सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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ये कड़वा सत्य है कि भारत में अब भी जाति और रंग के आधार पर भेदभाव जारी है

Posted On: 30 Mar, 2017 Contest में

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अपने बचपन के मित्र महेश को याद करते ही उसका सांवला सलोना चेहरा मुझे याद आ गया. उससे मेरी दोस्ती अपने गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई थी. उन दिनों मेरे पिताजी सेना में थे और उनका ट्रांसफर लेह हो गया था. वहां पर फैमिली रखने की व्यवस्था नहीं होने के कारण हमलोग उनके साथ नहीं जा सकते थे, इसलिए गांव के प्राइमरी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा. जाति और रंगभेद का बेहद मनोविकृत और दिल में कांटे की तरह चुभने वाला नजारा मुझे गांव के स्कूल में देखने को मिला, उस समय मैं और महेश कक्षा पांच में पढ़ रहे थे. वो अकेला, अपने में ही गुमसुम और डरा सहमा सा रहता था. उसका कोई मित्र नहीं था, क्योंकि एक तो वो काले रंग का था और दूसरे दलित जाति का था. वो पढ़ने लिखने में बहुत होशियार था, परन्तु सहपाठी और अध्यापक दोनों ही उससे नफरत और भेदभाव करते थे.

पांचवी पास करने के बाद हमलोग एक अन्य स्कूल में छठी कक्षा में नाम लिखाये. वहांपर भी जातिवाद और रंगभेद का बोलबाला था. अध्यापक भरी कक्षा में महेश को अक्सर उसके नाम से न बुलाकर करियाराम और कालू कहकर बुलाते थे. वो झेंपकर सिर नीचे कर लेता था. मुझे बहुत बुरा लगता था. उन्ही दिनों एक नई फिल्म ‘शोले’ गाँव से दो कोस दूर शहर में लगी हुई थी. स्कूल के कुछ लड़के शहर जाकर ये फिल्म देखकर आये थे. उसका एक डायलॉग था, “अब तेरा क्या होगा कालिया..” आश्चर्य की बात है कि ये घोर आपत्तिजनक और रंगभेदी डायलॉग सरकार, समाज और सेंसर बोर्ड हँसते और मजा लेते हुए पचा गई. जबकि इस रंगभेदी डायलॉग ने करोड़ों भारतियों का उनके रंग के आधार पर मजाक उड़ाया है.

जो सहपाठी ये फिल्म देख के आये थे, वो लड़के यही डायलॉग महेश को देखकर बोलते थे. एक बार हमारे साथ पढ़ने वाले कुछ छात्र स्कूल से कुछ दूर पर स्थित नहर में नहाते हुए महेश को घेरकर उसका मजाक उड़ाते हुए बड़ी देरतक यही डायलॉग मारते रहे. अपमान झेलते-झेलते अंत में बुरी तरह से बौखला उठे महेश का खून खौल उठा. उसने उन चारों लड़कों की जमकर धुनाई कर दी. मैं मुस्कुराते हुए पूरा तमाशा देखता रहा. ये महेश की बहुत बड़ी विजय थी. इस विजय ने उसके अंदर साहस का संचार कर दिया था. वो अब अपना मखौल उड़ाने वालों का उचित प्रतिकार करने लगा था. गाँव के स्कूल में छठी और सातवीं कक्षा पास करने बाद मैं अपने पिताजी के पास जबलपुर चला गया.

महेश गाँव के स्कूल में ही जातिवाद, रंगवाद से संघर्ष करते हुए पढ़ाई अनवरत जारी रखा. बहुत समय के बाद सन 1995 में महेश से मेरी भेंट हुई. वो देरतक मेरे गले लगकर रोता रहा और मैं नम आखों से बचपन के दिन याद करता रहा. उस समय वो एक सरकारी विभाग में आपरेटर के पद पर नियुक्त था, बाद में वो जूनियर इंजीनियर बनकर रिटायर हुआ. उसके साथ एक सुन्दर बीबी और दो प्यारे प्यारे बच्चे थे. बातों ही बातों में वो बताने लगा कि नौकरी में भी उसने अपने रंग और जाति को लेकर बहुत कुछ झेला था. हमारे संविधान ने हमें भले ही एक समान अधिकार दिया हो, परन्तु ये कटु सत्य है कि भारत में अब भी जाति और रंग के आधार पर भेदभाव जारी है. (559 शब्द)

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106.
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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 30, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आपने समाज की कमजोर नब्ज पकड़ी है “अब तेरा क्या होगा कालिया..” आश्चर्य की बात है कि ये घोर आपत्तिजनक और रंगभेदी डायलॉग सरकार, समाज और सेंसर बोर्ड हँसते और मजा लेते हुए पचा गई.” मेने क्या किसी ने डायलोग पर ध्यान नहीं दिया बस हंसे हैं कईयों का नाम ही कालिया पड़ में जागरण जंगशन की तारीफ़ करूगीं उन्होंने हमें समाज की कडवी सच्चाई जाने का मौका मिला

sadguruji के द्वारा
March 31, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट की सराहना के लिए धन्यवाद ! महेश का दर्द मित्र होने के नाते मैंने बहुत करीब से देखा है ! उसके जैसे करोडो लोग इस देश में हैं जो जाति और रंगभेद के शिकार हैं ! आपने समाज की कमजोर नस पकड़ने और दबाने की बात कही है ! वस्तुतः यही करना लेखक का लेखकीय दायित्व है, उसकी जिम्मेदारी है ! भारतीय समाज में चहुंओर व्याप्त भेदभाव जैसे एक आम मुद्दे पर चर्चा कराने के लिए जागरण जंक्शन मंच को सभी लोग धन्यवाद दे रहे हैं ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !

jlsingh के द्वारा
April 2, 2017

आदरणीय सदगुरु जी, समय के अनुसार कुछ परिवर्तन आया है पर जातिगत भेदभाव बरकरार है. आपका ब्लॉग उपयुक्त है भेदभाव होते रहे हैं और यह भी एक कारण है हिन्दू धर्म के कमजोर होने का. सादर!

sadguruji के द्वारा
April 3, 2017

आदरणीय सिंह साहब ! सादर अभिनन्दन ! रंगभेद और जातिभेद दोनों ही समाज मे बरकरार है ! सरकार इस भेदभाव को मिटाने के लिये कोई कारगर कदम नहीं न उठा पाई है और न ही उठा रही है ! जातिभेद पर ही जिनकी राजनीति टिकी है, वो भला क्यों इसे खत्म करेंगे ? हिन्दू धर्म तो कमजोर हो ही रहा है, इसके साथ ही हिन्दुओं मे हो रहे धर्म परिवर्तन का मुख्य कारण भी यही है ! ब्लॉग पर आने के लिये सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
April 8, 2017

उन्ही दिनों एक नई फिल्म ‘शोले’ गाँव से दो कोस दूर शहर में लगी हुई थी. स्कूल के कुछ लड़के शहर जाकर ये फिल्म देखकर आये थे. उसका एक डायलॉग था, “अब तेरा क्या होगा कालिया..” आश्चर्य की बात है कि ये घोर आपत्तिजनक और रंगभेदी डायलॉग सरकार, समाज और सेंसर बोर्ड हँसते और मजा लेते हुए पचा गई. जबकि इस रंगभेदी डायलॉग ने करोड़ों भारतियों का उनके रंग के आधार पर मजाक उड़ाया है.

sadguruji के द्वारा
April 8, 2017

हमारे संविधान ने हमें भले ही एक समान अधिकार दिया हो, परन्तु ये कटु सत्य है कि भारत में अब भी जाति और रंग के आधार पर भेदभाव जारी है.


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