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बाल यौन शोषण करने करने वाले अपराधियों को अधिकतम सजा मिलनी चाहिए

Posted On: 18 Jan, 2017 Social Issues में

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पांच साल से 11 साल तक की छोटी उम्र की मासूम और अबोध बच्चियों के साथ यौन शोषण करने के आरोप में 38 साल के सुनील रस्तोगी को पूर्वी दिल्ली के न्यू अशोक नगर इलाके से पुलिस ने गिरफ्तार किया गया है. पुलिस के मुताबिक आरोपी सुनील रस्तोगी ने कबूल किया है कि उसने अपने जीवन में अबतक 500 से भी ज्यादा बच्चियों का यौन शोषण किया है. गिरफ्तार आरोपी का यहाँ तक कहना है कि उसे याद ही नहीं है कि उसने कितनी बच्चियों के साथ यौन शोषण करने जैसा गलत काम किया है. हालांकि पुलिस का कहना है कि आरोपी के इस दावे की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन पुलिस ने अब तक दिल्ली के पांच से छह ऐसे मामलों का पता लगा लिया है जिनमें सुनील रस्तोगी ने पांच साल से 11 साल तक की उम्र की नाबालिग़ लड़कियों के साथ अनाचार किया है. कितनी हैरत और कानून व्यवस्था के लिए शर्म की बात है कि अनगिनत मासूम बच्चियों का यौन शोषण करनेवाला सुनील रस्तोगी अब तक क़ानून के शिकंजे से बाहर रह जघन्य अपराध करता रहा. या तो वो अधिक चालाक है या फिर हमारी कानून व्यवस्था ही फेल है.

सुनील रस्तोगी के अनुसार वो रुद्रपुर में रहता था और हर हफ्ते अपना शिकार ढूंढने के लिए संपर्क क्रांति ट्रेन पकड़कर उत्तराखंड से दिल्ली आता था. अपराध करने के लिए वो हर बार एक ही लाल स्वेटर पहनता था, जिसे वो लकी समझता था. पुलिस के मुताबिक सुनील ऐसी नाबालिग़ लड़कियों को निशाना बनाता था जो अकेले स्कूल या बाज़ार जाती थीं. वो भोलीभाली मासूम बच्चियों से कहता था कि तुम्हारे पापा उस जगह पर तुम्हें बुला रहे है. वो उन्हें कुछ सामान जैसे स्वेटर, टॉफी, चॉकलेट आदि उनके पापा द्वारा देने की बात भी करता था. अक्सर नाबालिग बच्चियां उसकी मीठी बातों के जाल में फंस जाती थीं और वो उन्हें किसी प्लॉट या सुनसान जगह पर ले जाकर उनसे रेप करता था. अपनी इसी तरह की कोशिश में उसने एक सरकारी स्कूल के बाहर से 10 साल की एक लड़की को अग़वा करने की कोशिश की. समझदार लड़की ने उसका बुरा इरादा भांपते ही शोर मचाना शुरू कर दिया. वो लड़की को छोड़ भाग गया, लेकिन बाद में पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की मदद से उसकी शिनाख़्त की और उसे गिरफ्तार कर लिया. अब उसे सजा देने की जिम्मेदारी पुलिस और अदालत की है.
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यदि वो वाकई सैकड़ों मासूम बच्चियों के साथ यौन शोषण करने का अपराधी साबित हो जाता है तो अनगिनत मासूमों की चीखपुकार, आंसुओं-असहनीय दर्द और उनका भविष्य चौपट करने की एक ही न्यायसंगत सजा है कि ऐसे व्यक्ति को बेझिझक बीच चौहारे पर फांसी पर लटका दिया जाए ताकि हमारे देश के मासूम बच्चे अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें और सुनील रस्तोगी जैसी विकृत सोच वाले अपराधियों को भी करारा सबक सिखाया जा सके. किन्तु अफ़सोस यही है कि फिलहाल पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस) एक्ट के तहत बच्चों के साथ होने वाले अपराध के लिए अधिकतम उम्रकैद तक की सजा ही हो सकती है. दर्जी का कार्य करने वाला सुनील रस्तोगी पांच बच्चों का पिता हैं. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उसकी तीन बेटियां हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उसकी बच्चियों से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि उसने अपनी हवस का शिकार कही उन्हें भी तो नहीं बनाया है? ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोपी के खिलाफ रूद्रपुर, दिल्ली और गाजियाबाद में छेड़छाड़ के अलावा चोरी के भी कई मामले दर्ज हैं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर बसे उसके रुद्रपुर गाँव में भी उस पर नाबालिक बच्ची से छेड़छाड़ करने का एक मामला दर्ज है.
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सुनील रस्तोगी जैसे ‘पीडोफ़ाइल’ अर्थात बच्चों का यौन शोषण करने वाले भारत में बड़ी तादात में हैं, जो देश के होनहार नोनिहालों का ही नहीं, बल्कि देश का भविष्य भी चौपट कर रहे हैं. इनकी धरपकड़ करने और इन्हें सार्वजानिक रूप से कठोरतम सजा देने की सख्त जरुरत है, क्योंकि दुनिया में यौन शोषण के शिकार हुए बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है. बाल यौन शोषण भारत में एक महामारी बन चुका है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार देश के कई होटलों में पीडोफाइल यानि छोटे बच्चों के साथ यौन शोषण करने वाला रैकेट चल रहा है. जिसकी जानकारी पुलिस और प्रशासन को है फिर भी वो चुप बैठे हैं. एक अध्ययन के मुताबिक़ देश के लगभग 53 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी क़िस्म के यौन शोषण के शिकार हैं. इसमें लडकियां और लड़के दोनों समान रूप से शामिल हैं. एक नवीनतम सर्वेक्षण के मुताबिक़ हमारे देश में हर तीन घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण होता है. यौन शोषण करने वाले सुनील रस्तोगी जैसे मनोविकृत शातिर आरोपी ही नहीं हैं, बल्कि बच्चों के अभिभावक, रिश्तेदार, अध्यापक और पडोसी भी उसमे शामिल हैं. भारत के घर-घर में छोटे बच्चों के साथ अभिभावकों द्वारा और स्कूलों में टीचरों द्वारा की जाने वाली मारपीट तो रोज घटने वाली एक आम बात है. न अभिभावकों को सजा मिलती है और न ही टीचरों को.

बच्चों से मारपीट करने के कारण नार्वे में कई भारतीयों से वहां की सरकार ने उनके बच्चे छीन बाल संरक्षण गृह में भेज दिए. किन्तु भारत में मासूमों का दर्द कौन सुनने वाला है और उनके आंसू कौन पोंछने वाला है? रोज न जाने कितने बच्चे घरेलू हिंसा का शिकार होकर घर छोड़कर भाग जाते हैं और उनमे से ज्यादातर बच्चे अपराधयिओं के जाल में फंसने के बाद जीवन में फिर कभी वापस लौटकर अपने घर नहीं आ पाते हैं. अधिकतर अभिभावक पुलिस या समाज के सामने अपने बच्चों को सच बोलने नहीं देते हैं और संवेदनहीन पुलिस बच्चों से जुड़े मुद्दों को तबतक कोई अहमियत नहीं देती है, जबतक कि वो कोई हाईप्रोफाइल या चर्चित मामला न हो. बाल यौन शोषण के मामलों से कड़ाई से निपटने के लिए साल 2012 में भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने वाला एक क़ानून (पॉस्को) बनाया गया, लेकिन आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इसके तहत पहला मामला दो साल बाद दर्ज हुआ. केंद और राज्य सरकारें कुछ तो शर्म करें, और कुछ नहीं कर सकतीं तो कम से कम एक हेल्पलाइन तो मासूम बच्चों की आवाज सुनंने के लिए जारी कर ही सकती हैं.

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 19, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आपने सामयिक और दुखद विषय पर कलम उठायी है लम्बी सजा से भी बड़ी सजा फांसी देनी चाहिए बच्ची का बचपन खत्म कर उसे डर के साए में जीने के लिए विवश कर देना घोर अपराध है | जिनकी बेटियाँ है वह हर समय अपनी बच्ची की सुरक्षा के लिए सशंकित रहते हैं अब तो लडके भी सुरक्षित नहीं हैं

sadguruji के द्वारा
January 19, 2017

आदरणीया डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! आपकी बात से सहमत हूँ कि बच्चों का यौन शोषण करने वालों को फांसी कि सजा देनी चाहिए, बल्कि मैं तो यहाँ तक कहूंगा कि सरेआम बीच चौराहे पर देनी चाहिए ! किन्तु आप भी जानती हैं कि अधिकतम सजा उम्रकैद ही है ! इसके लिए कानून में बदलाव लाना होगा और लाना भी चाहिए ! आपकी बात पूर्णतः सही है कि आज के समय में लड़का हो या लड़की कोई भी सुरक्षित नहीं है ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
January 20, 2017

भारत में बच्चों को यौन हिंसा से बचाने और बाल यौन शोषण के मामले में पूरी कड़ाई से निपटने के लिए साल 2012 में एक क़ानून (पॉस्को) बनाया गया. लेकिन आश्चर्य की बात है कि इसके तहत दो साल तक कोई मामला दर्ज ही नहीं हुआ. साल 2014 में इस क़ानून के तहत 8904 मामले दर्ज किए गए. पॉस्को क़ानून बहुत अच्छा बना है, लेकिन इसपर अमल कम हो रहा है. आरोपियों को सख्त सजा से बचाने के लिए बाल यौन शोषण के अधिकतर मामलों में पॉस्को लगाया ही नहीं जाता है.

sadguruji के द्वारा
January 20, 2017

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2014 में बच्चों के बलात्कार के 13,766 मामले; बच्ची पर उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला करने के 11,335 मामले; यौन शोषण के 4,593 मामले; बच्ची को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला या शक्ति प्रयोग के 711 मामले; घूरने के 88 और पीछा करने के 1,091 मामले दर्ज किए गए. बाल यौन शोषण के बहुत से मामले तो अक्सर दर्ज ही नहीं हो पाते हैं, क्योंकि अक्सर पीड़ितों के अभियुक्त उनके परिचित या रिश्तेदार निकलते हैं, जिन्हें वो सजा से बचाने की कोशिश करते हैं.

sadguruji के द्वारा
January 20, 2017

बाल यौन शोषण का सामाजिक दृष्टि से एक और खतरनाक पहलु यह है कि बचपन में जिन बच्चों का यौन शोषण होता है, बड़े होने पर उनके पीडोफ़ाइल यानि बच्चों का यौन शोषण करने वाला बनने की आशंका बहुत ज़्यादा होती है, क्योंकि उनमें बचपन में हुए अपने यौन शोषण के ख़िलाफ़ लगातार एक गुस्सा बना रहता है और इसलिए वह बड़े होने पर दूसरे बच्चों का शोषण करते हैं. बचपन में हुए यौन शोषण से बच्चों के दिमागी विकास और संतुलन को जो नुक़सान होता है, वह उन्हें अपराध के रास्ते पर भी धकेल सकता है.

sadguruji के द्वारा
January 20, 2017

पीडोफ़ीलिया यानि बाल यौन शोषण के अधिकतर मामले में यही देखने को मिलता है कि हमलावर परिवार में से या बच्चे के नज़दीकी लोगों में से ही कोई एक होता है. गौर करने वाली बात यह है कि बच्चों का यौन शोषण करने वालों में ज्यादातर उनके अभिभावक होते हैं या फिर कोई अन्य रिश्तेदार. बहुत से मामलों में अपराधी पीड़ित बच्चे के पडोसी निकलते हैं. आजकल के खराब माहौल को देखते हुए अपने बच्चों पर सदैव निगाह रखनी चाहिए और अपने किसी भी रिश्तेदार पर आँख मूंदकर विश्वास मत कीजिये.


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