सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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मोतियाबिंद का ऑपरेशन: माता और आँख से बढ़कर कुछ नहीं है- जंक्शन फोरम

Posted On: 6 Apr, 2017 Junction Forum में

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हँस कर ज़िन्दा रहना पड़ता है
अपना दुःख खुद सहना पड़ता है
रस्ता चाहे कितना लम्बा हो
दरिया को तो बहना पड़ता है
तुम हो एक अकेले तो रुक मत जाओ चल निकलो
रस्ते में कोई साथी तुम्हारा मिल जायेगा
तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो
तुम को अपने आप ही सहारा मिल जायेगा
कश्ती कोई डूबती पहुँचा दो किनारे पे
तुम को अपने आप ही किनारा मिल जायेगा

गीतकार आनंद बख्शी ने अपने एक गीत की इन पंक्तियों में बहुत व्यावहारिक और यथार्थवादी जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया है. पिताजी के गुजरने के बाद से अम्मा की जीवन यात्रा अकेले ही चल रही है. ऐसा नहीं है कि उनके साथ कोई नहीं है, उनका बेटा, बहू, पोती सभी उनके साथ हैं, दिन-रात उनकी सेवा में लगे रहते हैं, किन्तु फिर भी वो अपने को तन्हा महसूस करती हैं. बुढापे में कुछ कम सुनने लगीं हैं, इसलिए अक्सर अपनी बहू की कही हुई बातों का गलत अर्थ समझ लेती हैं. बहू के प्रति उनके मन में वर्षों पुराने अपने ही पाले हुए कई सच्चे-झूठे पूर्वाग्रह भी हैं, जैसे कि बहू बहुत गुस्सैल और घमंडी है, गरीब घर आई है, ठीक से बात तक नहीं करती है, खाने में नमक-मिर्च कम ज्यादा होने पर कुछ कह दो तो झल्ला पड़ती है, अच्छा लगे या बुरा साफ़-साफ़ बोल देती है, ‘खाना हो तो खाओ नहीं तो मत खाओ’, अपनी बेटियों को ज्यादा अहमियत देने को लेकर ताने मारती है और पेट ख़राब होने पर यदि पेटीकोट व शौचालय गन्दा हो गया तो चिल्ला चिल्लाकर दस बातें सुनाती है, आदि,, अक्सर इन्ही बातों को लेकर सास-बहू में बहस होती है और फिर अंत में अम्मा अपनी हार मानते हुए रोने लगती हैं और फिर खाना और दवा दोनों का सेवन करना छोड़कर रूठ जाती हैं. तब उन्हें मनाने की जिम्मेदारी मुझपर और मेरी बेटी पर होती है. मेरे सामने विकट समस्या पैदा हो जाती है कि किसका पक्ष लिया जाए? इकलौता पुत्र होने के कारण मां का स्नेह बचपन से ही इतना ज्यादा रहा है कि उनकी आँखों में आंसू आ गए तो अपने जीवन को धिक्कारने लगता हूँ. अम्मा की आँखों में आये आंसू दिल को बहुत गहरे तक हिला के रख देते हैं, मानों उनकी आँखों से खून के आंसू बह रहे हों.

दूसरी तरफ पत्नी का प्रेम और अनवरत जारी सेवा जो चौबीस घंटे दिखाई देती है, उस सच से भी आँखे नहीं चुरा पाता हूँ. बोलने में वो थोड़ी सख्त जरूर हैं, किन्तु दिल-दिमाग से बहुत साफ़ है. बीए तक पढ़ीलिखी भी हैं. मुंह से चाहे जो कहें, लेकिन मां की सेवा आखिर करती तो वही हैं. सास-बहू में बहस होने की आवाजें मेरे कमरे तक आती हैं, लेकिन स्नेह और प्रेम में फंसा मेरा मन ये निर्णय ही नहीं ले पाता है कि वो किसका पक्ष ले. जीवन की पूर्णता के लिए मां का स्नेह पाना जितना जरुरी है, पत्नी का प्रेम पाना भी उतना ही जरुरी है. सबसे बड़ी बात ये कि उनकी बहस का अमूनन तो सिर-पैर ही नुझे पता नहीं होता है, फिर भला किसका पक्ष लूँ? दोनों ही अपने को सही बताती हैं. कुछ रोज की शांति के बाद सास-बहू में आज फिर बहस शुरू हो गई. बिटिया तुरंत मेरे पास खबर ले के आ गई, “पापा चलो.. मम्मी और दादी में लराई हो रही है..” वो लड़ाई शब्द नहीं बोल पाती है, इसलिए लराई बोलती है. अंदर से आ रहीं तेज आवाजें सुनने के वावजूद मैंने उससे ठिठोली की, “तुम मजाक तो नहीं कर रही हो?” वो गंभीर होकर बोली, “मैं मज्जाक नहीं कर रही हूँ.. चलो चल के खुद ही देख लो..” मैंने कुर्सी से उठते हुए पूछा, “तुमने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की?” बिटिया मेरा हाथ पकड़ बोली, “मैंने कहा तो लराई मत करो.. पर मम्मी बोली कि तू भाग यहाँ से, नहीं तो दो हाथ दूंगी अभी..” मामला गंभीर देख मैं लोंगो के बीच से उठ घर के भीतर गया तो पता लगा कि सास-बहू में चर्चा शुरू तो हुई थी अपने-अपने यहाँ के रीतिरिवाजों का बखान करने से, लेकिन उसमे धीरे-धीरे करके दोनों तरफ के खानदान के लोग भी शामिल होते गए और उनकी तमाम अच्छाईयां और बुराईयां बहस का केंद्रबिंदु बनती चलीं गईं. ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ वाली संतई तर्ज पर मैंने दोनों ही खानदानों की बड़ाई कर मामला शांत कराया.

सास-बहू में ऐसी ही बहस हफ्तेभर पहले उस समय भी हो गई जब माताजी की आँख बनवानी थीं यानि मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना था. माताजी को लेकर कुछ डॉक्टरों के पास वो गईं थीं और कुछ डॉक्टरों के पास मैं. श्रीमतीजी चाहती थीं कि माताजी के आँख का आपरेशन जल्द से जल्द हो जाए, जबकि मैं इस कार्य के लिए एक अच्छा डॉक्टर ढूंढ रहा था. एक डॉक्टर के पास जाने पर बड़ा अच्छा समझ में आया, लेकिन अगले दिन आश्रम में एक शिष्य ने उस डॉक्टर के बारे में बताया तो कलेजा दहल गया. कुछ साल पहले वो अपने पिताजी को लेकर मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने उस डॉक्टर के पास गए थे. ऑपरेशन वाले दिन ऑपरेशन थियेटर से जब उनके पिताजी के चीखने की भयंकर आवाजें आईं तो वो दरवाजा खोल अंदर घुस गए. उनके पिताजी अपनी आँख पर हाथ रख चिखचिल्ला रहे थे. पता चला कि बिना आँख सुन्न किये ही डॉक्टर साहब ऑपरेशन शुरू कर दिए थे. अपनी गलती की बजाय वो दवा कंपनी को दोष दे रहे थे. काफी बवाल होने के बाद वो फिर से इंजेक्शन लगा ऑपरेशन किये. एक अन्य डॉक्टर साहब से ऑपरेशन करवाने का मन बनाया तो एक व्यक्ति अपना ऐसा कटु अनुभव सुनाए कि रूह काँप जाए. वो बताये कि एक शिविर में अपनी भाभी को लेकर मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाने उस मशहूर नेत्र सर्जन के पास गए थे. निशुल्क शिविर में उन्होंने पांच सौ रूपये की मांग की. रूपये देने की बजाय उस सज्जन ने शिविर के आयोजक से शिकायत कर दी. इससे नाराज होकर उस संवेदनहीन नेत्र सर्जन ने ऑपरेशन के बाद उनकी भाभी की आँख दबादबाकर खराब कर दी.

लोंगों के कटु अनुभव सुनकर सच पूछिये तो डॉक्टरों से भय लगा. माताजी को लेकर कई नेत्र सर्जन के पास गया. अंत में एक नेत्र सर्जन ठीक समझ में आये. माताजी की वृद्धावस्था को देखते हुए उन्होंने फेको-सर्जरी कराने की सलाह दी, जिसमे कोई चीरफाड़ नहीं होती है. मैंने उनसे सहमति जताते हुए कहा कि माता और आँख से बढ़कर कुछ नहीं है, आप जो उचित समझें वहीँ करें. डॉक्टर साहब ने मोतियाबिंद हटाने बाद आँख के अंदर फिट किये जाने वाले लेंस इंट्राओक्युलर लेंस (IOL) को लेकर भी कई बातें बताईं, जैसे इनके रेट और यह स्पष्टता की ऑपरेशन के बाद ही पता चलेगा की चश्मे की जरुरत है कि नहीं? इन लेंसों का मनमाना रेट डॉक्टर वसूल रहे हैं. वो ऑपरेशन से पहले ही कहने लगते हैं कि 38000 से ऊपर वाला लेंस लगवा लीजिये तो चश्मा नहीं लगाना पडेगा. इसपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, जबकि होना चाहिए. आइये अब सास-बहू के झगडे वाली बात पर आते हैं. जिसदिन ऑपरेशन होना था, उसदिन दोनों में किचाइन हो ही गई. मां गुस्से के मारे ऑपरेशन कराने से मना कर दीं. किसी तरह से समझाबुझाकर उन्हें ले गया और ऑपरेशन कराया. मां को सुबह-शाम दवा खिलाना और हर एक घंटे पर उनकी आँख में दवा डालना मेरी जिम्मेदारी है. पत्नी नवरात्रि में रोज व्रत रखते हुए भी ऐसी नाराज थीं कि पूछिये मत. रात को बहुत थके होने पर जब अपने पैर खुद दबाता हूँ तो मेरी बेटी दौड़ती हुई मेरे पास चली आती है और कहती है, “पाप! मैं पैर दबा दूँ?” उससे कहता हूँ, “नहीं बिटिया.. पाप लगेगा..” वो हँसते हुए मेरे पास बैठ अपने दोनों पैर मेरे सामने कर कहती है, “तो ठीक है.. आप अपने पैर मत दबवाओ, लेकिन मेरे पैर तो दबा दो.. मुझे पाप नहीं लगेगा.. ” मैं मुस्कुराते हुए उसकी सेवा में जुट जाता हूँ. अंत में गीतकार आनंद बख्शी के उस गीत के कुछ और बोल, जिसमे यथार्थ और सुखी जीवन दर्शन का मूलमन्त्र छिपा है.

न बस्ती में न वीरानों में
न खेतों में न खलिहानों में
न मिलता है प्यार बज़ारों में
न बिकता है चैन दुकानों में
ढूंढ रहे हो तुम जिस को
उस को बाहर मत ढूँढो
मन के अन्दर ढूँढो प्रीतम प्यारा मिल जायेगा
तुम बेसहारा हो तो किसी का सहारा बनो
तुम को अपने आप ही सहारा मिल जायेगा
कश्ती कोई डूबती पहुँचा दो किनारे पे
तुम को अपने आप ही किनारा मिल जायेगा

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आलेख और प्रस्तुति= सद्गुरु श्री राजेंद्र ऋषि जी, प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम, ग्राम- घमहापुर, पोस्ट- कन्द्वा, जिला- वाराणसी. पिन- 221106.
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8 प्रतिक्रिया

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Bhola nath Pal के द्वारा
April 7, 2017

आदरणीय सद गुरु जी ! यथा नाम तथा गुणः .सच्चे कर्म योगी को प्रणाम ……सादर

sadguruji के द्वारा
April 8, 2017

आदरणीय भोला नाथ पाल जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट को पसंद करने के लिए धन्यवाद ! मेरे विचार से हमारे जीवन में घटित होने वाले रोजमर्रा के कड़वे-मीठे सत्य भी कभीकभार ब्लॉग पर आना चाहिए ! ब्लॉग पर आने के लिए बहुत धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
April 10, 2017

ईमेल पर प्राप्त आदरणीया सरिता सिन्हा जी का कमेंट- आपकी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं हो पा रहा है कृपया इसको मेरी तरफ से पोस्ट करने का कष्ट करें. धन्यवाद….. सद्गुरुजी प्रणाम, ये घर घर की कहानी है. लज्जाशील और संकोचशील बहुएं भी एक उम्र ससुराल में गुज़ार लेने के बाद अक्सर मुखर हो जाती हैं और सासें उनको इंसान नहीं बल्कि आदर्शवाद की एक रोबोटिक मशीन की तरह देखना चाहती हैं. जब सास ने बहू को बेटी तो बहुत दूर की बात है, कभी इंसान भी नहीं समझा, फिर वो कभी नहीं समझेगी, उनको समझाना बेकार है. साथ ही बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जो अपने साथ होने पर ही समझ में आती हैं जैसे परिवार में सबसे सीनियर होने की मदांधता…हो सकता है हम भी जब सीनियर मोस्ट हो जाएँ तो सत्ता के नशे में अंधे हो जाएँ. क्यूंकि अभी हममें जो रीज़निंग है, कह नहीं सकते कि बुढ़ापे में बचे गी या अल्ज़ाइमर या डेमेंशिया या कमअक्ली (सठियाने ) की भेंट चढ़ जाएगी. ऐसे में जिसका मस्तिष्क अभी सही सलामत है उसे बहस करने के बजाय चुप हो जाना चाहिए. समझना चाहिए कि अगला एक मानसिक मरीज़ है और हमें उस की देख-भाल करने जैसा महान काम करना है…ये मेरा आज़माया हुआ नुस्खा है, आप भाभीजी को मेरा ये सन्देश पहुंचा दें. एक बार बहस के बजाय चुप हो कर देखें. असीम शांति मिलेगी, ये मेरा दावा है…समझदार बिटिया को मेरा स्नेह. हाँ, अगर ये बहसें ऐसे ही चलती रहीं तो बच्ची इनका असर अपने जीवन में ले लेगी, इसका भी तो ध्यान रखना है.

sadguruji के द्वारा
April 10, 2017

आदरणीया सरिता सिन्हा जी ! सादर अभिनन्दन ! आपका इस ब्लॉग से संबंधित अच्छे सुझाव से युक्त एक अत्यंत विचारणीय कमेंट ईमेल पर मिला ! इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद ! वर्षों से एक साथ रहते हुए मैंने भी अपनी माताजी और श्रीमतीजी के स्वभाव पर काफी रिसर्च किया है ! पहली बात तो ये कि कानपुर से आगे, जहाँ मेरी ससुराल है, वहां कि बोली भाषा ही थोड़ी खर टाइप की या लट्ठमार कहिये, उस तरह की है ! दूसरी बात ये कि उनमे बहस अमूमन किसी त्यौहार, व्रत वाले दिन और नवरात्र में ज्यादा होती है ! कई बार मैं मजाक में कह भी देता हूँ कि जिसे भूख लगी वो खाना खा लें, पर एक दूसरे पर अपनी खीझ या गुस्सा न उतारें ! आदरणीया सरिता सिन्हा जी, हमारे घर में एक बात बहुत अच्छी बात है कि सब बहस मुंह से हो जाती है, दिल में ज्यादा देर तक कोई नहीं रखता है ! थोड़ी देर बाद एक दूसरे से बोलने भी लगेंगे ! माताजी हमारी बहुत धार्मिक और पुराने विचारों की हैं ! सोचती हैं कि हर बात उनसे पूछ के करो ! उन्हें खुश रखने के लिए मैं उनकी सलाह लें लेता हूँ ! किन्तु श्रीमतीजी इसकी जरुरत नहीं समझती हैं ! हाँ, मुझसे वो सलाह जरूर लेती हैं ! स्वभाव में उनके जिद और जरुरत से ज्यादा स्वाभिमान जन्मजात है ! मुझे उससे कोई दिक्कत भी नहीं है ! शादी हुए अठारह साल हो गए, अब इन सब चीजों की आदत पड़ चुकी है ! बिटिया अभी छठे साल में है, लेकिन बहुत तेजतर्रार और समझदार है, खासकर अपने अधिकारों के प्रति ! मैं उसे इसी बात के लिए सदैव प्रेरित भी करता हूँ, क्योंकि आज के युग में सुख-शान्ति से जीने के लिए इस तरह का विकास बहुत जरुरी है ! आपकी बात सही है कि घर में होने वाले झगड़ों का बच्चों पर खराब असर पड़ता है ! मैं घर में सबको यही बात अक्सर समझाता भी हूँ ! फिलहाल तो शान्ति है ! ईश्वर करें, यूँ ही बनी रहे ! अनुभव से परिपूर्ण एक बहुत अच्छी प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
April 15, 2017

इकलौता पुत्र होने के कारण मां का स्नेह बचपन से ही इतना ज्यादा रहा है कि उनकी आँखों में आंसू आ गए तो अपने जीवन को धिक्कारने लगता हूँ. अम्मा की आँखों में आये आंसू दिल को बहुत गहरे तक हिला के रख देते हैं, मानों उनकी आँखों से खून के आंसू बह रहे हों.

sadguruji के द्वारा
April 15, 2017

लोंगों के कटु अनुभव सुनकर सच पूछिये तो डॉक्टरों से भय लगा. माताजी को लेकर कई नेत्र सर्जन के पास गया. अंत में एक नेत्र सर्जन ठीक समझ में आये. माताजी की वृद्धावस्था को देखते हुए उन्होंने फेको-सर्जरी कराने की सलाह दी, जिसमे कोई चीरफाड़ नहीं होती है. मैंने उनसे सहमति जताते हुए कहा कि माता और आँख से बढ़कर कुछ नहीं है, आप जो उचित समझें वहीँ करें.

sadguruji के द्वारा
April 24, 2017

मोतियाबिंद हटाने बाद आँख के अंदर फिट किये जाने वाले लेंस इंट्राओक्युलर लेंस (IOL) को लेकर डॉक्टर अपने फायदे के लिए या कहिये मोटी कमाई करने के लिए भ्रम उत्पन्न करते हैं ! देशी-विदेशी लेंस के रेट चार छह हजार से लेकर डेढ़ लाख तक बताते हैं, जबकि लेंस बेचने वालों से बात कीजिये तो वो देशी लेंसों के वास्तविक रेट 1250 से लेकर 6000 रूपये तक बताते हैं ! सरकार को इस बारे वस्तुस्थिति न सिर्फ स्पष्ट करनी चाहिए, बल्कि इसे लेकर हो रही लूटपाट भी रोकनी चाहिए !

sadguruji के द्वारा
April 24, 2017

नेत्र सर्जन देशी लेंस को विदेशी बताकर भी मरीजों को लूट रहे हैं ! अभी कुछ दिनों पहले ही अखबार में एक खबर छपी थी कि एक डॉक्टर ने गुजरात के बने हुए देशी लेंस को विदेशी बताकर मरीज से अठाइस हजार रूपये ले लिए ! मरीज के परिजनों को जब असलियत पता चली तो वो उपभोक्ता फोरम में जाकर केस दर्ज कर दिए ! केंद्र और राज्य सरकार को इस तरह की लूटपाट से आम जनता को बचाने के लिए न सिर्फ कठोर कानून बनाना चाहिए, बल्कि अखबारों में मोतियाबिंद के मरीजों के लिए पूर्ण जानकारी से भरा मार्गदर्शन भी समय समय पर जारी करना चाहिए !


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