो जाते हैं। बाल यौन शोषण करने के कुछ अपराधी ऐसे भी पाये जाते हैं, जो गुप्त रोगों का शिकार हो जाने पर इस झूठी भ्रान्ति के कारण बच्चों से यौन संबंध स्थापित करते हैं कि उनका गुप्त रोग चला जाएगा। चिकित्सक इसे समाज में फैली कोरी अफवाह और मासूम बच्चों के प्रति किया जाने वाला जघन्य अपराध मानते हैं, क्योंकि बच्चे भी यौन रोग से संक्रमित हो जाते हैं और कई बार तो एड्स जैसा भयानक रोग होने पर उनका पूरा जीवन बर्बाद हो जाता है। देश के कई बड़े शहरों में विदेशी शैलानियों की कुत्सित यौन हवस मिटाने के लिए चोरी छिपे मासूम बच्चों को उनके पास भेजा जाता है। देश में बाल यौन शोषण बढ़ने का यह भी एक कारण है। आज मोबाईल फोन घर घर में और यहाँ तक कि छोटे छोटे बच्चों के पास भी उपलब्ध है। इसका दुरूपयोग भी बाल यौन शोषण बढ़ने का एक मुख्य कारण है।

शहर हो या गाँव सर्वत्र मोबाइल फोन पर डाउनलोड करके या फिर इंटरनेट के जरिए बच्चे व् युवा अश्लील सामग्री, अश्लील फिल्म, और यहाँ तक कि बच्चों पर बनी अश्लील वीडियो जिज्ञासावश और मनोरंजन के लिए चोरी छुपे देखते हैं और फिर इसकी हैबिट हो जाने पर मानसिक विकृति का शिकार हो उसपर अमल करने की कोशिश करते हैं। उनकी यही मानसिक विकृति बाल यौन शोषण या फिर किसी लड़की से बलात्कार में परिणित हो जाती है। इस तरह की दंडनीय हरकत करके वो अपराधी बन जाते हैं और उनका पूरा जीवन तबाह हो जाता है। माता-पिता को चाहिए कि वो छोटे बच्चों को मोबाईल फोन से दूर रखें और अपने बड़े होते बच्चे की हर अच्छी बुरी गतिविधि पर नजर रखें। पहले बच्चे गेम खेलने के बहाने माता-पिता का मोबाईल फोन उठाते हैं और फिर कुछ दिन बाद जिद करके अपने लिए एक अलग से मोबाईल फोन खरीदवा लेते हैं। बच्चों की बढ़ती हुई यौन जिज्ञासा के साथ ही मोबाईल पर अश्लील सामग्री देखने की चाह भी बढ़ती जाती है। स्कूल में अपने दोस्तों से जानकारी लेकर भी वो इंटरनेट पर अश्लील सामग्री ढूंढते और देखते हैं। अभिभावकों की जागरूकता के साथ साथ आज जरुरत इस बात की है कि स्कूलों में बच्चों को सही यौन शिक्षा दी जाये और उनका ध्यान खेलकूद और अन्य सकारात्मक गतिविधियों की ओर अधिक से अधिक खींचा जाये।

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 28, 2015

श्री आदरणीय सद्गुरु जी इससे अच्छा निर्णय नहीं हो सकता लेकिन देखियेगा सारे मानवाधिकारी बाहर निकल आएंगे

sadguruji के द्वारा
October 28, 2015

आदरणीय डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद ! आप की बात सही है कि कोर्ट के इस सुझाव का मानवाधिकार से जुड़े संगठन विरोध करेंगे, किन्तु फिर भी कोर्ट का सुझाव विचारणीय है !

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

वर्ष 2006 में भारत सरकार ने बच्चों के घरेलू नौकरों के रूप में काम करने पर अथवा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों जैसे-होटलों, रेस्तरां, दुकानों, कारखानों, रिसॉर्ट, स्पा, चाय की दुकानों आदि में नियोजन पर रोक लगा दी ! इसमें 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को नियोजित करने वालों के विरुद्ध अभियोजन और दंडात्मक कार्यवाही की चेतावनी दी गई है !

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

गरीब बच्चों खासकर बाल मजदूरों के मामले में अधिकतर कारखाना मालिकों की मानसिकता बहुत गिरी हुई है ! वो बाल श्रम का दुरूपयोग अपनी सम्पन्नता बढ़ाने, कारखाने के नाम पर बहुत सी सरकारी सुविधाएं हासिल करने और अक्सर अबोध बच्चों के साथ अमानवीय मौजमस्ती करने में यकीन रखते हैं ! ऐसे लोग सस्ते मजदूरों के रूप में बच्चों के श्रम का शोषण, अपनी हवस मिटाने के लिए उनका यौन शोषण और उनपर कुत्सित व् अहंकारपूर्ण रोब झाड़ने के लिए के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं ! ये बच्चों के नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का हनन है ! इसके खिलाफ जोरदार आवाज उठनी चाहिए ! आज जरुरत इस बात की है कि भले और संवेदनशील लोग देश के गरीब और अभावग्रस्त बच्चों की निस्वार्थ भाव से सेवा करें और उनके शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करें !

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

देश की राजधानी दिल्ली में बच्चों के प्रति सबसे ज्यादा अपराध हो रहे हैं ! कुछ साल पहले एक समाचार पढ़ा था कि एक दस वर्षीय बाल बंधुआ मजदूर मोईन की नृशंस हत्या कर दी गई थी ! वो एक कारखाने में बिंदी बनाने का काम करता था ! वो बच्चा बिहार के मधुबनी जिले से एक दलाल की मार्फत, अच्छी जिंदगी और पढ़ाई का लालच देकर दिल्ली लाया गया था। लेकिन यहां उसे मदरसे के बजाय एक कारखाने में बिंदी बनाने के काम में लगा दिया गया। उस बच्चे ने कभी यह काम नहीं किया था, लिहाजा उससे काम के दौरान गलती हो गई ! इस पर कारखाने का क्रूर मालिक उसे बुरी तरह से पीटता था। गर्म लोहे से दाग देना, पंखे पर लटकाकर घुमा देना, दीवारों पर पटक-पटक कर मारना उसके सजा देने के तरीके थे। ऐसी ही क्रूर और अमानवीय सजा के दौरान एक दिन मासूम मोईन की मौत हो गयी ! देश में न जाने कितने कारखानों में ऐसी क्रूर घटनाएं होती होंगी ! ऐसे ज्यादातर मामले पैसे के बल पर दबा दिए जाते हैं ! मासूम बच्चों की सुध कौन लेता है ! नेता और अफसरों को इन बच्चों के शोषण से कोई मतलब ही नहीं है !

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

बहुत से शातिर और अपराधी प्रवृति के लोग जो लोग बच्चों की खरीदिबक्री में संलिप्त हैं, वो बच्चे के मां-बाप को सुनहरे भविष्य का ख्वाब दिखाकर उनके बच्चे ले जाते हैं ! गरीब और निश्छल ह्रदय वाले मां- बाप उनकी बातों में आ ज्यादा सोचे समझे बगैर बच्चों को काम पर भेज देते हैं और फिर उनकी नजरों से दूर ये बच्चे आसानी से यौन उत्पीड़न के शिकार बन जाते हैं।

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

देश में हो रहे बाल यौन शोषण के लिए मां- बाप भी जिम्मेदार हैं ! ज्यादातर बच्चे मां- बाप की ज्यादतियों की वजह से ही घर से भाग जाते हैं ! ये बच्चे गलत लोंगो के चंगुल में फंसकर यौन शोषण के शिकार हो जाते हैं ! अतः हर माता-पिता को चाहिए कि बच्चों पर अनुशासन रखें, किन्तु उनके साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें और अपने लाड-दुलार में कमी न आनें !

sadguruji के द्वारा
November 1, 2015

समाज मे भय और अविश्वास का माहौल है ! लोग डर के मारे अपनी बच्चों को बाहर खेलने के लिये नहीं भेजते हैं ! लोग अपने रिश्तेदार,परिचित, ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचर और घर आये मेहमान पर भी कड़ी नजर रखने लगे हैं और रखनी भी चाहिये, क्योंकि अधिकतर बाल यौन शोषण रिश्तेदार या परिचितों के द्वारा होना पाया जाता है ! सबसे ज्यादा मुसीबत तो गरीब बच्चो की है, जो अधिकतर अपनी झोपड़ी के बाहर रहते है और यौन शोषण के ज्यादा शिकार भी वही होते है !


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