सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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साडा चिड़ियाँ दा चंबा वे, बाबुल असां उड़ जाणा- जागरण जंक्शन

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साडा चिड़ियाँ दा चंबा वे,
बाबुल असां उड़ जाणा,
साडी लम्मी उडारी वे,
बाबुल केहड़े देस जाणा.
घर में विवाह की तैयारियां चल रही हैं. लड़की अपने पिता से कह रही है- पिताजी, लडकियां चिड़ियों के समूह जैसी होती हैं. अब हमें चिड़ियों की तरह लम्बी उड़ान भरनी है. पता नहीं किस देश में जाकर हमारी उड़ान पूरी हो और हमें मंजिल मिले.

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ये एक पंजाबी लोकगीत है जो पंजाब में सदियों से विवाह के मौके पर गाया बजाया जाता रहा है. इस लोकगीत के गीतकार का नाम तो अज्ञात है, किन्तु ये लोकगीत बेहद लोकप्रिय है और पंजाबियों के दिलों में बसा हुआ है. इस लोकगीत का भावार्थ मैं अपनी जानकारी के अनुसार समझाने की कोशिश करते हुए एक विवाह समारोह के आयोजन का समीक्षात्मक वर्णन भी प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसके आयोजन की सारी जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर थी. वर और वधू दोनों ही पक्षवाले मेरे नजदीकी रिश्तेदार थे. लड़का दक्षिण अफ्रिका में काम कर रही एक भारतीय कंस्ट्रक्शन कम्पनी में इंजीनियर के रूप में कार्यरत है और लड़की बीए पास एक सामान्य घरेलू लड़की है. दोनों के बीच प्रेम हुआ और फिर काफी अड़चनों के बाद शादी तय हुई, जिसका विवरण अपने एक ब्लॉग “एक वास्तविक प्रेम कहानी का सुखद अंत” में दे चूका हूँ. लड़की के घर का माहौल ठीक नहीं था, उनमे आपस में लगभग रोज ही भयंकर कलह होती थी. उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहद ख़राब थी. हालांकि उनके पास खेती वाली जमीन काफी है, किन्तु वो लोग एक इंच जमीन भी बेचने के पक्ष में नहीं थे. मुझे लगा कि मुझे लड़की की मदद करनी चाहिए. घर के ख़राब माहौल और विवाह होने की अनिश्चितिता को देखते हुए मुझे चिंता थी कि कहीं वो आत्महत्या न कर ले. उसके पिताजी को अपना पूरा सहयोग देने का वादा करते हुए बहुत मुश्किल से मैंने उन्हें पौने तीन लाख रूपये खर्च करने को राजी किया.

तेरे महिलां दे विच विच वे,
बाबुल चरखा कौन कत्ते?
मेरियां कत्तन पोतरियाँ,
धिए घर जा अपणे.
लड़की विवाह के बाद अपने पिता से पूछ रही है- पिताजी, अब तुम्हारे महल यानी घर में चरखा पर सूत कौन काटेगा?
पिताजी कह रहे हैं- अब मेरी पोतियाँ चरखे पर सूत काटेगी. पुत्री, अब तू अपने घर जा.

कृपालु पाठकों, इस मार्मिक और मधुर विवाह गीत की प्रस्तुति के साथ साथ आदर्श ‘प्रेम विवाह’ की चर्चा भी जारी रहेगी. ये एक सुखद संयोग ही रहा कि दोनों का प्रेम काशी में हुआ और विवाह भी काशी में ही हुआ. बाबा विश्वनाथ जी की यहीं इच्छा थी. यहाँ पर मेरे सिवा उनका कोई और रिश्तेदार न होने के कारण जब लड़के और लड़की वालों ने काशी में विवाह के आयोजन की सारी जिम्मेदारी मुझे देने की इच्छा प्रकट की तो मैंने लड़के वालों से एक शर्त रखी और वो कि ये एक आदर्श विवाह होगा और आप लोग लड़की वालों पर दहेज़ के लिए कोई दबाब नहीं डालेंगे. वो स्वेच्छा से जो भी देना चाहें, वो दें. लड़का और उसके परिजनों ने मेरी बात मान ली. सबकुछ तय हो गया तो एक अंदाजा मैंने लगाया कि कम से कम कितने बजट में ये शादी हो जाएगी. दो लाख से बजट बढ़ते बढ़ते तीन तक चला गया. लड़की वाले दस बीस हजार करके एक महीने में लगभग तीन लाख रूपये भेजे. विवाह के बाद सारा हिसाब करने पर पता चला कि मेरी जेब से भी लगभग पैंतालीस हजार रुपए इस प्रेम विवाह यज्ञ में लग चुके हैं. बहती गंगा में सभी हाथ धोने को आतुर रहते हैं. सो मौके का फायदा उठाते हुए मेरी श्रीमती जी और माताजी ने अपनी पायल बदलने के साथ साथ अपने कान के गहने भी बदल के नए ले लिए. मेरे पास उतना निजी बजट न होते हुए भी उनकी बात मानना जरुरी था, क्योंकि उनकी बात न मानने पर वो लोग वैवाहिक समारोह में न शामिल होने की धमकी दे रहे थे.

तेरे महिलां दे विच विच वे ,
बाबुल गुडियां कौण खेडे?
मेरियां खेडण पोतरियाँ ,
धिए घर जा अपणे .
लड़की विवाह के बाद अपने पिता से पूछ रही है- पिताजी, अब तुम्हारे महल यानी घर में गुड़ियों से कौन खलेगा?
पिताजी कह रहे हैं- अब मेरी पोतियाँ उन गुड़ियों से खेलेगी. पुत्री, अब तू अपने घर जा.

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मित्रों, विवाह की तारीख पांच मार्च तय हो जाने के बाद मैंने लगभग एक माह पूर्व ही अपने आश्रम के सहयोगियों की एक मीटिंग बुलाई और उन्हें बताया कि कम बजट में हमें एक बहुत अच्छे विवाह समारोह का आयोजन करना है और ऐसा करके हमें समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करना है. नियमित रूप से आश्रम आने वाले मेरे सभी सहयोगी सहर्ष तैयार हो गए. सबसे पहले हम धर्मशाला की तलाश में निकले. अपने क्षेत्र में धर्मशालाएं तो कई मिलीं, किन्तु वहां पर अव्यवस्था, टूटफूट और गंदगी का ढेर देख लॉन की ओर रुख किये. मेन रोड पर स्थित परिचित के एक गेस्ट हाउस वाले लॉन में गए. बात नब्बे हजार से पैकेज के साथ शुरू हुई और पन्द्र हजार में बिना पैकेज के देने पर मैंने बात समाप्त की. लड़की वाले शादी वाली तारीख से एक दिन पहले आने वाले थे और एक दिन बाद जाने वाले थे, इसलिए चार और छह मार्च को एक हॉल और एक कमरा बुक करवा दिया, ताकि लड़की वालों और उनके मेहमानों को किसी भी तरह से दिक्कत न हो. शादी के बाद छह मार्च को वो दोपहर के बाद जाने वाले थे, क्योंकि उन लोंगो की ट्रेन शाम को थी. आश्रम में हर भंडारे पर सेवा करने वाले एक हलवाई को भी उनके लिए खाना बनाने की खातिर बुक कर दिया था, जिसने अपनी टोली के साथ लगातार तीन दिन तक घराती और बाराती सबकी बहुत ही अच्छे ढंग से खातिरदारी की और बहुत लाजबाब भोजन के साथ साथ अन्य ढेर सारे पकवान भी बनाये.
मेरा छुट्या कसीदा वे,
बाबुल दस कौन कडे?
मेरियां कडन पोतरियाँ ,
धिए घर जा अपणे.
लड़की विवाह के बाद अपने पिता से पूछ रही है- पिताजी, इस घर में मेरे बहुत से कार्य अभी अधूरे रह गए हैं, उन्हें कौन पूरा करेगा?
पिताजी कह रहे हैं- अब मेरी पोतियाँ (लड़के की लड़कियाँ) तेरे अधूरे रह गए कार्यों को पूरा करेंगी. पुत्री, अब तू अपने घर जा.

प्रिय बंधुओं, शादी की एक बड़ी व्यवस्था में कुछ न कुछ बाधाएं और परेशानियां तो आती ही हैं. इतनी अच्छी व्यवस्था करने पर भी जब चार मार्च की आधी रात को जब लड़की वाले आये तो गेस्ट हाउस वाले ने ढाई हजार रूपये की और मांग की, क्योंकि उसके अनुसार चार तारीख सुबह छह बजे से शुरू होती थी. हालाँकि उनसे पहले ही मेरी बात हो चुकी थी कि वो आधी रात को मेरे मेहमानों के लिए रूम दे देंगे. मैं उन्हें ढाई हजार किराया भी दे चूका था. लड़की वाले पुरे झुण्ड सहित आधी रात को मेरी कुटिया पर आ पहुंचे. जवान लडकिया, औरते, बच्चे, और बूढ़े सब आधीरात को किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत चोर लुटेरे और कुत्तों से बचते बचाते हुए छह किलोमीटर मय कीमती सामान के साथ पैदल चलकर मेरे पास आ पहुंचे थे. मुझे बहुत दुःख हुआ और गेस्ट हाउस वाले पर बहुत गुस्सा भी आया किया कि उसमे इतनी भी इंसानियत शेष नहीं बची थी कि मेहमानों को रुम दे देता और सुबह मुझसे हिसाब करता. इतने सारे मेहमानों के लिए छोटी पड़ती जगह पर अपना दिल बड़ा करते हुए मैंने मेहमानो का स्वागत किया. रात को उन्हें बिस्कुट पानी खिलाया पिलाया और उनके सोने की समुचित व्यवस्था कर दिया. मेहमानों की सेवा में तन मन से जुटी श्रीमतीजी की खूब खरी खोटी भी अपने कमरे में आकर अकेले में सुननी पड़ी. वो मेरी लॉन वाली व्यवस्था में आई दिक्कत से और घर के धर्मशाला बन जाने से बेहद नाराज थीं.

तेरे बागां दे विच विच वे,
बाबुल डोला नहीं लंघदा.
इक इक टहनी पुट देवाँ,
धिए घर जा अपणे.
लड़की बगीचे से गुजरते हुए अपने पिता से कह रही है- पिताजी, मेरी डोली आपके बगीचे के पेड़ों की टहनियों के बीच फंस गई है.
पिताजी कह रहे हैं- पुत्री, मैं उन टहनियों को तोड़ के फेंक दूंगा, जो तेरी डोली को आगे बढ़ने से रोक रही हैं. बेटी, अब तू अपने घर जा.

मित्रों, सुबह मैंने अपने परिचित के एक पुलिस अधिकारी को सारी बात बताई. मैंने कहा कि रात को मेरे मेहमानों के साथ कोई भी कोई भी दुखद घटना घट सकती थी. आपलोग लॉन वाले को समझा दें, ताकि वो भविष्य में फिर किसी के साथ ऐसा घटिया व्यवहार न करे. पुलिस वालों ने पूरी सहानुभूति दिखाई और दरोगा जी मय फ़ोर्स के साथ लॉन में पहुँच गए. इधर नहा धोकर नाश्ता पानी कर चुके मेहमानो को गाडी बुलाकर मैं लॉन में पहुंचाया. लॉन वाले ने अपनी गलती स्वीकार की, लड़की वालों से माफ़ी मांगी और पुलिस को भरोसा दिलाया कि वो अब पूरा सहयोग करेगा. उसने कुछ चीजों में अड़ंगा लगाने के बाद अपना वादा तो निभाया, किन्तु शादी के बाद दो भगोना गायब मिले और टेंट वाले के दो जनरेटरों के पाइप भी कटे हुए मिले. फिर पुलिस बुलाने की नौबत आई तो एक जगह पर छिपाके रखे गए दोनों भगोने मिल गए. अन्तोगत्वा वैहिक कार्यक्रम तो सकुशल सम्पन्न हो गया, लेकिन मेरे लिए कई व्यक्तिगत दुःख भी छोड़ गया. स्वयं जाकर जिन्हे अपने हाथों से कार्ड दिया और जिन्हे मनाने में अपना पूरा कीमती दिन बिता दिया, वादा करके भी वो नहीं आये. दिल को बहुत ठेस पहुंची. इस शादी की एक ख़ास बात ये कि शादी का कार्ड हमने बहुत सस्ता और विजिटिंग कार्ड की तरह छपवाया था, जिसे जेब में आराम से रखा जा सके और कार्यक्रम स्थल तक सुगमता से पहुँचने में उसकी मदद भी ली जा सके. लोंगो को हमारा ये प्रयोग बहुत अच्छा लगा.

तेरियां भिडीयाँ गलियाँ च वे,
बाबुल डोला नहीं लंघदा.
इक इक इट पुट देवाँ,
धिए घर जा अपणे.
लड़की गलियों से गुजरते हुए अपने पिता से कह रही है- पिताजी, आपके घर से निकलकर जाने वाली संकीर्ण और ऊबड़खाबड़ गलियों में मेरी डोली फंस रही है.
पिताजी कह रहे हैं- पुत्री, तेरी डोली की राह में रोड़े अटका रही एक एक ईंट को मैं उखाड़ फेंकूगा. बेटी, अब तू अपने घर जा.

krishna-rukmini-weddingiuiui
पाठक मित्रों, आश्रम से जुड़े सभी लोंगो को वैवाहिक समारोह में आमंत्रित करना संभव नहीं था, इसलिए नियमित रूप से आने वाले मात्र सौ लोंगो को आमंत्रित किया गया था. यह भी बहुतों को दुखी करने वाला निर्णय था, परन्तु हमारी मज़बूरी थी. कुल तीन सौ लोंगो के लिए बढियां भोजन की व्यवस्था की गई थी. प्रभु कृपा से कहीं कोई कमी नहीं हुई. मेरे एक रिश्तेदार ने प्लेट में भोजन देने पर रात को दो बजे खूब बवाल किया. गर्दन में तेज दर्द और चक्कर आने से ग्रसित होने पर भी मुझे भागकर जाना पड़ा और पत्तल में भोजन देकर मामला शांत कराना पड़ा. वर, जो सोलह साल पहले मेरी शादी में सहबलिया बना था, उससे मैंने केवल इतना ही कहा था कि मेरी शादी के समय मेरे ससुर जी के पास मात्र बीस हजार रुपए थे और उतने में ही मेरी शादी हुई. लड़के ने मेरी बात का मान रखा और पूरा सहयोग भी किया, किन्तु सुबह बिदाई के समय वर और वधु आशीर्वाद तक लेने मेरे पास नहीं आये. लड़की वाले बिना हिसाब किताब देखे भाग गए. इस भय से कि हिसाब होने पर कहीं और रूपये न देना पड़े. शायद अब किसी को मेरी जरुरत नहीं थी. मैं तो बस वर-वधू के सुखद भविष्य की कामना करता रहा और नम आखों से भगोने धोते, गाडी में सामान लादते और वैवाहिक कार्यक्रम के अंत तक सेवा में जुटे अपने आश्रम के सहयोगियों को निहारता रहा. धन्य हैं वे. उन्होंने निष्काम भाव से बहुत सेवा की है. मैं उनका बहुत ऋणी और एहसानमंद हूँ.
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(आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कंदवा, जिला- वाराणसी. पिन- २२११०६)
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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

पाठक मित्रों, लेख के विस्तृत हो जाने के कारण कुछ और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं कर पाया ! हिन्दू समाज में चार पांच घंटे का जो वैवाहिक कार्यक्रम होता है, वो बेहद लंबा होने के कारन वर, वधू और उनके परिजनों को थका डालता है ! इसको आधे घंटे के कार्यक्रम में समेटने पर हिन्दू समाज को विचार करना चाहिए !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

हिन्दू विवाह संस्कार पद्धति में एक और कमी यह है कि वैवाहिक कर्मकांड के दौरान और खासकर समाप्ति के बाद पंडित, नाइ और नाउन सब मिल के वार और वधू दोनों पक्ष से सौदेबाजी शुरू कर देते हैं ! पहले वो कन्या पक्ष पर अधिक से अधिक भेंट और दक्षिणा देने कदबाब बनाते हैं और फिर उसका दुगुना वसूलने के लिए वर पक्ष पर दबाब बनाते हैं ! नाउन तो लड़की की विदाई के समय तक कुछ न कुछ मांगती रहती है ! ये सब देखने में बहुत खराब लगता है ! हिन्दू धर्माचार्यों को इसका कोई उचित समाधान निकालना चाहिए !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

वि + वाह= विवाह, इसका शाब्दिक अर्थ है- वि यानि विशेष और वाह यानी निर्वहन करना अर्थात अपने जीवन में सबसे विशेष उत्तरदायित्व का पूरी ईमानदारी और निष्ठा से आजीवन निर्वहन करना ! हिन्दू विवाह संस्कार पद्धति के अनुसार विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों के संबंध दर्शाता है, जिसे तोडा नहीं जा सकता ! अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार मात्र होता है, जिसे तोडा भी जा सकता है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

सनातन काल से चली आ रही हिन्दू विवाह संस्कार पद्धति में अग्नि के सात फेरे लेकर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं ! बहुत हैरत और अफ़सोस की बात है कि अब पंडित लोग बिना हवन कराये और बिना अग्नि प्रज्वलित किये ही सात फेरे लगवा दे रहे हैं ! मेरे विचार से यह सही नहीं है ! विवाह के समय अग्नि को साक्षी माना गया है, अतः उसकी उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

अन्य धर्मों से हिन्दू विवाह पद्धति के भिन्नता की मूलभूत विशेषता यही है कि हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध स्थापित करने पर जोर दिया जाता है, जो कि न सिर्फ आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र है, बल्कि पति-पत्नी के मानसिक, पारिवारिक सुख शान्ति और सांसारिक उन्नति के लिए भी बहुत आवश्यक है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

हिन्दू विवाह पद्धति में ऐसी व्यवस्था कि गई है कि पति-पत्नी रूपी दो इंसानों के बीच ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों के बीच भी प्रेम और भाईचारा बढे ! यही वजह है कि हिन्दू विवाह की परंपराओं में सात फेरों को सबसे महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है ! सात फेरों के बाद ही शादी की रस्म पूर्ण होती है ! सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं ! हिन्दू धर्म कि यह दृढ मान्यता है कि सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

हिंदू विवाह संस्कार के अंतर्गत वर-वधू अग्नि को साक्षी मानकर इसके चारों ओर घूमकर पति-पत्नी के रूप में एक साथ सुख से जीवन बिताने के लिए प्रण करते हैं और इसी प्रक्रिया में दोनों सात फेरे लेते हैं, जिसे सप्तपदी भी कहा जाता है ! यह सातों फेरे या पद सात वचन के साथ लिए जाते हैं ! हर फेरे का एक वचन होता है, जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं ! यह सात फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग में बैठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है ! इन सात वचनों में धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का अनिवार्य रूप से शामिल होना, अपने ससुराल वालों से अच्छा व्यवहार करना, बुढ़ापे में भी एक दूसरे का साथ देना, पति के द्वारा आत्मनिर्भर होने और हर कार्य में पत्नी की सलाह लेने का वचन देना, सबके सामने पत्नी का अपमान नहीं करना, हर तरह के दुर्व्यसन से दूर रहना और पराई स्त्रियों को माता के समान समझना आदि हैं ! विस्तृत रूप में कन्या द्वारा वर से लिए जाने वाले सात वचन इस प्रकार है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

प्रथम वचन- तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !! अर्थात- कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना ! कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें ! यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

द्वितीय वचन- पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !! अर्थात- कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

तृतीय वचन- जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात, वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !! अर्थात- तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

चतुर्थ वचन- कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !! अर्थात- कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे ! अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है ! यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

पंचम वचन- स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !! अर्थात- इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी कार्य हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

षष्ठम वचन- न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत, वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !! अर्थात- कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे ! यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

सप्तम वचन- परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या, वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !! अर्थात- सातवां और अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें ! यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

विवाह पश्चात पति अक्सर किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाते हैं और पत्नी का सुख चैन से जीना दूभर कर देते हैं ! इसी तरह से अधिकतर व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते हैं ! जब किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी की सलाह नहीं ली जायेगी तो पत्नी का परिवार में अधिकार और सम्मान भी नहीं रह जाएगा ! पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करने वाले इन वचनों के माध्यम से माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास कर सकती है ! इन वचनों को क़ानूनी मान्यता दिए जाने की सख्त जरुरत है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

पति-पत्नी के सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इन वचनों का पालन करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए ! इस तरह के वचन पति पत्नी दोनों अनिवार्य रूप से लें और इसे हिन्दू विवाह एक्ट के तहत कानूनन मान्यता दी जानी चाहिए ! अभी तक तो यह नैतिक रूप से ही मान्य है ! मेरे विचार से पति-पत्नी के बीच संबंध विच्छेद यानि तलाक का आधार भी इन वचनों का पालन नहीं करना बनाया जाना चाहिए ! महिलाओं के अधिकारों कि रक्षा के लिए मीडिया पर इन वचनों का व्यापक रूप से प्रचार प्रसार होना चाहिए !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

भारतीय कानूनों के अनुसार पत्नी को भरणपोषण पाने का अधिकार है, चाहे पति के पास संपत्ति हो अथवा न हो ! यदि पत्नी उचित कारणवश, जैसे पति के दुष्टतापूर्ण व्यवहार के कारण या उसके संक्रामक रोगों से आक्रांत होने के कारण, पति से अलग रहती है तब भी वह पोषण की अधिकारिणी है ! पति के उत्तराधिकारी से भी वह अधिकार की माँग कर सकती है, किंतु यह आवयक है कि वह अविवाहित ओर सुचरित्र रहे !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

पत्नी तथा पुत्रियों को कानूनन यह अधिकार है कि वे परिवार के निवासगृह में रहें ! यदि संयुक्त परिवार के अन्य सदस्य वह मकान विक्रय करना चाहते हैं, तब भी निवास का अधिकार नष्ट नहीं होता है ! क्रेता और विक्रेता को इस स्थिति में उन्हें उनका हिस्सा अनिवार्य रूप देना होगा ! यह हिस्सा भवन के भूभाग के रूप में या फिर आपसी रजामंदी से धन के रूप में भी हो सकता है !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

पहली पत्नी से कानूनन संबंध विच्छेद नहीं किये हुए पुरुषों से समझदार स्त्रियों को सदैव दूर ही रहना चाहिए ! भारतीय कानूनों के अनुसार उपपत्नी का संबंध चाहे जितने भी दीर्घकाल तक क्यों न रहा हो उसे अपने उपपति से पोषण पाने का कोई अधिकार नहीं है, किंतु यदि वह उपपति के मृत्यु पर्यंत तक उसके साथ धर्मपूर्वक रही हो तो उसे अपने उपपति की संपत्ति द्वारा पोषण पाने का अधिकार है !

Jitendra Mathur के द्वारा
March 17, 2016

बहुत खूब सद्गुरु जी । इस भावुकतापूर्ण, व्यंजनापूर्ण और सूचनादायी लेख की प्रशंसा के लिए उपयुक्त शब्द नहीं हैं मेरे पास । बहुत-बहुत साधुवाद आपको ।

Shobha के द्वारा
March 17, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी पूरे विवाह का वर्णन पढ़ा बहुत हंसी आई अपनी शादी याद आ गयी डॉ साहब ने मेरे पिता जी से कहा मेरे चाचा और भाईउनको बरात में जा कर क्लेश करने की आदत है मेरे पिताजी ने कहा आप चिंता न करें मेरठ के अस्पताल के इंचार्ज और एक बिजनेस मैंन थे दोनों फाइन पर्सनैलिटी उनको मेरे पिता जी ने इन दो महानुभावों की सेवा में लगा दिया| बस पूछिए मत उन्होंने जब वह गुस्से का मूड़ बनाते दोनों उन्हें कहते गुस्सा नहीं करना अरे आप दोनों कितने सुंदर हैं गुस्सा करते ही अजीब लगते हैं पूरी शादी शांति से निपट गयी | मेरे सुसराल की बिरादरी की पहली शादी थी जो उन क्लेशी लालों के होते हुए शान्ति से निपट गयी थी| परन्तु जब भी उन्हें गुस्सा आता मुझे आवाज लगाते मैं भाग कर आती भाग कर कहती आती हांजी जी चाचा जी वः कहते अरे तेरी साँस चढ़ रही हए आराम से आराम से

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भहारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! अच्छा प्रसंग छेड़ा आपने ! वाकई ऐसे लोंगो को सम्भालना मुश्किल काम है ! अनुभवी और रोचक प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

आदरणीय जितेंद्र माथुर जी ! सादर अभिनन्दन ! आपकी सार्थक और अनमोल प्रतिक्रिया ने मुझे भी निशब्द और निरुत्तर कर दिया है ! आपका ह्रदय से आभारी हूँ ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर धन्यवाद !

rameshagarwal के द्वारा
March 18, 2016

जय श्री राम सद्गुरुजी सबसे पहले आपके इस शुभ कार्य में मदद करने के लिए धन्यवाद् ये तो बहुत ही नेक काम किया जिस्केलिये आपको वर बधू के साथ भगवन का आशीर्वाद मिलेगा.पंजाबी व्याह की सुन्दर रीति की सुन्दर काव्य माध्यम से प्रस्तुत करके बहुत मनिरंजन उया अच्छा भी लगा.इस अच्छी प्रसूति के लिए आभार.

sadguruji के द्वारा
March 18, 2016

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! जय श्रीराम ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर धन्यवाद ! हमलोग तो अपनी भूमिका भर निभाते हैं, वस्तुतः करने कराने वाला ईश्वर ही है ! पोस्ट को पसंद कर उसे सार्थकता प्रदान करने के लिए धन्यवाद ! विवाह के अवसरों पर गाये जाने वाला ये पंजाबी लोकगीत मुझेबहुत पसंद है ! लोंगो को समझने में आसानी हो, इसलिए भावार्थ भी लिख दिया ! सादर आभार !

ashasahay के द्वारा
March 19, 2016

एक अच्छे सामाजिक कार्य के लिए आपको बधाई।

sadguruji के द्वारा
March 19, 2016

आदरणीया आशा सहाय जी ! सादर अभिनन्दन ! जी..हाँ..ये एक सामाजिक कार्य ही था ! भगवान की कृपा से सब सकुशल सम्पन्न हो गया ! ब्लॉग पर आने और बधाई देने के लिए धन्यवाद !

rajanidurgesh के द्वारा
March 20, 2016

सद्गुरुजी, अत्यंत वास्तविक चित्रण ,नायाब और विलक्षण आलेख . बहुत बहुत बधाई

meenakshi के द्वारा
March 20, 2016

सद्गुरु जी बहुत अच्छे ढंग से ” विवाह ” और अनेक सामाजिक पहलुओं का वर्णन किया . भाँति भाँति के लोग और सोच . बहुत बहुत शुभकामनाएं !

meenakshi के द्वारा
March 20, 2016

सद्गुरु जी बहुत अच्छे ढंग से ” विवाह ” और अनेक सामाजिक पहलुओं का वर्णन किया . भाँति भाँति के लोग और सोच . बहुत बहुत शुभकामनाएं !

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया रजनी दुर्गेश जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! पूरे विवाह का आयोजन वृतांत ज्यों की त्यों मैंने प्रकाशित कर दिया है ! पंजाब के एक मशहूर वैवाहिक लोकगीत को भी इसमें शामिल कर लिया है ! आपकी प्रतिक्रिया से मुझे ख़ुशी हुई कि मेरा परिश्रम और कुछ नए ढंग से ब्लॉग की प्रस्तुति का प्रयोग सफल रहा ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया मीनाक्षी जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! अपना अनमोल प्रोत्साहन देने के लिए और पोस्ट की सराहना करने के लिए धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया मीनाक्षी जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने बिलकुल सही कहा है कि हमारे समाज में भांति भांति के लोग होते हैं और उनकी सोच भी अलग अलग होती है ! प्रभु कृपा से सब सकुशल सम्पन्न हो गया ! उन्हें उन्हें कोटि कोटि नमन ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !

pooja के द्वारा
March 21, 2016

Wonderful article.. Sir, I salute you..!

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया पूजा जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपका सलाम स्वीकार करते हुए सभी कृपालु पाठकों को मैं सलाम करता हूँ ! पोस्ट की सराहना के लिए धन्यवाद ! मेरी पूरी कोशिश रहती है कि मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित होने वाली हर एक पोस्ट समाज के लिए सन्देशपरक और उपयोगी हो ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी, पंजाब के प्रसिद्ध लोक गीत के साथ आपने विवाह का अति सुंदर वर्णन किया है. मैं आगे थोड़ा लिख दूँ. बेटी की डोली जब घर के मुख्य द्वार पर पहुंचती है, बेटी फिर बाबा से गुहार लगाती हुई कहती है- “बाबा मेरा डोला दरवाजे से नहीं निकल पा रहा है.” बाबा कहता है- “मैं एक-एक ईंट हटा दूंगा. बेटी अपने घर जाओ.” डोला घर की चोखट से निकल कर गलियाँ पार करता हुआ खेतों की पगदंडी से गुजर रहा है. बेटी का अब मोह भंग हो गया है. उसने जौ की बाल तोड़ी और जौ निकाल कर बिना पीछे देखे सर से ऊपर से पीछे डालते हुए कहा- “मेरे जन्म दाता, माँ बाबा, मेरे भाईयो और मेरे परिजनों! तुम खुश रहो. खूब फलो फूलो. मैं तो परदेस जा रही हूँ. वहाँ जा रही हूँ जहाँ मेरा भाग्य ले जा रहा है. डोली एक दरवाजे पर रुकी. दुल्हन के स्वागत के लिए दुल्हे के परिजन खड़े थे. डोली रुक गयी. अब यही उसका घर आंगन था. डॉक्टर शोभा भारद्वाज.

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

इस गीत को पाकिस्तान में भी गाया जाता हैं वहाँ की गायिका मुसर्रत नजीर ऐसा गाती है कि कोइ भी पंजाब की बेटी सुन कर न रोये हो, ऐसा हो नहीं सकता. डॉक्टर शोभा भारद्वाज.

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! पाकिस्तान की गायिका मुसर्रत नजीर का लोकगीत यूट्यूब पर देखा ! उन्होंने बहुत अच्छा गया है ! आपने सही कहा है कि वो ऐसा गाती हैं कि कोइ भी पंजाब की बेटी सुन कर न रोये हो, ऐसा हो नहीं सकता ! लोकगीत का मुखड़ा तो वही हैं, किन्तु लोकगीत के बोलों में यानी अंतराल में परिवर्तन कर दिया गया है ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
March 21, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! आपके द्वारा इस लेख पर दी गई यह प्रतिक्रिया पाठकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, इसलिए इसे यहाँ पर प्रकाशित कर रहा हूँ ! आप पाकिस्तान के पंजाब वाले इलाके में वर्षों रही हैं, अतः इस लोकगीत से जुडी वो सभी यादें जो आपने जेहन में हैं, वो बहुत ज्ञानवर्धक और अनमोल हैं ! सादर आभार !

jlsingh के द्वारा
March 24, 2016

आदरणीय सद्गुरु जी, शायद शीर्षक का मतलब न समझ पाने के कारण मै आपके इस ब्लॉग तक पॉंच पाया वह भी सबसे ज्यादा चर्चित की सूची में देखकर … इस ब्लॉग की भावुकता, यथार्थ निरूपण, और टिप्पणियों व्याख्या की जितनी भी प्रशंशा की जाय कम है. आपका यह ब्लॉग अति महत्वपूर्ण है और इसे अलग कैटेगरी में सम्हालकर रखने की जरूरत है. एक पार आपका फिर से हार्दिक अभिनंदन! आप जैसे लोग इस भारत भूमि हैं तभी यह देश रसातल में जाने से बचा है अन्यथा क्या कहूँ… सादर!

sadguruji के द्वारा
March 25, 2016

आदरणीय सिंह साहब ! सादर अभिनन्दन ! लेख की हेडिंग पंजाबी लोक गीत का मुखड़ा है, इसलिए समझने में थोड़ी दिक्कत हुई होगी ! रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार ! आपकी प्रतिक्रया ने पोस्ट को सार्थकता प्रदान की है ! मेरी कोशिश यही रहती है कि पाठकों को हर ब्लॉग से कुछ न कुछ प्रेरणा मिले और उन्हें कुछ न कुछ सोचने विचारने को मिले ! इस कार्य में मिलने वाली सफलता असफलता ईश्वर पर छोड़ देता हूँ ! ब्लॉग पर समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

yamunapathak के द्वारा
March 26, 2016

सदगुरू जी आपके सामाजिक उत्तर्दायितवा को निभाने का गुण बहुत मानवीय है …रोचक घटनाओं संग सुन्दर ब्लॉग सभर

sadguruji के द्वारा
March 26, 2016

आदरणीया यमुना पाठक जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! सारे रीतिरिवाजों को निभाते हुए कम से कम खर्च में इस वैवाहिक कार्यक्रम का आयोजन करना वाकई एक बहुत बड़ी चुनौती थी ! सबके सहयोग और ईश्वर की महती कृपा से सब सकुशल सम्पन्न हो गया ! ब्लॉग को पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !


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