सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: धरती व भक्त दोनों को श्रीकृष्ण की जरुरत है

Posted On: 23 Aug, 2016 Junction Forum,Special Days,Religious में

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ना तन का ध्यान रहा ना मन का ध्यान रे
आज सभी सुंदरियां भूली हैं भान रे
सखियों के संग संग
ठनक रही है मृदंग
पुलकित है अंग अंग
मन में उछले तरंग
झूम झूम कामिनिया ऐसी हुई बावली
बालों की लट उलझी रे
हो गोपियाँ नाचें छुमक छुम
कान्हा बजाये बंसरी और ग्वाले बजाएं मंजीरे
हो गोपियाँ नाचें छुमक छुम….

रासलीला का वास्तविक स्वरूप यही है, जो इस गीत में वर्णित है. संसार में जब कोई पुरुष दो चार स्त्रियों से दोस्ती कर ले या प्रेम कर ले या कोई स्त्री ऐसा करे तो लोग छींटाकसी करने लगतें है कि रासलीला चल रही है. ये मायिक जगत का प्रेम है और छींटाकसी करने वाले भी मायिक हैं. भगवान की माया ने किसी को सतोगुण किसी को रजोगुण और किसी को तमोगुण से घेर रक्खा है. लोग उसी के अनुसार बोलतें और व्यवहार करते हैं. रासलीला मायिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक जगत की उच्च अवस्था है जहाँ पर शरीर की सुधबुध नहीं रहती है और जीव भगवान के आनंद में लीन हो जाता है. भगवान कृष्ण की रासलीला वाली तस्वीरें देखिये. उसमे भगवान कृष्ण के साथ एक से बढकर एक सुंदर गोपियाँ, कोई पूजा की थाल हाथ में लिए है और कोई माला, शरीर की सुधबुध भी किसी को नहीं. भगवान कृष्ण बांसुरी बजाते हुए अपने स्वरुप में लीन हैं और गोपियाँ उनमें अर्थात भगवान में लीन हैं.

Shree_Krishna_Gopi_Radha_Raasleela sahi photo
यहाँ पर सांसारिक जगत का कोई मायिक प्रेम नहीं है बल्कि तन, मन, बुद्धि और अहंकार से उपर उठकर आध्यात्मिक जगत का विशुद्ध प्रेम है. भगवान अपनी स्वरुपशक्ति में लीन हैं और भक्त भगवान में. रास शब्द में रा जीव है और स परमात्मा. जीव और परमात्मा का मिलन ही रास है, भगवान का भक्त को दर्शन देना ही लीला है. एक आध्यात्मिक शब्द है राधा. शाश्वत धाम से ईश्वर अंश जीव की संसार की ओर गति ‘धारा’ है अर्थात धा यानि अपने शाश्वत धाम से रा यानि जीव इस नश्वर संसार में आया. इसके ठीक उलट जीव का इस संसार को छोड़ अपने शाश्वत धाम वापस जाना ‘राधा’ है. ‘राधा’ शब्द का जाप एक भजन है. अपने शाश्वत धाम वापस जाने का सद्प्रयास है. भजन करने वाला हर जीव राधा है. भजन शब्द का अर्थ है भज न अर्थात भागना मत. अब फिर से संसार की ओर भागना मत, भगवान के भजन में लगे रहना एक दिन सफलता जरूर मिलेगी.

अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण जी से पूछा था कि ईश्वर कहाँ रहतें हैं और क्या करतें हैं? श्रीमदभगवद्गीता के अध्याय 18 श्लोक 61 में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को उसके प्रश्न का उत्तर दिया था कि हे अर्जुन! ईश्वर एक हैं और वो सभी प्राणियों के ह्रदय में रहतें हैं. अंतर्यामी ईश्वर अपनी मायाशक्ति के जरिये जीवों को उनके कर्मानुसार सांसारिक आवागमन (जन्म-मृत्यु) देतें हैं और एक योनि से दूसरी योनि में भ्रमण करातें हैं. संतजन कहतें हैं कि भगवान ह्रदय में बैठकर जीव के सारे कर्मों को देखतें हैं, उसके पाप पूण्य को नोट करतें हैं, यहाँ तक कि जो अच्छा-बुरा हम सोचतें है भगवान वो भी नोट करतें हैं और उसके अनुसार अच्छा-बुरा फल भी देते है. संसार में जो लोग पाप कर्म में रत है, जो लोग चोरी, बेईमानी करतें हैं, जो लोग भ्रष्ट्राचार में लिप्त हैं और जो लोग रिश्वत लेते हैं वो लोग भ्रम में जीतें हैं कि कोई उन्हें देख नहीं रहा है.

भगवान उन्ही के भीतर बैठकर सब कुछ नोट कर रहें हैं, जब उनके बुरे कर्मो का उन्हें दंड मिलेगा तब रोने पछताने के सिवा कुछ नहीं कर पायेंगें. इसीलिए कहतें हैं कि भगवान की लाठी जब पड़ती है तो आवाज़ नहीं करती. ये भगवान् श्री कृष्ण की ही अनुपम और अनमोल कृपा है कि मैं परमात्मा का एक भक्त हूँ और पीड़ित मानवता की थोड़ी-बहुत सेवा कर पा रहा हूँ. बचपन से ही मै भगवद गीता और भगवान कृष्ण से बहुत प्रभावित था. गीता पढ़कर मुझे हमेशा यही लगता है कि कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम अर्थात मै उन श्री कृष्ण की वंदना करता हूँ. वो पूरे जगत के गुरु हैं. भगवान श्री कृष्ण ने निराकार परमात्मा की भक्ति पर विशेष जोर दिया. उसी परम्परा को बाद में आदिशंकराचार्य जी ने आगे बढाया. उन्हें भी जगतगुरु की संज्ञा दी गई. उन्होंने तो साफ साफ कह दिया कि ‘ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या’ अर्थात निराकार परमात्मा ही सत्य है, ये संसार जो आँखों से दिखाई देता है वो झूठ है.

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आगे चलकर इसमें थोडा संसोधन किया गया कि परमात्मा ही सत्य है और संसार स्वप्न सरीखा है. आगे चलकर इसमें थोडा और संसोधन हुआ कि परमात्मा हमेशा के लिए सत्य है और संसार कुछ समय का सत्य है. मुझे तो जगतगुरु आदिशंकराचार्य जी का मूल उपदेश ही प्रिय लगता है कि ‘ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या’. आदिशंकराचार्य जी ने बहुत अल्प जीवनकाल में हिन्दू धर्म और हिन्दू दर्शन के लिए जो कुछ भी किया वो आज तक कोई नहीं कर पाया. वो अंतिम समय तक अपनी शारीरिक बीमारियों से जूझते हुए पूरे भारतवर्ष में नंगे पांव चलकर हिन्दू धर्म के उत्थान में लगे रहे. भगवान श्रीकृष्ण और आदिशंकराचार्य जी ये दोनों ही वास्तव में जगतगुरु हैं. जिन महापुरुषों ने भी त्याग और तपस्यापूर्ण जीवन जीते हुए हिन्दू धर्म का उत्थान करने का कार्य किया है, हम सब लोग हमेशा से ही उनके प्रसंशक व ऋणी हैं और हमेशा रहेंगे.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के परम पुनीत अवसर पर उन सभी महापुरुषों और सद्गुरुओं का मैं हृदय से नमन करता हूँ, जिन्होंने मुझे भगवान श्री कृष्ण की अदभुद और आध्यात्मिक लीलाओं को समझने तथा स्वयं और परमात्मा को जानने के लिए भगवद्गीता पढ़ने की सलाह दी. मैंने हमेशा उन लोगों की आलोचना की है जो धार्मिक होने का पाखंड व दिखावा भर करते हैं. असलियत में वो लोग झूठ और भोग-विलास का जीवन जीते हुए अपने कुकर्मों से हिन्दू धर्म की हानि ही कर रहे हैं और पूरी दुनिया में हिन्दू धर्म को बदनाम कर रहे हैं. इनके प्रति सहानभूति या दया दिखाकर हम अपने धर्म की ही क्षति कर रहें हैं. जो सच्चे संत हैं, हिन्दू धर्म के उत्थान में लगें हैं, हम सब लोगों को मिलकर उनका साथ देना चाहिए और जो गलत हैं, हिन्दू धर्म को बदनाम कर रहें हैं, उनको पुलिस और कानून के हवाले करें तथा उनका तिरस्कार करते हुए सामाजिक बहिष्कार करें. अंत में बस यही कहूंगा-

संकट में है आज वो धरती,
जिस पर तूने जनम लिया
पूरा कर दे आज वचन वो,
गीता में जो तूने दिया
कोई नहीं है मोहन तुम बिन,
भारत का रखवाला रे
बड़ी देर भई नंदलाला
तेरी राह तके बृजबाला
ग्वाल-बाल इक-इक से पूछे
कहाँ है मुरली वाला रे
बड़ी देर भई नंदलाला….

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
August 24, 2016

जय श्री राम सद्गुरुजी आपने सही कहा की धरती और भक्त दोनों को भगवान् के आने की प्रतीक्षा है लेकिन भगवान् का अवतार तो कलयुग के अंत में ४२७००० साल बाद होगा लेकिन वे कुछ महा पुरशो को जरूर भेजेंगे हमलोगों को कल्याण के लिए ज्यादातर भारत वशी उनका जन्मदिन मन लेते लेकिन उनकी गीता की शिल्षा को नहीं मानते जबकि पच्छिम देश मानते.हम न तो कर्म की संस्कृति पर विश्वास करते न ही आतंकवादियो और दुस्तो को ख़तम करने में आतंकवादी की पैरवी यहाँ ही होती सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार .

Shobha के द्वारा
August 25, 2016

श्री आदरणीय राजेन्द्र ऋषि जी मेरा विवाह मथुरा में हुआ हमारा पूरा परिवार बांके बिहारी का भक्त अम्मा जी नगे पैर वृंदावन जाती थी बहुत रोकने पर मानीं मेरे बच्चे बेटी और एक बेटा कभी भी जब भी भगवान से मांगना होता है छोटा मोटा नहीं बड़ी इच्छाएं दादी जी के दिए संस्कारों से वृन्दावन रोड पर उतर कर पैदल कभी – कभी बिना चप्पल पहने दर्शन करने जाते हैं मुझ पर शुरू में पढ़ रही थी जेएनयू का असर था थोड़ा मन में तर्क था लेकिन अब तो पूरी तरह मथुरा वृन्दावन के रंग में रंग गयी हूँ |वहाँ ऐसे लगता है साक्षात भगवान बिराज रहें हैं आपने सुंदर लेख द्वारा कान्हा के नजदीक ले गये आस्था बहुत बड़ी बात है

sinsera के द्वारा
August 25, 2016

रीति काल के कवियों द्वारा भगवन कृष्ण की छवि को बहुत धूमिल किया गया. शायद इसीलिए श्रीकृष्ण के संदेशों और उपदेशों को रास-लीला से इतर काम ही समझा जाता है. आप ने तो बहुत पढ़ रखा है, यदि आपके लेख ही कोई ध्यान पूर्वक पढ़ ले तो भटकाव को सही दिशा मिल सकती है. अच्छे व समाजोपयोगी लेख प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद आपका.

Surendar Agarwal के द्वारा
August 25, 2016

बहुत सुन्दर || जय श्री कृष्णा !! जन्माष्टमी की सबको शुभकामनायें ||

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

आदरणीय सुरेंद्र अग्रवाल जी ! जय श्रीकृष्ण ! ब्लॉग को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! आपको भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई !

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट की सराहना के लिए धन्यवाद ! आपकी बात से सहमत हूँ कि अधिकतर लोग भगवान् श्रीकृष्ण जी का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाते हैं, किन्तु उनकी शिक्षाओं पर अमल नहीं करते ! गीता को पढ़ने और समझने की चेष्टा ही नहीं करते ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपने बिलकुल सही कहा है कि आस्था बहुत बड़ी बात है ! कहते हैं कि आज भी बांके बिहारीजी के मन्दिर में उनके साक्षात दर्शन उनमे रमे भक्तों और भोले-भाले छोटे बच्चों को होते रहते हैं ! आपका अनुभव भी प्रेरक और अनुकरणीय है ! हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! अपनी सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया से पोस्ट को सार्थकता प्रदान करने के लिए और उत्साहवर्धन करने के बहुत बहुत धन्यवाद ! आपने ठीक कहा है कि रीति काल के कवियों ने भगवान् कृष्ण की छवि को बहुत हद तक धूमिल किया ! भगवान् श्रीकृष्ण जी के उपदेश जो भगवद्गीता के रूप में संकलित है, वो सदैव प्रासंगिक और सामयिक रहा है और रहेगा ! सभी को पढ़ना और समझना चाहिए ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

एक आध्यात्मिक शब्द है राधा. शाश्वत धाम से ईश्वर अंश जीव की संसार की ओर गति ‘धारा’ है अर्थात धा यानि अपने शाश्वत धाम से रा यानि जीव इस नश्वर संसार में आया. इसके ठीक उलट जीव का इस संसार को छोड़ अपने शाश्वत धाम वापस जाना ‘राधा’ है.

sadguruji के द्वारा
August 26, 2016

‘राधा’ शब्द का जाप एक भजन है. अपने शाश्वत धाम वापस जाने का सद्प्रयास है. भजन करने वाला हर जीव राधा है. भजन शब्द का अर्थ है भज न अर्थात भागना मत. अब फिर से संसार की ओर भागना मत, भगवान के भजन में लगे रहना एक दिन सफलता जरूर मिलेगी.

achyutamkeshvam के द्वारा
August 27, 2016

जय श्री कृष्ण ……जन्माष्टमी की शुभकामनायें

achyutamkeshvam के द्वारा
August 27, 2016

जय श्री कृष्ण

sadguruji के द्वारा
August 27, 2016

आदरणीय अच्युतमकेश्वम जी ! जय श्री कृष्ण ! सादर अभिनन्दन ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 27, 2016

आदरणीय अच्युतमकेश्वम जी ! जय श्री कृष्ण ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपको भी जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें !

harirawat के द्वारा
August 28, 2016

“संकट में है आज वो धरती जिसमें तूने जन्म लिया, पूरा करले आज बचन वो गीता में जो तूने दिया”, बहुत खूब सतगुरु जी, आप का सानिध्य पाकर आदिगुरु शंकराचार्य जी और श्रीकृष्ण भगवान् से साक्षात्कार कर लेते हैं ! आपने सही कहा की श्रीकृष्ण तो साक्षात प्रब्रह्म परमेश्वर थे, और जब श्रीशंकराचार्य जी का जन्म हुआ था सारा भारत अँधेरे में भटक रहा था, कोई मार्ग दर्शक गुरु नहीं था ! इन्होंने अपने अल्पकाल में कन्या कुमारी से काश्मीर की घाटी तक और गुजरात से पूरब में अरुणाचल तक पैदल यात्रा करके सोये हुए इंसानों को जगाया, सनातन धर्म का प्रचार प्रसार करके आधुनिक हिन्दू धर्म को प्रकाशित किया ! इनके मंदिर जहां जम्मू में है तो भारत के चारों दिशाओं में भी है ! जम्मू और रामेश्वर जाकर शंकराचार्य मंदिर में जाकर माथा टेकने का अवसर मिला था ! सुन्दर शिक्षाप्रद लेख के लिए चरण वन्दना स्वीकार करें ! हरेन्द्र

sadguruji के द्वारा
August 29, 2016

आदरणीय हरेन्द्र रावत जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! अपनी अनमोल प्रतिक्रया से पोस्ट को सार्थकता प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार ! ये आपका साहित्यिक प्रेम और बड़प्पन है, जो आपको साहित्य पारखी के साथ साथ एक बहुत अच्छा साहित्यकार भी बना दिया है ! सादर आभार !


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