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मुस्लिम पर्सनल लॉ का परीक्षण करने का फैसला- जागरण मंच

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हमारे देश में शादी करने, तलाक देने, बच्चा गोद लेने तथा अपना उत्तराधिकारी चुनने के मामलों में फैसला लेने के लिए हर धर्म का अपना पर्सनल लॉ है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बहुविवाह करने और तीन तलाक देने की सदियों पुरानी प्रथा को कानूनन मान्यता देता है। आजादी से पूर्व हिन्दुओं में भी बहुविवाह करने का सामाजिक प्रचलन था, किन्तु भारतीय संविधान लागू होने के बाद पहली शादी बरकरार रहते हुए दूसरी शादी करने पर पाबंदी लगा दी गई। सन १९५० में देश का संविधान लागू होने के बाद भी कई वर्षों तक हिंदू मैरिज ऐक्ट में बहुत से बदलाव किए गए, लेकिन सेकुलर सत्ताधारियों ने अपना वोट बैंक बनाये रखने और तुष्टिकरण की घटिया राजनीति के चलते मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई बदलाव नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम पर्सनल लॉ की छवि समय बीतने के साथ साथ महिला विरोधी कानून के तौर पर विकसित होती चली गई और मुस्लिमों को बहुविवाह करने की अनुमति देने से नाराज हिन्दू संगठन समान नागरिक संहिता की मांग करने लगे। कई दशकों तक हिन्दुओं की इस मांग को सत्तालोलुप नेताओं द्वारा न सिर्फ अनसुना किया गया, बल्कि इसे अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करने वाला और हिन्दुओं का वैचारिक उग्रवाद तक कहा गया। आज उन नेताओं की न सिर्फ बोलती बंद हो गई है, बल्कि उनके स्वर भी बदल गए हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का परीक्षण करने का फैसला लिया है।

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मीडिया में प्रकाशित ख़बरों के मुताबिक जस्टिस एआर दवे और एके गोयल की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एच.एल दत्तू से मुस्लिम पर्सनल लॉ में लैंगिक समानता को लेकर सुनवाई के लिए एक उपयुक्त बेंच गठित करने का अनुरोध किया है। बेंच ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि पहली शादी बरकरार रहते हुए पति के दूसरी शादी करने के फैसले का विरोध करने या अपने हक की आवाज उठाने के लिए इस लॉ में बहुत कुछ नहीं है। इससे उसके सम्मान और सुरक्षा का खतरा पैदा होता है। अपने पिछले फैसलों का उदाहरण देते हुए बेंच ने कहा है कि शादी और उत्तराधिकार के बारे में फैसला करने वाले कानून धर्म का हिस्सा नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह बेहद गंभीर और अहम फैसला है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। प्रकाशित समाचारों के मुताबिक जाने-माने मुस्लिम स्कॉलर और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन ताहिर महमूद ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की इस पहल का समर्थन करते हुए कहा है कि यह धारणा गलत है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ भारत में संविधान की धार्मिक स्वतंत्रता की भावना के तहत आता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसमें अकसर मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय किया जाता है।

जो नेता अपना अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाने के लिए या फिर जो मुस्लिम नेता अपने निजी स्वार्थवश मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधारों के विरोधी रहे हैं, वो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जरूर नाराज होंगे। लेकिन बहुविवाह एवं तीन तलाक जैसी प्रथाओं से भयभीत करोड़ों महिलाओं के लिए यह एक बेहद सुकून देने वाला फैसला है। इस फैसले ने देश में समान नागरिक संहिता पर विचार-विमर्श करने और उसे लागू करने की कोशिश करने की भी सद्प्रेरणा दी है। अब यह तय हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में सुनवाई करेगा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ आखिर किस तरह से मुस्लिम महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित है और बहुविवाह एवं तीन तलाक जैसी प्रथाओं से मुस्लिम महिलाओं का किस प्रकार से शोषण हो रहा है? मुस्लिम पर्सनल लॉ का परीक्षण करने के फैसले की अहमियत इसी बात से साबित होती है कि हमारे देश में इस साल की शुरुआत में हुए एक सर्वे के मुताबिक ९० प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं ने बहुविवाह और तीन तलाक के प्रति अपनी असहमति जताई थी। गौरतलब बात ये है कि इस कानून की वजह से कई बार महिलाओं को सम्पत्ति के उत्तराधिकार से भी वंचित होना पडता है या फिर उन्हें उसमे उचित हिस्सेदारी नहीं मिल पाती है। इस कानून के अनुसार शादी करने-कराने और तलाक देने-दिलाने वालों की निरंकुश तानाशाही और शोषण भी जारी है। पीड़ित महिलाऐं इससे बखूबी वाकिफ हैं।

इसी महीने के शुरू में मीडिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार केरल की रहने वाली २१ वर्षीय कॉलेज स्टूडेंट की एक एनआरआई के साथ शादी हुई, लेकिन शादी के एक महीने बाद ही उसके पति ने वॉट्सएप पर तलाक, तलाक, तलाक लिखकर उसे तलाक दे दिया और बड़ी आसानी से उससे पल्ला झाड़ लिया। पीड़ित युवती के मुताबिक, उसका पति शादी के १० दिन बाद ही दुबई चला गया और ३ हफ्ते बाद वॉट्सएप पर तलाक का मैसेज लिखकर भेज दिया। शारीरिक और मानसिक शोषण की शिकार युवती ने कोट्टायम की राज्य महिला आयोग अदालत में अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। मीडिया में प्रकाशित समाचार के मुताबिक आयोग की एक सदस्य ने बताया कि लड़के ने कहा है कि उसकी पत्नी एक सेब की तरह है और वो पहले ही उसका स्वाद ले चुका है। इसलिए अब वह उसके साथ नहीं रहना चाहता। इस तरह के मामले हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि देश में क्यों न जल्द से जल्द एक समान नागरिक संहिता लागू की जाये, ताकि महिलाओं का न सिर्फ शोषण रुके, बल्कि रो-रोकर और घुट घुटकर जीवन के दिन काट रहीं ऐसी महिलाओं को इन्साफ भी मिले। ताजा मतगणना के अनुसार भारत में २९.३ करोड़ शादीशुदा महिलाएं और २८.७ करोड़ विवाहित पुरुष हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि देश में बहुविवाह का दंश झेल रही महिलाओं की संख्या ६६ लाख से भी ज्यादा है। तलाक पीड़ित महिलाओं की संख्या भी लाखों में होगी, जिन्हे शायद ही कभी इन्साफ मिले। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने उनके गमगीन दिलों में एक उम्मीद की किरण जरूर जगाई है।

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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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