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संत कबीर साहब: ग्रहों के दुष्प्रभाव से इंसान कैसे मुक्त हो सकता है? -आध्यात्मिक चर्चा

Posted On: 23 Jun, 2017 Social Issues में

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सन्तो जागत नीद न कीजै।
काल नहीं खाये, कल्प नहीं व्यापै, देह जरा नहि छीजै।

संत कबीर साहब कहते हैं कि इंसान मोह निशा से जाग जाए तो फिर उसे सोना नहीं चाहिए अर्थात माया मोह के चक्कर में फिर दुबारा नहीं पढ़ना चाहिए. इस संसार में अधिकतर लोग मोह निशा में ही सो रहे हैं. मानस में कहा गया है, ‘मोह निसाँ सबु सोवनिहारा, देखिअ सपन अनेक प्रकारा।’ जो सौभाग्यशाली लोग जागे हुए लोगों यानी संतों की संगति प्राप्त कर रहे हैं, उन्हें वो संगति भूल से भी कभी नहीं छोड़नी चाहिए, यदि वो ऐसी गलती करते हैं तो यह जागकर फिर सांसारिक मायाजाल में सो जाने के जैसा होगा. इससे आत्मा का मंगल नहीं, बल्कि चौरासी लाख योनियों में भटककर अमंगल ही होगा.

विज्ञान मानता है कि सृष्टि में वस्तुतः अंतरिक्ष (स्पेस), पदार्थ (मैटर) और समय (टाइम) यही तीनों हैं. संतों ने एक चौथी अवस्था भी मानी है, जिसे वो समय के घेरे से परे जाना और ‘जीते जी मरना’ आदि कहते हैं. कबीर साहब कहते हैं कि समय से परे जाने वाली एक ऐसी स्थिति भी है, जिसे मोक्ष कहते हैं और जीते जी प्राप्त उस अनुभव को समाधि, मोक्षानुभूति और अकाल पुरष की संगति आदि कहते हैं. संतों की संगति व्यक्ति को उस अकाल पुरुष के समीप अर्थात समय से परे ले जाती है, जहाँ पर देह धारण कर बचपन, जवानी और बुढ़ापे का कष्ट नहीं उठाना पड़ता है अर्थात वहां पर जीवन-मृत्यु रूपी घोर कष्ट नहीं है,

उलटि गंगा समुद्रहि सोखै, शशि और सूर गरासै।
नवग्रह मारि रोगिया बैठे जल में बिब प्रकाशै।

कबीर साहब कहते हैं कि सारा संसार अपने को सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु आदि नवग्रहों से पीड़ित समझता है, जबकि वास्तव में ये सब मतिभ्रम मात्र है. गृह-नक्षत्र किसी को भी वैसा सुख-दुःख नहीं देते हैं, जैसा कि ज्योतिष को व्यवसाय बनाने वाले लोग वर्णित और प्रचारित करते हैं. अपनी मनुष्य देह के भीतर साधना करके यदि कोई व्यक्ति आत्मदर्शन प्राप्त कर ले तो वो सभी ग्रहों के दुष्प्रभाव से मुक्त हो जाएगा. मानस में कहा गया है, ‘नाम लेत भव सिंधु सुखाई, करहुँ विचार सुजन मन माहीं।’ संत इसे उलटी गंगा या उलटा ज्ञान भी कहते हैं, क्योंकि ये सांसारिक ज्ञान के ठीक उल्ट है अर्थात आत्मा द्वारा अनुभूत दिव्य ज्ञान है. कबीर साहब भी वही बात कहते हैं कि इच्छाओं का समुद्र मन में दिव्य ज्ञान का उदय होने पर ही सूखेगा, चंद्र व सूर्य स्वर खुलकर तभी स्थिर होंगे और आत्मानुभूति-ईश्वरानुभूति कराने वाली स्वर साधना भी तभी सफल होगी.

बिनु चरणन कै दुहु दिस धावै, बिनु लोचन जग सूझै।
ससा उलटि सिंह को ग्रासै, अचरज कोऊ बूझै।

कबीर साहब कहते हैं कि आत्मा-परमात्मा की संगति अर्थात समाधि एक ऐसी अवस्था है, जहाँ पर आत्मा बिना पैरों के दसों दिशाओं में भ्रमण कर सकती है और बिना आँख के संसार के भेद को अर्थात सृष्टि, स्थिति और संहार के रहस्य को जान सकती है. सारे संत यही समझाते हैं कि आत्मा की शक्तियां कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर मनुष्य के शरीर के भीतर हैं. ये सुप्तावस्था में हैं. जो इन्हे जागृत कर ले, वो शरीर से कृश होते हुए भी बहुत से असंभव कार्यों को संभव कर सकता है. कबीर साहब कहते हैं कि ये ठीक वैसा ही है जैसे कोई खरगोश दिव्य शक्ति को पाकर किसी सिंह से लड़ने-भिड़ने को तैयार हो जाए. यह आश्चर्य नहीं, बल्कि अनुभवगम्य विषय है, जिसे जागने वाला और जागे हुए लोंगो की अर्थात संत संगति करने वाला व्यक्ति ही समझ सकता है.



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

Indresh Uniyal आदरणीय सदगुरु जी संत कबीर दास अन्य संतों और कवियों से अलग हटकर एक सुधारवादी आन्दोलन के जनक थे. उनकी रचनाएं कालजयी हैं.

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि संत सदगुरु कबीर साहब सुधारवादी आन्दोलन के जनक थे ! उनकी कालजयी रचनाओं मे भी इसका विस्तृत जिक्र है ! ब्लॉग पर समय देने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

Rajeev Gupta आदरणीय राजेन्द्र ऋषि जी, संत कबीर की रचनाये आज के संदर्भ मे और भी अधिक प्रासंगिक हो गयी हैं. आपने उनकी रचनाओं और उनके उपदेशों को एक बार फिर से पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है, उसके लिये आपको बधाई.

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

आदरणीय राजीव गुप्ता जी ! सादर अभिनन्दन ! आपसे सहमत हूँ कि आज के हिंसक और अशान्ति वाले दौर मे कबीर साहब की रचनाएँ अधिक प्रासंगिक हो गई हैं ! इंसान की महत्वकांक्षाएँ बढ़ने से घरेलू कलह भी परिवारों मे बढ रही है ! ऐसे मे मानसिक सुख-शान्ति के लिये आत्मानुभूति जरूरी है ! पोस्ट के प्रति आपके सकारात्मक सहयोग और समर्थन के लिये हृदय से आभारी हूँ ! सादर धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, संत कबीर दास जी की कालजयी रचनाओं में से कुछ चुनिंदा अंशों की प्रस्तुति मनमोहक लगी. भाई, यह तो सत्संग ही हो गया. मज़ा आ गया. अत्यंत सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका हार्दिक आभार.

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! आपने सही कहा कि कबीर साहब की रचनाएँ कालजयी हैं ! समय-समय पर उसपर चर्चा होनी चाहिये ! ऐसा ही एक प्रयास किया गया है ! पोस्ट की सराहना के लिये धन्यवाद ! आप जैसे सत्सनगियों की संगति सौभाग्य की बात है ! हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

Harish Chandra Sharma आदरणीय सदगुरु जी बहुत उचित प्रसंग …कबीर साहेब से सही प्रसन् किया ….ग्रहों का प्रभाव होता है यह तो ज्योतिषी भी सिद्ध कर देते हैं और विज्ञान भी …सबसे सीधा उधारण गुरुत्वाकर्षन है ,जिससे समस्त प्रक्रति बंधी है ….किन्तु उसके दुष्प्रभाव से कैसे बच सकते हैं यही एक ठग विद्या बन जाती है | ….ओम शान्ती शान्ती

sadguruji के द्वारा
June 26, 2017

आदरणीय हरीश चंद्र शर्मा जी ! सादर अभिनन्दन ! आपकी बात सहमत हूँ कि ग्रहों का अपना एक सकारात्म्क और नकारात्मक चुम्बकीय प्रभाव है, लेकिन इसका मनुष्य पर अच्छा-बुरा क्या असर पड़ता है, इसी सही-गलत तथ्य को लेकर ज्योतिष के नाम पर सारी दुनिया मे ठगी हो रही है ! पोस्ट की सराहना के लिये हार्दिक आभार

Shobha के द्वारा
June 28, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी जिस तरह संत कबीर का जबाब नहीं इसी प्रकार आपका भी आप अक्सर राजनीति से हट कर सुंदर लेख लिखते हैं जिनसे मन और आत्मा दोनों प्रसन्न होती हैं

sadguruji के द्वारा
July 1, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! संतों की अमृत वाणियों की चर्चा करने में बहुत सुकून मिलता है और आपसे सच कहूं तो मेरा नैसर्गिक कार्य उन वाणियों का प्रचार-प्रसार करना ही है ! आपने सही कहा कि सत्संग से मन और आत्मा दोनों तृप्त होते हैं ! पहले ब्लॉग मंचों का माहौल बहुत अच्छा था और समय पर ब्लॉग अपडेट होते थे ! अब तो ब्लॉग कब अपडेट होगा, कुछ पता नहीं ! धार्मिक विषय पर लिखे गए ब्लॉग अब पहले की तरह मंचों की शोभा भी नहीं बनते हैं ! आपने ब्लॉग की ओर ध्यान दिया ओर उसे पसंद किया, इसके लिए हार्दिक आभार !


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