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भेदभाव: महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार आने वाले समय में और मिलेंगे

Posted On: 29 Mar, 2017 Contest में

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समाज के एक बड़े धार्मिक वर्ग द्वारा आज भी स्त्री को अपवित्र, तिरष्कृत और दोयम दर्जे की समझा जाता है। भारत में ऐसी कई जगहे हैं, जहाँ पर ये मान्यता है कि महिलाओं के आने से यह स्थान अपवित्र हो जाएगा। राजस्थान के पुष्कर शहर में स्थित ब्रह्मचारी कार्तिकेय के मंदिर में महिलाऐं नहीं जा सकती हैं। वहां के पुजारियों का कहना है कि यदि महिलाएं मंदिर में जाएँगी तो कार्तिकेय भगवान नाराज हो जायेंगे। केरल के तिरुअनंतपुरम में स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर में भी महिलाओं के प्रवेश पर रोक है। यहाँ के पुजारियों का तर्क तो बेहद हास्यास्पद है। वे मानते हैं कि इस मंदिर के तहखाने में यदि महिलाएं जाएँगी तो खजाने को बुरी नज़र लग जाएगी, क्योंकि गहनों के प्रति उनकी आसक्ति होती है। दक्षिणी दिल्ली में स्थित हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के दरगाह में भी औरतों का प्रवेश निषेध है।

सबसे ज्यादा शर्मिंदगी आपको ये जानकर होगी कि केरल के सबसे प्राचीन और भव्य मंदिरों में शामिल सबरीमाला श्री अयप्पा मन्दिर में 10 से लेकर 50 साल तक की महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकतीं हैं, क्योंकि इस मंदिर की मान्यता के अनुसार महिलाऐं तबतक शुद्ध नहीं मानी जाएँगी, जबतक उन्हें मासिक धर्म होगा। महिलाओं को जिन मंदिरों, मस्जिदों या दरगाहों में प्रवेश की अनुमति नहीं है, यदि आप उसके मूल कारण पर विचार करें तो यही पाएंगे कि उनके विचार से महिलाओं को मासिक धर्म होता है, वो बच्चे पैदा करती हैं, इसलिए पवित्र नहीं हैं। उन्हें भय है कि उनके प्रवेश करने से पवित्र स्थान अपवित्र हो जाएगा। जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मासिक धर्म, शरीर के गर्भावस्था के लिए तैयार होने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है, इसलिए गंदा या अपवित्र रक्त निकलने की बात सत्य नहीं है।

बहुत से पुरुषों की स्त्रियों के बारे में बस यही रूढ़िवादी सोच है कि महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे केवल बच्चे पैदा करने के लिए ही होती हैं। लेकिन महिलाएं इस सोच को झुठलाते हुए हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए न सिर्फ पुरुषों को कठिन चुनौती दे रही हैं, बल्कि लैंगिक भेदभाव के खिलाफ कडा संघर्ष कर रही हैं। पिछले कुछ सालों में कई धार्मिक स्थलों पर महिलाओं ने लैंगिक भेदभाव को ख़त्म करने में ऐतिहासिक और उल्लेखनीय सफलता पाई है। साल 2015 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शिंगणापुर गांव स्थित प्रसिद्ध शनि मंदिर में एक महिला श्रद्धालु द्वारा शनि महाराज को तेल चढाने से बवाल मच गया था। कोर्ट के ह्तक्षेप और आदेश के बाद महिलाओं को शनि प्रतिमा की पूजा करने से रोकने वाली 400 साल पुरानी प्रथा अंतत टूट गई।

इसी तरह से साल 2016 में लंबी कानूनी लड़ाई और विरोध प्रदर्शनों के बाद मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं को पवित्र गर्भगृह में प्रवेश का पुरुषों के समान अधिकार मिला। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार के आधार पर महिलाओं को दरगाह में प्रवेश करने की अनुमति दी थी। समानता, लैंगिक भेदभाव खत्म करने और संवैधानिक अधिकारों को पाने के लिए महिलाएं आज भी कठिन संघर्ष कर रही हैं। इसी राह पर चलते हुए इन दिनों तीन तलाक का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने सड़क से लेकर कोर्ट तक का रुख अख्तियार कर लिया है। जाहिर सी बात है कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार आने वाले वक्त में और मिलेंगे और उनके प्रति होने वाले सारे लैंगिक भेदभाव ख़त्म होंगे। (575 शब्द)

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106.
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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 29, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी जागरण जंगशन नए समाज में होने वाले भेदभाव पर अपने अनुभव बांटने का अवसर दिया आपने समाज में प्रचलित कुरीतियों की तरफ ध्यान खिंचा बहुत अच्छा लगा.

sinsera के द्वारा
March 30, 2017

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, आश्चर्य है की हमारे देश में अभी भी इस प्रकार की रूढ़ियाँ चली आ रही हैं और इनको दूर करने की सोचने भर से देश में आंदोलन उठने लगते हैं.

sadguruji के द्वारा
March 30, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! इस तरह का भेदभाव सदियों से महिलाओं को गुलाम बनाके रखने वाले पुरुष प्रधान समाज की एक गहरी साजिश है ! जब इसके खिलाफ आंदोलन होते हैं तो ये लोग धर्म और धार्मिक ग्रंथों का सहारा लेने लगते हैं ! मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में बहुत सी पुरानी रूढ़ियाँ टूटेंगी और महिलाओं को पुरषों के सामान अधिकार मिलेंगे ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
March 30, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! वाकई यह बेहद सुखद बात है कि मंच ने हमारे समाज में होने वाले भेदभाव पर अपने अनुभव लिखने का सुअवसर प्रदान किया है ! मंच को इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! समाज में प्रचलित कुरीतियों और रूढ़ियों कि आड़ में जो भेदभाव स्त्रियों से हो रहा है, उसपर लिखना मुझे जरुरी लगा ! आपको पोस्ट बहुत अच्छी लगी, इसके लिए धन्यवाद ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
April 9, 2017

बहुत से पुरुषों की स्त्रियों के बारे में बस यही रूढ़िवादी सोच है कि महिलाएं कभी पुरुषों के बराबर नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे केवल बच्चे पैदा करने के लिए ही होती हैं। लेकिन महिलाएं इस सोच को झुठलाते हुए हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए न सिर्फ पुरुषों को कठिन चुनौती दे रही हैं, बल्कि लैंगिक भेदभाव के खिलाफ कडा संघर्ष कर रही हैं।

sadguruji के द्वारा
April 9, 2017

इसी राह पर चलते हुए इन दिनों तीन तलाक का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने सड़क से लेकर कोर्ट तक का रुख अख्तियार कर लिया है। जाहिर सी बात है कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार आने वाले वक्त में और मिलेंगे और उनके प्रति होने वाले सारे लैंगिक भेदभाव ख़त्म होंगे।

sadguruji के द्वारा
April 24, 2017

जब हमलोग आठ दस साल के थे तो पड़ोस की एक दीदी लगभग रोज ही शाम को मिलने के लिए आती थीं ! सब भाई-बहन उनसे दौड़कर लिपट जाते थे, लेकिन महीने में चार पांच रोज उनके नजदीक नहीं जाने दिया जाता था ! समझ में ही नहीं आता था कि कारण क्या है है ? मैं सबके मना करने पर भी उनसे जबरदस्ती जाके लिपट जाता था ! उनकी आँखों में बेबशी भरे आंसू छलक आते थे ! बड़े होने पर समझ में आया कि मासिक धर्म आने के कारण महीने में कुछ रोज हमें उनके नजदीक नहीं जाने दिया जाता था !

sadguruji के द्वारा
April 24, 2017

बचपन में मुझे याद है कि जब लगभग दस साल का था, तब अपने मामा जी के यहाँ रहता था ! मामी को पहला बच्चा हुआ ! वो कूड़े कचरे से भरे एक कमरे में रहती थीं, जिसमे सांप बिच्छू भी थे ! उनके पास जाने की सख्त मनाही थी ! सब कहते थे अभी छुतका यानी सूतक लगा है ! अभी पांच छह रोज इन्तजार करो ! जबतक जज्चा बच्चा नहा नहीं लेंगे, तबतक अंदर जाना मना है ! दूसरे दिन दोपहर के समय जब सभी लोग सो रहे थे, तब मैं धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर चला गया ! कमरा उपले के धुंए से भरा था ! मामी आँखे बंद किये खांस रही थीं ! लालटेन की रौशनी तेजकर मैंने नन्हे मुन्हे नवजात शिशु को बड़ी अचरज से देखा, अवर्चनीय ख़ुशी के साथ उसे हाथों से छुआ और मामी को आवाज दिया ! वो आँखे खोलते ही मुझे सामने देख बहुत परेशान होते हुए बोलीं, ‘बाबू.. तू हउअ.. जल्दी से भाग जा.. नाही त केहू इहाँ तोहके देख लेइ त मारे लागी..’ मैं भागा नही, मामी जाने को कहती रहीं, पर मैं बिना किसी भय के बच्चे के साथ खेलता रहा ! घर के लोग जब कमरे में घुसे तो मुझे वहां देख भड़क उठे ! मुझे अपवित्र हो गया मानते हुए वो लोग जबरदस्ती पकड़कर नहलाने के लिए घर के बाहर स्थित कुँए पर ले गए ! लेकिन मैं वहाँ से भाग चला और नही नहाया ! मेरा मन ये मानने को तैयार नही था कि मैं अपवित्र हो गया हूँ ! मन में ईश्वर के भेजे उसके अंशपुत्र से मिलने की और उसके साथ खेलने की असीम ख़ुशी थी, जिसके आगे सारे सूतक बौने और बेमतलब के हो गए थे !


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