sadguruji

सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

532 Posts

5763 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15204 postid : 1322477

बेहाल हुई शिक्षा: रोता-पिटता बचपन, लुटता अभिभावक और सोती हुई सरकारें

Posted On: 2 Apr, 2017 Junction Forum में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

पांच वर्षीय मेरी बिटिया एलकेजी और यूकेजी में पढ़ते हुए पिछले दो साल में कई बार मुझसे शिकायत कर चुकी है कि पापा! स्कूल में मैडम मुझे मारती हैं. कौन मैडम मारती हैं, ये पूछने पर कभी वो मैथ वाली, कभी इंग्लिश वाली और कभी पोयम रटाने वाली मैडम का नाम लेती थी. कभी कभी तो वो स्कूल जाने से ही मना कर देती थी और कहती थी, “मैं इस स्कूल में पढ़ने नहीं जाउंगी. किसी दूसरे स्कूल में मेरा नाम लिखा दो.” हर बार मैंने स्कूल के मालिक को फोन कर शिकायत की. उन्होंने कभी उन टीचरों को डांटने की तो कभी उन्हें स्कूल से बाहर निकालने की बात कही, लेकिन समस्या पूर्णतः कभी हल नहीं हुई. दरअसल स्कूल के मालिक दोहरी नीति अपनाते हैं वो टीचर से बच्चों को दंड दिलवाएंगे और अभिभावकों से टीचर को डांटने की बात करेंगे. अधिकतर निजी स्कूल कम तनख्वाह पर अनट्रेंड टीचर रखते हैं, जिन्हें छोटे बच्चों को पढ़ाना कम मारना ही ज्यादा आता है. कई साल पहले बिहार से एक सज्जन अपने आठ साल के बेटे को लेकर मेरे पास आये थे. वो बताने लगे कि एक बोर्डिंग स्कूल में रखकर इस बच्चे को पढ़ा रहे थे, लेकिन स्कूल वाले इतना मारते थे कि वहां से बच्चे को बाहर निकालना पड़ा. मैंने पूछा कि आपने स्कूल के प्रिंसिपल या प्रबन्धक से शिकायत नहीं की? वो कहने लगे कि ‘क्या शिकायत करते. वो सब पहले ही बता दिए थे कि ‘बच्चे की हड्डी आपकी और चमड़ा हमारा.’

इसका मतलब ही था कि बच्चे की हड्डी नहीं तोड़ेंगे, लेकिन मार-मार के चमड़ा उधेड़ देंगे. मैं ये सब सुनकर अवाक रह गया. कुछ समय पहले सोनभद्र के अनपरा विद्युत परिषद बालिका विद्यालय में होमवर्क पूरा न करने पर छात्राओं की स्कर्ट उतरवाकर उन्हें पूरे स्कूल में घुमाने का मामला सामने आया था. अभी हाल ही में खतौली के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में पढ़ रही छात्राओं के साथ वार्डन सुरेखा तोमर द्वारा अभद्र व्यवहार, शोषण और यहां तक कि उनके कपड़े उतारकर उनकी बेइज्जती करने का मामला सामने आया है. हालाँकि दोनों ही मामले में दोषियों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया गया, लेकिन ये सब इस बात का सबूत है कि हमारे देश के स्कूलों में आज भी बच्चों का शारीरिक व मानसिक शोषण जारी है. स्कूलों में बच्चों की शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना की घटनाएं अक्सर अखबारों में छपती रहती हैं और टीवी न्यूज चैनलों पर दिखाई जाती हैं. सरकारी स्कूलों के मामले में तो त्वरित और कठोर कार्यवाही होती है, लेकिन निजी स्कूलों में होने वाले ऐसे मामलों के खिलाफ कभी भी सख्त कार्यवाही नहीं होती है, क्योंकि नेताओं और अधिकारियों के बच्चे वहीँ पढ़ते हैं. स्कूल के मालिकों से इनके घनिष्ठ सम्बन्ध भी होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2000 में ही स्कूलों में बच्चों को शारीरिक दंड देने पर पूर्णतः पाबन्दी लगा दी थी, किन्तु इसके बावजूद भी बच्चों को बुरी तरह से मारापीटा जाता रहा.

देशभर के नामचीन स्कूलों में टीचरों से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक यातना के कारण जब पीड़ित बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के मामले बहुत ज्यादा बढ़ गए तब मजबूरन केंद्र सरकार को कानून में संशोधन करते हुए बच्चों की हिफाजत के लिए कड़े नियम बनाने पड़े और 15 जनवरी-2016 को पूरे देश में किशोर न्याय अधिनियम-2015 लागू कर दिया गया. किशोर न्याय अधिनियम-2015 की धारा-82 में आजादी के बाद पहली बार बच्चों को दंडित करने पर टीचरों और स्कूल प्रबंधकों को सजा देने का प्रावधान किया गया है. इसके तहत किसी भी सरकारी या निजी स्कूलों में बच्चों को मुर्गा (दोनों कान पकड़ते हुए उकड़ू बैठने को मजबूर करना) बनाने, कान पकड़कर खड़े रखने, थप्पड़ मारने अथवा छड़ी, बेंत या स्केल से पीटने जैसी सजा देने वाले शिक्षकों या प्रिंसिपल को पहली बार दोष सिद्ध होने पर दस हजार रुपए का जुर्माना लगेगा. दूसरी बार गलती दोहराने पर तीन माह की सजा और जुर्माना दोनों से दंडित किया जाएगा. इसके साथ ही जांच में सहयोग नहीं करने पर या दोषी टीचर या प्रिंसिपल को बचाने की कोशिश करने पर स्कूल के प्रबंधक को भी 3 साल तक की सजा हो सकती है और एक लाख रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है. टीचरों द्वारा दी जाने वाली सजा से अपमानित होकर बच्चों के आत्महत्या कर लेने पर सजा और भी सख्त है, जो होनी भी चाहिए.

चाइल्ड लाइन के फोन नंबर-1098 पर, संबंधित पुलिस थाने में, किशोर न्याय बोर्ड में पीड़ित पक्ष शिकायत कर सकता है. केंद्र सरकार को देश के सभी सरकारी व गैर सरकारी स्कूलों को निर्देश देना चाहिए कि किशोर न्याय अधिनियम-2015 की धारा-82 के कानून को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए तथा इसके साथ ही स्कूलों के नोटिस बोर्ड पर धारा-82 के प्रावधान भी लिखे जाने चाहिए. बच्चों और उनके अभिभावकों को इन क़ानूनी अधिकारों का ज्ञान जरूर होना चाहिए. निजी स्कूलों में फीस तथा डोनेशन लेने में मनमानी की तो बात पूछिये ही मत. जिस स्कूल का जितना बड़ा नाम है, उसकी फ़ीस और डोनेशन भी उतनी ही बड़ी है. ऐसे स्कूल न सिर्फ मनमानी फीस और डोनेशन वसूल रहे हैं, बल्कि अभिभावकों पर एक खास दूकान से जूते, पोशाक और किताबे खरीदने का भी दबाव बना रहे हैं. गुजरात सरकार ने ऐसे ही बेलगाम निजी स्कूलों पर नकेल कसते हुए एक ऐसा कानून विधानसभा में पारित किया है जिसके अनुसार प्राथमिक स्कूलों में सालाना 15 हजार, माध्यमिक स्कूलों में 25 हजार तथा उच्चतर माध्यमिक यानी हायर सेकंडरी स्कूलों में 27 हजार से ज्यादा फ़ीस नहीं वसूली जा सकेगी. इस सीमा से अधिक फीस लेने वाले स्कूलों को पहली गलती पर पांच लाख, दूसरी गलती पर दस लाख का दंड देना होगा जबकि तीसरी गलती पर उनकी मान्यता ही रद्द कर दी जाएगी.

क्या इतना अच्छा कानून पूरे देशभर के स्कूलों में नहीं लागू किया जा सकता है? केंद्र सरकार को इस दिशा में पूरा जोर लगाना चाहिए. तीन से पांच साल तक के बच्चों के लिए खोले जाने वाले प्री-स्कूल और प्राईमरी स्कूल दो साल से कम उम्र के रोते-विलखते अपनी मां को तलाशते अबोध और मासूम बच्चों का भी दाखिला ले ले रहे हैं. इस बारे कोई भी स्पष्ट दिशानिर्देश या नियम कानून हमारे देश में लागू ही नहीं है. इसी का फायदा उठाकर निजी स्कूल अपनी मर्जी से ही प्ले ग्रुप (प्री-नर्सरी), नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी और कई स्कूल एचकेजी क्लासेस चलाकर आम जनता को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के नाम पर लूट रहे हैं. ये बच्चों के बचपने और मासूमियत के साथ हो रही बहुत बड़ी खिलवाड़ है और शिशुओं के मां का सानिध्य पाने और खेलने के जन्मसिद्ध अधिकार के साथ हो रही एक बड़ी नाइंसाफी भी है. कई प्री-स्कूल और प्राईमरी स्कूलों में मासूम बच्चों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया जाता है तथा उसे डराया जाता है कि रोवोगे तो बिल्ली के कमरे में, बाथरूम में या स्टोर रूम में बंद कर देंगे. अपने पास के एक आंगनवाड़ी स्कूल में छोटे शिशुओं को छड़ी से पीटते हुए मैंने देखा. केंद्र और राज्य सरकारों को इस पर कुछ एक्शन लेना चाहिए और इस बाबत सभी जरुरी दिशानिर्देश आंगनवाड़ी तथा सभी सरकारी व निजी प्राईमरी स्कूलों को देना चाहिए.

सबसे बड़ी बात ये कि जिस तरह से दुधारू पशुओं को काटने वाले अवैध बूचड़खाने यूपी सहित कई राज्यों में में बंद करवाए जा रहे हैं, ठीक उसी तरह से मासूम शिशुओं और अबोध बच्चों का बचपना और उनके अभिभावकों की जेबें काटने वाले देश के हर शहर गाँव और गली मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह उग आये बिना मान्यता प्राप्त सभी तरह के अवैध स्कूल भी बंद होने चाहिए. आंगनवाड़ी और प्राईमरी स्कूलों में दिए जाने वाले दोपहर के भोजन यानि मिड-डे-मील में हेडमास्टर और ग्रामप्रधानों की मिलीभगत से भारी घोटाला हो रहा है. वहां का भोजन कई इतना घटिया होता है कि अक्सर बच्चे बीमार हो जाते हैं. इस तरह की खबरे आये दिन मीडिया में प्रकाशित होती रहती हैं. साल 1995 में शुरू हुई मिड डे मील योजना को बंदकर इस योजना के नाम पर मासिक आधार पर बच्चों को कच्चा अनाज देना चाहिए,जैसा कि कुछ राज्य कर भी रहे हैं. पूरे देशभर में स्कूली बच्चों का पाठ्यक्रम भी एक होना चाहिए, ताकि बच्चों में अपने स्कूल के प्रति हीनभावना न पनपे और तबादला होने पर सरकारी अथवा गैर सरकारी सेवाओं में सेवारत लोंगों के बच्चों को पढ़ाई में किसी भी तरह की कोई दिक्कत न आये. उम्मीद है कि आने वाले वक्त में केंद्र और राज्य सरकारें जगेंगी, देशभर के स्कूलों में बच्चों को पिटे जाने पर पूर्णतः रोक लगेगी और निजी स्कूलों में फ़ीस और डोनेशन के नाम पर हो रही लूटपाट भी पूरी तरह से थमेगी.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (10 votes, average: 4.90 out of 5)
Loading ... Loading ...

20 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
April 3, 2017

आदरणीय सद्गुरुजी नमस्कार,सरकारी स्कूल सस्ते और प्राइवेट स्कूल महंगे इसलिए हैं ताकि देश में छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और साहब -चपरासी का भेद बरक़रार रहे. सिलेबस तो एक ही होता है लेकिन लोग पैसे जुटा कर बच्चे को महंगे स्कूल में डाल कर खुश हो लेते हैं जबकि कायदे से स्कूल में शिक्षण का स्तर देखना चाहिए. बाकि तो सब व्यापार और अनाचार ही है.

sadguruji के द्वारा
April 3, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने भी व्यंग्य में खूब कही कि देश में छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और साहब -चपरासी का भेद बरक़रार रखने के लिए सरकारी स्कूलों को सस्ता और प्राइवेट स्कूलों को महंगा रखा गया है ! सही बात है कि लोग अपने बच्चे को अंग्रेजी माध्यम के महंगे स्कूल में डाल कर खुश हो लेते हैं ! बच्चे और अभिभावक दोनों ही इन स्कूलों के व्यापारीकरण और अनाचार को झेल रहे हैं ! सोती हुई सरकारों की इस मुद्दे पर उदासीनता और उपेक्षा देखकर तो यही लगता है कि उन्हें इन सब समस्याओं से कोई मतलब ही नहीं है ! प्रतिक्रिया देने के लिए सादर आभार !

Shobha के द्वारा
April 4, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी इतनी नन्हीं बच्ची को मारना कितना दुखद बच्चियां शरारत बहुत कम करती हैं बहुत टेंडर होती हैं हाँ लड़के उधमी होते हैं परन्तु बच्चों को मारना उनका बचपन खराब करना उन्हें पढाई से उचका देता हैं सही है बच्चों की खेलने की उम्र में नर्सरी क्लास.

sadguruji के द्वारा
April 5, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! निजी स्कूलों के मामले में एक बहुत बड़े सुधार की जरुरत है ! वहां पर बच्चों और अभिभावकों दोनों का ही शोषण हो रहा है ! पोस्ट के प्रति आपके सहयोग और समर्थन के लिए सादर आभार !

yamunapathak के द्वारा
April 6, 2017

आदरणीय सद्गुरु जी सादर नमस्कार आपने जो समस्या उठाई है उसी के समाधान के रूप में अब होम स्कूल प्रचलित हो रहे हैं. अभिभावक घर पर ही बच्चों को सिलेबस पढ़ा कर बोर्ड से परीक्षा दिला रहे हैं. हालांकि ऐसे में बच्चों का सामाजिक विकास नहीं हो पाता क्योंकि समाज में किस तरह रहना है यह तो बाकी बच्चों के साथ ही बच्चा टिफिन बाँट कर साथ खेल कर हंस कर रोकर सीखता है . साभार

sadguruji के द्वारा
April 6, 2017

आदरणीया यमुना पाठक जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने सही कहा है कि होम स्कूल एक समाधान है, लेकिन बच्चों का सामाजिक विकास बाधित होता है ! उचित समाधान तो यही है कि सरकार प्राइवेट स्कूलों पर नकेल कैसे और उन्हें स्पष्ट निर्देश दे कि सरकार के बनाये नियम कानूनों का पालन करो या फिर अपनी दूकान बंद करो ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
April 12, 2017

आप विभिन्न विषयों पर कक्षा 1 से 12 तक की “एन सी ई आर टी (NCERT)” की पुस्तकें मुफ्त में भी डाउनलोड कर सकते हैं। प्राइवेट पब्लिशरों की छापी हुई जो महंगी पुस्तकें निजी स्कूल वाले अपने यहाँ चलाते हैं, उसपर 40 प्रतिशत कमीशन खाते हैं। अगर आपने अपने बच्चे के लिए निजी स्कूल से या उसके बताये हुए दुकानदार से 2000 रूपये मूल्य की किताबें खरीदी हैं तो 800 रूपये स्कूल वाले का कमीशन हो गया। इसी तरह से जो कॉपी स्कूल वाले आपको 35 रूपये में आपको देते हैं वो मात्र 25 रूपये में आपको दूकान से मिल जायेगी। ड्रेस में भी निजी स्कूल वाले अभिभावकों को लूट रहे हैं। मजेदार बात देखिये कि केंद्र सरकार टीवी और रेडियो पर प्रचार करती है कि ‘जागो उपभोक्ता जागो’ और खुद निजी स्कूलों की इस लूटपाट के खिलाफ कोई कार्यवाही न कर एक तरह से सो ही रही है। अब उपभोक्ताओं को कहना चाहिए कि ‘जागो सरकार जागो।’

sadguruji के द्वारा
April 12, 2017

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Central Board of Secondary Education या CBSE) भारत की स्कूली शिक्षा का एक प्रमुख बोर्ड है। भारत के अन्दर और बाहर के ज्यादातर निजी विद्यालय इससे सम्बद्ध हैं। पहली कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक के लिये CBSE का तैयार किया हुआ पाठ्यक्रम ही इससे सम्बद्ध देशभर के सभी निजी स्कूल अपने यहाँ चलाते हैं, किन्तु भारत सरकार द्वारा स्थापित संस्थान राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training या NCERT) जो सीबीएसई के पाठ्यक्रम के अनुसार बहुत कम मूल्य पर बहुत अच्छी पुस्तकें छापता है, उन पुस्तकों को निजी स्कूल अपने यहाँ नहीं चलाते हैं, क्योंकि उस पर कमीशन कम मिलता है।

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 12, 2017

आदरणीय सदगुरू जी साप्ताहिक सम्मान के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें । शिक्षा की दुर्दशा पर बहुत अच्छा और विस्तार से लिखा है आपने । तथ्यपूर्ण और मार्मिक भी । समय आ गया है कि सरकार को सख्त कानून बनाने चाहिए । यह बेहद जरूरी है । इधर कुछ कारणों से मंच को समय नही दे पा रहा हूं । क्षमा चाहूंगा । लिखते रहें ।

sadguruji के द्वारा
April 12, 2017

आदरणीय विष्ट जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! निजी स्कूलों में फ़ीस, ड्रेस और किताबों से लेकर हर चीज में लूट जारी है ! बिना किसी मान्यता के देशभर में गाँव, शहर, गली मोहल्लों में धड़ल्ले से स्कूल चल रहे हैं ! अब योगीजी के आने से लग रहा है कि सरकार को इस विषय में सख्त कानून बनाने का उचित समय है ! पोस्ट की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
April 13, 2017

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर हरिस्मरण! सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई ! वैसे आजकल की ज्वलंत समस्या पर आपने व्यापक दृष्टिकोण से आपने कलम चलायी है. आजकल कई चैनलों पर भी चर्चा हो रही है. अभिभावक और छात्र परेशान हैं, और ये शिक्षा के मंदिर अपने भक्तों/ग्राहकों का भरपूर दोहन कर रहे हैं. उम्मीद है सरकार कुछ करेगी या अभिभावक आपस में मिलकर कोई हल ढूंढने का प्रयास करेंगे. मेरे बच्चे अब बड़े हो गए हैं पर मैं भी बच्चों को प्रताड़ित करने के खिलाफ हूँ. मेरे बच्चे को भी जब पीटा गया था मैं भी प्रिंसिपल के पास पहुँच गया था. उन्होंने मुझे समझा बुझाकर शांत किया. मैंने भी उस शिक्षिका को माफ़ कर दिया. वैसे बच्चों को प्यार से ही समझाया सिखाया जाना चाहिए. सादर!

sadguruji के द्वारा
April 13, 2017

एन सी ई आर टी (NCERT) जो पाठ्यपुस्तक 30 से 40 रूपये में छापती है, प्राइवेट पब्लिशर उससे चार से छह गुना ज्यादा दाम पर 120 से लेकर 240 रूपये में छापकर बेचते हैं। स्कूल वालों को मोटा कमीशन मिल रहा है और जेब अभिभावकों की कट रही है। यह समझ से परे है कि सरकार इस ओर क्यों नहीं ध्यान दे रही है? क्या नेताओं ओर अधिकरियों के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, इसलिए सरकार जानबूझकर आँखे मूंदे रहती है? क्या ये सब लूटपाट यूँ ही जारी रहेगी या फिर कभी सरकार जगेगी?

sadguruji के द्वारा
April 13, 2017

‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ सम्मान से सम्मानित करने के लिए आदरणीय जागरण जंक्शन मंच को धन्यवाद. आपके सहयोग से और ब्लॉगर मित्रों व कृपालु पाठकों के समर्थन से इस सामयिक और बेहद महत्वपूर्ण विषय पर एक विस्तृत चर्चा करना चाहता था. साथ देने के लिए ब्लॉगर मित्रों व कृपालु पाठकों को धन्यवाद. निजी स्कूलों में होने वाली लूटपाट और प्रताड़ना से अभिभावक और छात्र दोनों ही परेशान हैं. केंद्र और राज्य सरकारों को इस समस्या का कोई स्थायी समाधान ढूंढना चाहिए. निजी स्कूलों में फीस सरकार द्वारा तय होनी चाहिए और बच्चों को प्रताड़ना से बचाने के लिए सरकारी और निजी स्कूलों के नोटिस बोर्ड पर धारा-82 के प्रावधान भी लिखे जाने चाहिए. बच्चों और उनके अभिभावकों को इन क़ानूनी अधिकारों का ज्ञान जरूर होना चाहिए. किशोर न्याय अधिनियम-2015 की धारा-82 के कानून को स्कूली पाठ्यक्रम में भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए.

sadguruji के द्वारा
April 13, 2017

आदरणीय सिंह साहब ! सादर हरि स्मरण ! शिक्षा जगत में अभिभावकों से हो रही लूटपाट और छात्रों की होने वाली प्रताड़ना एक पुरानी ज्वलंत समस्या है ! इस समय केंद्र और कई राज्यों में भाजपा की सरकार है, इसलिए लोग शिक्षा मंदिरों में होने वाले शोषण के खिलाफ बोल पा रहे हैं और न्यूज चैनलों पर खुलकर चर्चा हो रही है ! दरअसल अधिकांशतः लोग यह मानते हैं कि भाजपा दूसरी भ्रष्ट पार्टियों से कुछ अलग हटकर है, इसलिए उनकी आवाज जरूर सुनी जायेगी ! मुझे भी लग रहा है कि अब इस मसले का कुछ स्थायी समाधान जरूर होगा ! स्कूलों में बच्चों को दी जाने वाली प्रताड़ना गैर-कानूनी होते हुए भी रोजमर्रा की घटित होने वाली एक आम बात है ! सरकार को इस तरफ भी ध्यान देते हुए बच्चों को मारने-पीटने पर पूर्णतः रोक लगा देनी चाहिए ! आपकी इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ कि बच्चों को प्यार से ही समझाया और सिखाया जाना चाहिए ! ब्लॉग पर आने तथा सार्थक व विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sinsera के द्वारा
April 14, 2017

एक समयानुकूल सार्थक लेख प्रस्तुत करने के लिए आभार आदरणीय सद्गुरुजी, बेस्ट ब्लॉगर की उपाधि मुबारक हो .

ashasahay के द्वारा
April 15, 2017

बेस्ट ब्लागर के लिए बधाई।एक सार्थक प्रस्तुति।

sadguruji के द्वारा
April 15, 2017

आदरणीया आशा सहाय जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! बधाई देने के लिए सादर धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
April 15, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट की सराहना करने और बधाई देने के हार्दिक आभार ! ये आप सब ब्लॉगर मित्रों और बुद्धिजीवियों की संगति का ही असर है कि अब कुछ सार्थक और विचारणीय मुद्दों पर लिखना ज्यादा अच्छा लगता है ! साहित्यिक दृष्टि से आप सबों जैसा विशेषज्ञ और पारंगत तो नहीं, बस अपनी तरफ से ठीकठाक लिखने की कोशिश करता हूँ ! ब्लॉग पर समय देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

Alka के द्वारा
April 27, 2017

आदरणीय सदगुरु जी , बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए बधाई| जो बात बच्चे प्यार से आसानी से समझ जाते है वही डांट या मार से देर में समझते है | एक सार्थक प्रस्तुति |

sadguruji के द्वारा
April 27, 2017

आदरणीया अलका जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! मेरी यह दृढ विचारधारा है कि बच्चों को घर हो या स्कूल, प्यार से समझाया जाना चाहिए ! अमेरिका में तो कोई माता-पिता भी यदि किसी बच्चे पर हाथ उठा दें तो जेल हो जाती है ! हम लोग तो अभी भी जंगली युग में ही जी रहे हैं ! बस सभ्य होने का भ्रम और दिखावा भर है ! बधाई देने और ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !


topic of the week



latest from jagran