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सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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आध्यात्म के नाम पर अब तो सिर्फ एक बहुत वृहद् कारोबार भर चल रहा है

Posted On: 6 Nov, 2016 Junction Forum,Religious,Social Issues में

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कहा जाता है कि भगवान दत्तात्रेय महाराज के अनेकों गुरु थे. माता, पिता, भाई, बहन, मित्र, आम जनता से लेकर पशु, पक्षी और यहाँ तक की धरती व् आसमान, आग, हवा, पानी सबको उन्होंने अपना गुरु माना. जिससे भी उनको कोई न कोई ज्ञान मिला. संसार के जड़ पदार्थों और चेतन प्राणियों की गतिविधियों को देखकर हर एक से उन्हें कुछ न कुछ सीखने को मिला, उसी ज्ञान के आलोक में उनकी भगवद भक्ति चरम शिखर पर पहुंची और भगवान के दर्शन हुए, उसके बाद तो वो स्वयम भगवद स्वरुप हो गये. भगवान दत्तात्रेय ने अपने दिव्य जीवन दर्शन से यह सिद्ध किया कि व्यक्ति अपने माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, शिक्षा देने वाले गुरुजनों और यहाँ तक कि किसी अनजान व्यक्ति से भी जीवन में कभी न कभी और कुछ न कुछ जरुर सीखता है. उपयुक्त समय पर हमें जो सही सलाह दे, हम जब दुविधा में फंसे हों तब हमें जो सही मार्गदर्शन दे, वही सच्चा गुरु है.
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मित्रों! समय भी आपका गुरु है, जो आपको आखिरी साँस तक आपको कुछ न कुछ नया ज्ञान देता रहेगा. जीवन में दुःख-दर्द झेलकर और दर-दर की ठोकर खाकर भी आदमी बहुत कुछ सीखता है. सच तो यही है कि हर आदमी अपने जीवन में सबसे ज्यादा अपनी स्वयम की गलतियों से सबक सीखता है, इसीलिए संत मार्ग में कहा गया है-
आपही गुरु आपही चेला,
आपही रचे जगत का मेला.
आपही ढूंढे राह अकेला,
आपही काटे सबै झमेला.

जीवन पथ पर चलते हुए किसी दूसरे का अनुभव हमें शिक्षा दे सकता है, परन्तु हमारा अपना निजी अनुभव ही हमारा कल्याण करेगा. महात्मा बुद्ध ने बहुत सही कहा था- अप्प दीपो भव: अर्थात अपना दीपक स्वयम बनो. अपने अनुभव से काम लो. भक्तों का इतिहास यदि हम पढ़ें तो यह पता चलता है की बहुत से भक्त ऐसे हुए हैं जो बिना गुरु के भगवान का दर्शन किये. उन्हें दर्शन देने के बाद भगवान ने उनको उस समय के सच्चे गुरु के पास भेजा. बिना गुरु के भी घर बैठे भगवान की भक्ति करके भगवान का दर्शन या अनुभव किया जा सकता है. गुरु का काम केवल मन की सफाई करना है, ताकि साफ़ मन में भगवान की छवि दिखाई दे सके. व्यक्ति ज्ञान के द्वारा अपनी दृढ इच्छाशक्ति का प्रयोग करके घर बैठे हुए भी अपने गंदे मन की सफाई कर सकता है. यदि कोई सच्चे संत मिल जाएँ तो उनके निर्देशन में आसानी से यह कार्य हो जाता है.

पिछले कई वर्षों में लाखों शिष्यों के ह्रदय में बसने वाले कई प्रसिद्द धार्मिक गुरुओं के नैतिक रूप से पतित होने होने और उनके जेल जाने की घटनाओं ने पूरे देश का आध्यात्मिक माहौल ख़राब कर दिया है. घर-घर में लोग संतों को कोस रहें है. बहुत से लोग जो किसी अपने किसी प्रिय गुरु या संत के पास जाते थे, वो चुप हैं और मन में भयभीत व् सशंकित हैं. जो किसी संत के पास नहीं जाते थे, उन्हें तो विशेष रूप से संतों को जी भरके गाली देने का मौका मिल गया है. वो मुंह बनाकर जेल में बंद संतों को कोसते हुए कहते हैं, ‘अरे.. सब वैसे ही हैं.. भ्रष्ट और अपराधी.. कहीं मत जाओं.. घर में बैठकर ध्यान भजन करो.’ पिछले कुछ वर्षों में हिन्दू धर्म की धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से क्षति हुई है, वो बहुत चिन्तनीय है. हिन्दू धर्म की क्षति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं जो सच्चे संत हैं, उन पर भी लोगों का भरोसा अब पहले जैसा नहीं रहा.
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मैं ऐसे बहुत से लोंगो को जानता हूँ, जो किसी आश्रम में वर्षों तक रहे, वहां पर खूब सेवा भी किये किन्तु जब आश्रम के संचालकों का असली रूप देखे, वहां का नैतिक पतन और वहां की गन्दी राजनीति देखे तो घर लौट आये. अब उन्हें पछतावा हो रहा है कि धर्म और आध्यात्म को जानने के जूनून में क्यों अपने जीवन के कई कीमती वर्ष व्यर्थ गँवा दिए? अब तो न घर के रहे न घाट के. कई आश्रमों में जहाँ पर लाखों की भीड़ इकट्ठा होती है, वहां पर फ्री में सेवा कर जनता अपना कीमती समय, धन और श्रम तीनों लुटाती है. हजारों-लाखों की भीड़ के बीच लोग दीक्षा ले लेते हैं, किन्तु दीक्षा देने के बाद उनसे कोई पूछता नहीं कि भजन कर रहे हो कि नहीं? बस एक ही चीज शिष्यों के दिमाग में घुसी रहती है कि ‘हमारे गुरु पूरी दुनिया भर में सबसे ज्यादा पहुंचे हुए हैं और हमारा मत सबसे ऊंचा है.’ शिष्य को वस्तुतः पता ही नहीं कि गुरु कितने पहुंचे हुए हैं और वो एकदिन खुद कहाँ जा पहुंचेगा? दरअसल कई वर्षों तक वो ये जान ही नहीं पाते हैं कि आध्यात्म के नाम पर यहाँ तो एक बहुत बड़ा कारोबार चल रहा है.

जो लोग संत प्रेमी हैं और इस समय दुखी हैं, सदमे में हैं, उनसे मै बस यही कहूँगा की वो भगवान की भक्ति जारी रक्खें और अपने दुखी मन को समझाएं कि-
गुरु की करनी गुरु भरेगा,
चेले की करनी चेला,
उड़ जायेगा हंस अकेला.

आज भारतवर्ष में ऊपर से लेकर नीचे तक सब झूठ, फरेब और भ्रस्टाचार के दल-दल में आकंठ डूबे हुए हैं, तभी तो देश की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से दिन-प्रतिदिन दुर्दशा बढ़ती ही जा रही है. देश तभी सुधरेगा, जब देश का हर व्यक्ति स्वयम को शिक्षा देकर अपने को सुधारेगा. आज जरुरत इस बात की है कि देश का हर व्यक्ति स्वयम का गुरु बने और स्वयम को ही सबसे पहले शिक्षित करे.

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

Surendar Agarwal (US) (ईमेल पर प्राप्त एक प्रतिक्रिया) आपने बहुत अच्छा लिखा है | में यह कहता हूँ की आप किसी भी गुरु के पास जाएं उससे सीखें और अभ्यास करे पर उससे चिपकने की आवश्यकता नही, वो भी शरीरधारी है विकार उसमे भी जन्म ले सकते हें और फिर — आपका लेख बाकी बता ही रहा है | मेरे एक जानने वाले बाबा गंगोत्री की गुफा मे रहते थे, वो एसे “गुरुओं” के बारे मे बोलते थे की अरे यह नरक मे जायेंगे नरक मे, साधना तो इन्होने करी पर माया किसी को नही छोड़ती | लक्ष्य हमेशा आपना ध्यान मे रखकर उसकी और बढते जाओ, गुरु की अपनी यात्रा है आपकी अपनी | जय श्री कृष्ण ||

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

आदरणीय सुरेन्द्र अग्रवाल जी ! जय श्री कृष्ण ! ब्लॉग पर आपका स्वागत है ! आपने बहुत सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया दी है ! आपने बिल्कुल सही कहा है कि “आप किसी भी गुरु के पास जाएं उससे सीखें और अभ्यास करे पर उससे चिपकने की आवश्यकता नही, वो भी शरीरधारी है विकार उसमे भी जन्म ले सकते हें !” आपकी यह बात भी सही है कि गुरु की अपनी यात्रा है और शिष्य की अपनी, इसलिये शिष्य को हमेशा अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये ! अपनी सारगर्भित और अनमोल प्रतिक्रिया से पोस्ट को सार्थकता प्रदान करने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ. जो जैसी संगती करे, सो तैसा ही फल पाइ. कबीर साहब कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है. अपने मन की संगति बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जो जैसी संगति करता है, वह वैसा ही फल पाता है. अपने मन को अच्छा बनाया जाये ताकि हमें सद्गति देने वाली अच्छी संगति प्राप्त हो.

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई. सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ. कबीर साहब समझाते हैं कि शरीर पर भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना बिरले ही व्यक्तियों का काम है. य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं. साधना का सार है- अपने असंयमित और कुविचारी मन को संयमित और एकाग्र करना. किसी गुरु का निर्देशन मिले तो ठीक नहीं तो भगवान को ही गुरु मान अपनी साधना जारी रखें.

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

J.L. SINGH (ईमेल पर प्राप्त एक प्रतिक्रिया) आज भारतवर्ष में ऊपर से लेकर नीचे तक सब झूठ, फरेब और भ्रस्टाचार के दल-दल में आकंठ डूबे हुए हैं, तभी तो देश की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से दिन-प्रतिदिन दुर्दशा बढ़ती ही जा रही है. देश तभी सुधरेगा, जब देश का हर व्यक्ति स्वयम को शिक्षा देकर अपने को सुधारेगा. आज जरुरत इस बात की है कि देश का हर व्यक्ति स्वयम का गुरु बने और स्वयम को ही सबसे पहले शिक्षित करे. शुबह शुबह आपका ज्ञान भरा आलेख पढ़ा तो मन तृप्त हो गया. आज ऐसे ही साक्षत स्वयम सिद्ध भगवन सूर्य का प्रथम अर्घ्य का दिन सूर्य षष्टी व्रत है. आज हम साक्षात् देव् शक्ति द्योतक सूर्य भगवन की आरधना करते हैं. उनके साथ, पृथ्वी, जल, आकाश और अग्नि और पवन की या कहें की प्रकृति की पूजा करते हैं. प्रकृति ही हमारी सृष्टी करती है, वही सब कुछ सिखाती है वही जीवन यापन का सारा सामान मुहैया कराती है. हम सब प्रकृति के उपासक बनें. आत्मज्ञान प्राप्त करें. और “परहित सरिस धर्म नहीं भाई” की अवधारणा में बिश्वास रक्खें यही सर्वोत्तम होगा. सभी जाने मने संत अंत में स्वार्थी ही सिद्ध होते हैं. अपवाद स्वरुप भी हैं. जिनकी अवश्य पूजा और सम्मान सर्वदा होता रहता है. सादर! पोस्ट पर फिर से प्रतिक्रिया नहीं जा रही इसलिए आपको मेल कर रहा हूँ.

sadguruji के द्वारा
November 6, 2016

आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी ! सादर हरिस्मरण ! पोस्ट ने आपके मन को तृप्ति प्रदान की, यह जानकर अच्छा लगा ! इस तरह के यथार्थपूर्ण आध्यात्मिक लेखन को भी सार्थकता मिली ! आपने बिलकुल सही कहा है कि “प्रकृति ही हमारी सृष्टी करती है, वही सब कुछ सिखाती है वही जीवन यापन का सारा सामान मुहैया कराती है ! हम सब प्रकृति के उपासक बनें ! आत्मज्ञान प्राप्त करें और “परहित सरिस धर्म नहीं भाई” की अवधारणा में बिश्वास रक्खें यही सर्वोत्तम होगा ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रया देने के लिए हार्दिक आभार और छठ पर्व की आपको और समस्त देशवासियों को बहुत बहुत बधाई !

rameshagarwal के द्वारा
November 7, 2016

जय श्री राम आदरणीय सद्गुरुजी देश में क्या कारन है की सारे आरोप हिन्दू गुरु और संतो पर लगाये जाते मौलवियों.पादरिओ पर नहीं और मीडिया केवल हिन्दुओ पर आक्रामक रहता.इसाई मिशन के पास बहुत पैसा है वे भारत में धर्मान्तर और दुसरी अवैध गतिविधिया करवाते थे.हमारे धर्म गुरु खास कर बापू आसारामजी उनकी गत्विधियो को पत्रिका प्रवचनों द्वारा लोगो को बताते थे जिससे नाराज़ हो कर उन्होंने सोनिया गाँधी से कह कर बापूजी को झूटे केस में फस्वाया मीडिया तो चर्च के पैसे के दम पर उनका ट्रायल करता रहा और जब मीडिया में उचल जाये अदालते भी प्रभीवित होती हमारे धर्मगुरु देश विदेशो में अपने धर्म के लिए कितना अच्छा कार्य करके मानवता की सेवा में लगे है उसके लिए आदर और धन्यवाद् के पात्र है कुछ गलत माचालिया हो सकती लेकिन उसके लिए सबको गलत नहीं हाहा जा सकता लेकिन लालू,मुलायम,माया कांग्रेस ने देश को लूटा उनका क्या हुआ.जैसे आपको चिंता हम भी चितित है लेकिन हम उनके बारे में पढ़ते इसलिए कुछ मालुम है. आपके विचारो के लिए धन्यवाद्.

sadguruji के द्वारा
November 7, 2016

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! जयश्रीराम ! आपकी बात से सहमत हूँ कि हमारे धर्मगुरुओं से भी ज्यादा बड़ी खामियां दूसरे मजहबों के बहुत से धर्मगुरुओं में हैं ! इस आलेख में मैंने हिन्दू धर्म की ही चर्चा कि है ! हमारा आध्यात्मिक दर्शन सनातन और सर्वश्रेष्ठ है, इसलिए अपनी आध्यात्मिक धरोहर की सुरक्षा हेतु हमारी जिम्मेदारी ज्यादा बनती है ! ये लेख उसी दिशा में लक्षित एक प्रयास मात्र है ! आपके विचारों का पूरा आदर करते हुए आपके सहयोग का आभारी हूँ ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !

Shobha के द्वारा
November 13, 2016

श्री आदरणीय सद्गुरु जी मेरी बेटी विदेश से रहने आयी थी मैं घर के कामों मैं इतनी व्यस्त थी कोई भी लेख पढ़ नहीं आयी अब लेख पढ़ रही हूँ सबसे पहले आपका ही ब्लॉग खोला मुझे आज कुकुरमुक्ते की तरह उगने वाले गुरुओं से कभी श्रद्धा नहीं रही आपके इन शब्दों ने मुझे बहुत प्रभावित किया गुरु की करनी गुरु भरेगा, चेले की करनी चेला, उड़ जायेगा हंस अकेला.

sadguruji के द्वारा
November 14, 2016

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! घर में किसी रिश्तेदार के आ जाने से नेट पर जाने में थोड़ी दिक्कत तो होती ही है ! आपका मंच पर स्वागत है ! पोस्ट की सराहना के लिए धन्यवाद !


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