सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

455 Posts

5007 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15204 postid : 1291092

भगवान निराकार हैं या साकार या दोनों? क्या भगवान् धरती पर जन्म लेते हैं?

Posted On: 4 Nov, 2016 Junction Forum,Religious,Social Issues में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

भगवान निराकार हैं या साकार अथवा दोनों? और धरती पर मानव शरीर धारण करके जन्म लेतें हैं या नहीं? यह प्रश्न आदिकाल से भक्तों और जिज्ञासुओं के लिए एक खोज का विषय रहा है. गीता में वर्णित है कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिव्यदृष्टि प्रदान करके अपना विराट ज्योतिर्मय स्वरुप दिखाया. भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में कई जगह वर्णन किया है कि उनका मूल स्वरुप निराकार और सर्वव्यापी है, परन्तु सगुण भक्तों के लिए उनका सगुण स्वरुप है और दिव्य लोक भी है. निराकार और सर्वव्यापी भगवान भक्तों की भावनाओं के कारण नाद व् ज्योतिर्मय स्वरुप में और मानव रूप में भी दर्शन देते हैं. क्या भगवान धरती पर मानव शरीर धारण करके जन्म लेते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर भगवान श्री कृष्णजी स्वम देतें हैं, वो गीता के अध्याय ४ श्लोक ५ में कहतें हैं-
हे अर्जुन! मैंने और तुमने इस धरती पर बहुत बार जन्म लिया है. तुम ये सब नहीं जानते, परन्तु मै जानता हूँ.
यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन को समझाना चाहते हैं कि अर्जुन तुम एक साधारण मनुष्य की भांति हो, जिसे पूर्व जन्मों कि याद नही रहती और मै अपनी माया को अपने वश में करके अपनी स्वरुपशक्ति के साथ प्रगट होता हूँ, इसीलिए मै धरती पर जन्म लिए अपने सारे जन्मों को जानता हूँ और तुम्हारे ही नहीं बल्कि सभी प्राणियों के सभी जन्मों को जानता हूँ. यहाँ पर स्पष्ट हैं कि भगवान अपनी योगशक्ति के साथ दिव्य मानव शरीर धारण करके धरती पर जन्म लेतें हैं.
hqdefault
हर साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर और किसी भी बड़े संकट के समय हमलोग भगवान् को ह्रदय से याद करते हैं और उनसे प्रार्थना करतें हैं कि हे प्रभु इस धरती पर दिव्य मानव शरीर धारण करके फिर से आइये. धरती पर अशांति, हिंसा, लूटपाट, रेप, भ्रस्टाचार, महंगाई और झूठ का साम्राज्य स्थापित हो गया है. हमें इन सब राक्षसों से छुटकारा दिलाइये. हमारे सांसारिक दुखों को दूर कर हमें भक्ति और मोक्ष का मार्ग दिखाइए. गीता के अध्याय ४ श्लोक ७ में भगवान श्री कृष्णजी ने अर्जुन से कहा है कि- हे अर्जुन! संसार में जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मै अपने रूप को रचता हूँ, अर्थात संसार में साकार रूप में कहीं न कहीं जरूर प्रगट होता हूँ.

यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन को समझाना चाहते हैं कि संसार में कहीं भी हिंसा, भ्रस्टाचार, लूटपाट और अत्याचार का बोलबाला हो जाता है तो भगवान अपना कोई न कोई रूप रचकर वहां पर साकार रूप में प्रगट हो जातें हैं और वहां की समस्यायों को हल करतें हैं. भगवान जब तक न चाहें हम उनके रूप को नहीं पहचान सकते, भले ही वो हमारे साथ किसी भी रूप में रह रहें हों. मुझे ऐसा महसूस होता है कि हमारे देश कि समस्याओं को दूर करने के लिए भारत में इस समय भी भगवान जरुर कोई न कोई रूप रचकर हम सबके बीच हैं, जिसका बोध समय आने पर हमें होगा. भगवान जिसको जनाना चाहतें हैं, वही उनको जान पाता है, “सो जानत जेहि देहु जनाई” और भगवान को जानकर व्यक्ति उन्ही का समरूप हो जाता है. “जानत तुमहि तुमहि होई जाई.”

मनुष्य अपने प्राकृतिक नेत्रों से भगवान को नहीं देख सकता. भगवान श्री कृष्णजी अर्जुन से कहतें हैं कि हे अर्जुन मेरे विराट स्वरुप और मेरी विभूतियों को देखो, परन्तु अर्जुन को अपने सांसारिक नेत्रों से कुछ नजर नहीं आता, तब भगवान का ध्यान इस ओर जाता है कि अरे ये तो अपने इन प्राकृतिक नेत्रों से मेरा विराट स्वरुप और मेरी विभूतियों को देखने की कोशिश कर रहा है, जो कि संभव नहीं है. गीता के अध्याय ११ श्लोक ८ में वर्णन है कि भगवान श्री कृष्णजी अर्जुन से कहतें हैं कि- हे अर्जुन! मुझको तू अपने इन प्राकृतिक नेत्रों द्वारा नहीं देख सकता है, इसीलिए मै तुझे दिव्यनेत्र प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तू मेरे विराट स्वरुप और मेरी ईश्वरीय विभूतियों को देख सकता है.
imagesnbn
अर्जुन भगवान का विराट व् ज्योतिर्मय स्वरुप तब देख पाता है जब उसे भगवान दिव्य दृष्टी प्रदान कर देते हैं. भगवान का यही नियम आज भी लागू है. भगवान भक्त को कब ऐसी दिव्यदृष्टि प्रदान करतें हैं? मानस में इसका उत्तर दिया गया है- अतिशय प्रीति देखि रघुविरा, प्रगटे हृदय हरण भवभिरा. भगवान से अतिशय व् अन्नय प्रेम हो जाये, बस यही योग्यता चाहिए भगवान की दिव्यदृष्टि पाने के लिए. भगवान कैसा, कहाँ और किस रूप में दर्शन देते है? मानस में इसका उत्तर दिया गया है- “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन तैसी.” हम भगवान के जिस रूप की भी कल्पना करतें हैं, भगवान उसे मान लेतें हैं और उसी रूप में भक्त को दर्शन दे देते हैं.

जिन्हें भगवान से अतिशय प्रेम हो जाता है और जो अपने हृदय में भगवान का दर्शन करना चाहतें हैं, भगवान उनके ह्रदय में प्रगट हो जातें हैं.भगवान गीता के अध्याय १८ श्लोक ६१ में स्वम कहतें हैं कि-हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के ह्रदय में स्थित है. संतमार्ग के अनुसार जो संत नाद व् प्रकाश के रूप में शरीर के भीतर भगवान का दर्शन पाना चाहतें हैं, उन्हें वैसा ही दर्शन शरीर के भीतर भगवान प्रदान करतें हैं.भगवान् का पूर्ण अवतार हमेशा नहीं होता है, किन्तु भगवान हम सबके ह्रदय में विराजमान हैं और हम सबके अंश रूप में भारत भूमि पर साकार रूप में प्रगट हैं. समस्याओं से संघर्ष को भगवान् का कार्य समझते हुए आइये हम सब मिलकर देश में व्याप्त अशांति, हिंसा, लूटपाट, रेप, भ्रस्टाचार, महंगाई और झूठ रूपी राक्षसों से लड़ें, ताकि हमारी बड़ी समस्याओं का समाधान हो.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
November 4, 2016

जय श्री राम सद्गुरुजी भगवन जी सगुन और निर्गुण रूपो में होते हमारे पुरानो में भगवन के एक चतुर्युग में २४  या १० मुल्ह्या अवतारों का वर्णन है २३ अवतार हो चूले २४ लक्युग के अंत में संभल में कलंको अवर विष्णु शर्मा जी के याहन होगा शिव जी ने पार्वतीजी को समझाते कहा की निर्गुण भगवन भक्तो के प्रेम से सगुन रूप लेते है वे जन्म नहीं लेते प्रगट होते भगवान् का रहस्य जानना हम लोगो के बश का नहीं विश्वास ही एक सहारा है.भारतीय संस्कृति को तो अब पच्छिम वाले भी मानने लगे है .इसपर जितना भी लिखा जाए कम है.सार्थक लेख .

sadguruji के द्वारा
November 5, 2016

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! जय श्रीराम ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! ऐसे सांस्कृतिक और महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होते रहना जरुरी है ! सादर आभार !

Shobha के द्वारा
November 5, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी अति उत्तम लेख सबके मन में उठने वाली जिज्ञासा को संतुष्ट करता लेख उत्तम लेख की प्रशंसा में जितना लिखा जाये कम है मेरे ननिहाल में अपना मन्दिर है मेरी शादी मथुरा में हुई यद्यपि में मानती हूँ जेएनयू अंतर्राष्ट्रीय विषयों की उत्तम लायब्रेरी है रिसर्च के दौरान लायब्रेरी में नियमित जाती थी विचार कुछ पलटे मार्क्सवाद की तरफ रूची जगी लेकिन अब बिलकुल श्रद्धालू हूँ परदेस में रह कर इन्सान बदल जाता है मुस्लिम में एक अच्छी बात है वह धर्म और अपनी आस्था में कभी तर्क नहीं करते

sadguruji के द्वारा
November 5, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! वस्तुतः भगवान् अनुभव के विषय हैं, बुद्धि, अहंकार और मन द्वारा किये जाने वाले तर्क के नहीं ! पोस्ट की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

drashok के द्वारा
November 6, 2016

श्री राजेन्द्र जी मैने गीता पढ़ कर समझने की कोशिश की पहली बार कुछ समझ में नहीं आया दूसरी बार कुछ समझने लगा तीसरी और चौथी बार काफी समझ में आयी वाकई हमारे वेदों उपनिषदों का सार गीता है आपने आसान तरीके से भगवतगीता गीता के कुछ हिस्से स्पष्ट किये अच्छा लगा आज के बच्चे धर्म से विमुख होते जा रहे हैं दुःख होता है |

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

आदरणीय डॉक्टर अशोक भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपने सही कहा कि आज के बच्चे धर्म से विमुख होते जा रहे हैं ! दरअसल आज के युग में धर्म का कोलाहल जरूर बढ़ गया है, किन्तु उसकी शिक्षा का स्तर गिर गया है ! सभी धर्मों अनुयायियों को बढ़ाने की होड़ है, किन्तु सही मार्गदर्शन देने वालों का अभाव है ! गीता जितनी बार भी पढ़िए, कुछ न कुछ नया गूढ़ अर्थ जरूर मिलेगा ! पोस्ट की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

RAJEEV GUPTA के द्वारा
November 7, 2016

आदरणीय राजेन्द्र ऋषि जी, जनहित को ध्यान में रखकर आपने बहुत ही सुन्दर आलेख बहुत ही सरल भाषा में प्रस्तुत किया है, जिसके लिए आप बधाई के अधिकारी हैं.

sadguruji के द्वारा
November 7, 2016

आदरणीय राजीव गुप्ता जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट की सराहना के लिए धन्यवाद ! आज के व्यस्त समय में अध्यात्म को सरल भाषा में लोंगो तक पहुंचाना जरुरी है ! आज के युग में अधिकतर लोंगो के पास धर्मग्रंथों का गूढ़ अध्ययन करने की फुरसत ही नहीं है ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !


topic of the week



अन्य ब्लॉग

latest from jagran