सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

467 Posts

5103 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15204 postid : 1322008

मेरा एक कटु अनुभव: बीएचयू के सर सुंदरलाल हॉस्पिटल में भी भेदभाव होता है

Posted On: 31 Mar, 2017 Contest में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

पूरी तरह से पेशेवर रुख अपनाने वाले निजी हॉस्पिटलों में भेदभाव कम होता है, किन्तु वहां पर भी यदि आपका परिचय है तो डॉक्टर जल्दी देख लेंगे और मरीज के इलाज में होने वाले खर्च में कुछ छूट आपको मिल जायेगी. लेकिन सरकारी हॉस्पिटलों में मरीजों के साथ भेदभाव होना तो रोजमर्रा की एक आम बात है. यदि आपका वहांपर किसी से कुछ परिचय है तो जल्दी, अच्छा और कर्म खर्च में इलाज हो जाएगा, नहीं तो घण्टों लाईन में खड़े रहिये और जांच के लिए यहाँ वहाँ भागदौड़ करते रहिये. मरीज दर्द से तड़फ रहा है, हर पल मृत्यु की और बढ़ रहा है, फर्श पर या स्ट्रेचर पर पड़ा तड़फता-मरता रहे, परिचय नहीं तो कौन पूछने वाला है. वाराणसी में स्थित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) का सर सुंदरलाल अस्पताल पूरे देशभर में प्रसिद्द है. उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के कई जिलों के मरीजों के लिए चिकित्सा का यह सबसे बड़ा केंद्र है.

बीएचयू का सर सुंदरलाल हॉस्पिटल निसन्देह गरीब और असाध्य रोगों से ग्रस्त रोगियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, किन्तु वहां पर भी भारी अव्यवस्था और अनियमितताएं हैं. काशी में किसी से बीएचयू के हॉस्पिटल की चर्चा कीजिये तो वो यही कहेगा कि अस्पताल अच्छा है, वहां के डॉक्टर अच्छे हैं और इलाज भी अच्छा है, लेकिन वहां पर आपका कोई परिचय होना चाहिए, नहीं तो सुबह से शाम हो जायेगी और आप दौड़ते दौड़ते परेशान हो जाएंगे. यदि आपका कोई परिचय नहीं है तो वहां पर किस तरह का भेदभाव होता है, इसका कटु अनुभव खुद मुझे भी है.

साल 2011 के नवम्बर माह में एक दिन अचानक ही मेरे पिताजी के शरीर के आधे हिस्से में लकवा मार गया. हम उन्हें लेकर एक अच्छे प्राइवेट अस्पताल में गए. उन्होंने इलाज शुरू किया, लेकिन आधी रात को जबाब दे दिया और बीएचयू ले जाने को कहा. रात को करीब पौने एक बजे हम उन्हें लेकर बीएचयू के सर सुंदरलाल हॉस्पिटल में पहुंचे. इमरजेंसी वार्ड में कोई जगह नहीं मिली. कई घंटे की भागदौड़ के बाद बड़ी मुश्किल से एक खाली स्ट्रेचर मिला. पिताजी को उसी पर लिटा दिया गया.

पिताजी को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. आक्सीजन लगाने वाले कर्मचारी से कहा तो वो साफ़ बोला कि डॉक्टर के कहने पर ही वो मरीज को आक्सीजन लगायेगा. रात को ढूंढने पर बड़ी मुश्किल से गप्प हांकते दो जूनियर डॉक्टर (छात्र) मिले. एक को बहुत रिक्वेस्ट कर पिताजी के पास लाया. वो पिताजी को देखते ही भुनभुनाने लगा, “चले आते हैं पता नहीं कहाँ कहाँ से.. लाश ले के बीएचयू पहुँचते हैं..”
उसकी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गया. आँखों में आंसू आ गए, पर मैं कुछ बोला नहीं, लेकिन उसकी बातें सुनकर और उसका उपेक्षा करने वाला हावभाव देखकर मेरे चाचाजी का खून खोल उठा. वो जूनियर डॉक्टर पर बरस पड़े, “कायदे से बात करो.. जिन्हें तुम लाश कह रहे वो अभी ज़िंदा हैं. वो सेना में अधिकारी रहे हैं और देश के लिए तीन युद्ध लड़े हैं.. उनके बारे में तुम ऐसा कह रहे हो.. मैं हॉस्पिटल के चिकित्सा अधीक्षक से तुम्हारी शिकायत करूँगा..”

जूनियर डॉक्टर को तब अपनी गलती का कुछ एहसास हुआ. इलाज शुरू हुआ. पिताजी लगभग 24 घण्टे स्ट्रेचर पर ही पड़े रहे. उसी पर उनका इलाज होता रहा और अंत में उसी पर उनका शरीर भी छूट गया. बहुत अनुरोध करने पर भी उन्हें इमरजेंसी वार्ड में कोई बर्थ नहीं मिली. इस कटु अनुभव के बाद अब तो परिवार में किसी का इलाज कराना हो तो प्राइवेट अस्पताल में जाना ही बेहतर समझते हैं. (580 शब्द)

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 1, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी अस्पताल का व्यवहार देख कर आश्चर्य हुआ यह जूनियर डाक्टर यहीं से सीखते हैं तब इनका यह हाल है दिल्ली में भी यही हाल है कुछ डाक्टर प्रैक्टिस करते हैं वह अस्पताल का इस्तेमाल अपने नर्सिंग होम की तरह करते है उनके मरीजों को सब सुविधाएं मिल जाती है और तुरंत आपरेशन जागरण के हम आभारी हैं हमें अपने भीतर क्या कष्ट लेकर जीते हैं कहने का अवसर मिला |मेरे तो ब्राह्मण होने पर प्रश्न उठाये जाते रहे हैंमुझे पूछते तुम कौन सी बामन हो मैं हंस कर कहती हूँ जी सफाई कर्मचारी बामन हैं लगती तो नहीं हो आपके घर में आ गयी हूँ सुथरी हो गयी हूँ नाक भों सिकोड़ते हैं फिर खुद ही कहेंगे न जी मजाक कर्वे को हमीं मिले

sadguruji के द्वारा
April 1, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में यही सब होता है, किन्तु सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं देती है ! डॉक्टरों के अंदर सहानुभूति और संवेदनशीलता ही मर चुकी है ! सबकी रूचि बस पैसा कमाने में है, चाहे वो मरीज से मिले या या फिर दवा की कंपनियों से ! सरकारी अस्पतालों में जूनियर डॉक्टर तो बस अपनी ओपचारिकता भर पूरी करते हैं ! इस मुद्दे पर आपके सहयोग और समर्थन के लिए आभारी हूँ ! जागरण मंच ने चूँकि भेदभाव के मुद्दे पर हम सबके अनुभव मांगे थे, इसलिए हमलोंगों ने लिख दिया ! व्यक्तिगत दुःख में रूचि लेकर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या भी अब कम होती जा रही है, इसलिए बहुत कम लोग ही अपनी लेखनी में अपने दिल का दर्द उजागर करते हैं ! प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
April 4, 2017

उसकी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गया. आँखों में आंसू आ गए, पर मैं कुछ बोला नहीं, लेकिन उसकी बातें सुनकर और उसका उपेक्षा करने वाला हावभाव देखकर मेरे चाचाजी का खून खोल उठा. वो जूनियर डॉक्टर पर बरस पड़े, “कायदे से बात करो.. जिन्हें तुम लाश कह रहे वो अभी ज़िंदा हैं. वो सेना में अधिकारी रहे हैं और देश के लिए तीन युद्ध लड़े हैं.. उनके बारे में तुम ऐसा कह रहे हो.. मैं हॉस्पिटल के चिकित्सा अधीक्षक से तुम्हारी शिकायत करूँगा..”

sadguruji के द्वारा
April 4, 2017

पिताजी को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी. आक्सीजन लगाने वाले कर्मचारी से कहा तो वो साफ़ बोला कि डॉक्टर के कहने पर ही वो मरीज को आक्सीजन लगायेगा. रात को ढूंढने पर बड़ी मुश्किल से गप्प हांकते दो जूनियर डॉक्टर (छात्र) मिले. एक को बहुत रिक्वेस्ट कर पिताजी के पास लाया. वो पिताजी को देखते ही भुनभुनाने लगा, “चले आते हैं पता नहीं कहाँ कहाँ से.. लाश ले के बीएचयू पहुँचते हैं..”

sinsera के द्वारा
April 9, 2017

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार, सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर और नर्सें अक्सर संज्ञाशून्य भावशून्य होते हैं. मरीज़ उनके लिए सिर्फ एक सब्जेक्ट भर होता है. मैं ने मरीज़ों को चांटे लगाने वाली नर्सों को भी देखा है. वैसे लखनऊ के PGI में मैं अपने ससुरजी की बीमारी के दिनों में दो महीने रही थी. वहां मरीज़ों की भारी संख्या के चलते एंट्री मिलना मुश्किल है लेकिन डॉक्टर्स और नर्सेज मरीज़ और उसके तीमारदारों से बहुत अच्छा व्यवहार करते हैं. वहां रह कर अस्पताल के प्रति मेरी धारणा बिलकुल बदल गयी. लेकिन और कहीं ऐसा नहीं देखा. वैसे सभी स्वस्थ रहें किसी को अस्पताल का मुंह न देखना पड़े, यही प्रार्थना करती हूँ.

sadguruji के द्वारा
April 9, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! काशी के BHU के बारे में यही मेरा कटु अनुभव है ! लखनऊ के PGI के बारे में मैंने भी सुना है कि वहां के डॉक्टर और नर्से सनदनशील और सहयोगी है ! दरअसल सेवा माने जाने वाले चिकित्सा क्षेत्र पर अब हॉस्पिटल के मालिकों से लेकर डॉक्टर व नर्सों तक सभी का पेशेवर रुख हावी है ! सरकारी अस्पतालों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है ! डॉक्टर लोग सरकार से मोटी तनख्वाह लेते हैं और सरकारी अस्पताल छोड़कर अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस में व्यस्त रहते हैं ! ऐसे लोगों को नौकरी से बर्खास्त कर उनकी जगह नई भर्ती करनी चाहिए ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !


topic of the week



अन्य ब्लॉग

latest from jagran