सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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..तब तक भारत के दलितों की दरिद्रता दूर नहीं हो सकती

Posted On: 21 Jul, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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राजनीतिक क्षेत्र में इस सप्ताह दो महत्पूर्ण घटनाएं हुईं। पहली घटना मंगलवार 18 जुलाई को घटी, जब बसपा की अध्यक्ष मायावती ने सहारनपुर हिंसा पर बहस के लिए समय दिए जाने की मांग के नाम पर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। उनका इस्‍तीफा मंजूर हो चुका है, लेकिन इस्‍तीफा अपने साथ कई सवाल भी छोड़ गया है। पहला सवाल तो यह है कि उन्होंने इस्तीफा क्यों दिया? राज्यसभा में शोरशराबे के बीच मायावती की इतनी ही बात सुनाई दी कि मैं आज ही इस्तीफा देती हूं और ऐसी राज्यसभा में रहने से क्या फायदा? इस्तीफा देने के बाद मायावती ने कहा कि मैंने इस देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों, मजदूरों और किसानों के हित में राज्यसभा के सभापति को इस्तीफा सौंपा है। सवाल यह है कि इसमें दलितों, पिछड़ों, मजदूरों और किसानों का कौन सा हित है, यह तो भगवान ही जानें? मायावती ने एक संवैधानिक संस्था के प्रति जिस तरह से अपने गुस्से का इजहार किया है, उससे सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि क्या वे अब दोबारा राज्यसभा में नहीं जाएंगी?

उनके लिए ज्यादा अच्छा तो यही था कि राज्यसभा में न जाकर अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करने के लिए समाज सेवा करते हुए दलितों से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर व दलित उत्पीड़न पर देशव्यापी आन्दोलन चलातीं। मगर आज के युग की अवसरवादी और सुविधाभोगी राजनीति में यह कठिन मार्ग चुनना कम ही दलित नेता पसंद करते हैं। जिस तरह से मायावती ने सोच-समझकर इस्तीफा दिया, उससे तो यही लग रहा है कि इस्तीफ़ा देने का मन वो पहले ही बना चुकी थीं। उनको बस एक बहाने की तलाश थी। जैसे किसी स्त्री को जी भरके रोने का मन करे और संयोग से पिता या भाई से भेंट हो जाए। राजनीतिक पंडित इसे राजनीति का मास्टरस्ट्रोक बताते हुए यही कह रहे हैं कि चूंकि राज्यसभा में मायावती का कार्यकाल सिर्फ़ आठ महीने ही शेष बचा था और यूपी विधानसभा में बसपा के सिर्फ 19 विधायक होने के कारण मायावती के लिए राज्यसभा में फिर से पहुंचना मुश्किल था। लालू यादव के आश्वासन के बावजूद राज्यसभा के लिए दोबारा चुने जाने को लेकर वे आश्वस्त नहीं थीं।

अब लालू यादव सहित कांग्रेस और अन्य दलों का भी समर्थन मिलने से वे पूर्णतः आश्वस्त हो गई होंगी। राज्यसभा में उनकी अगली इनिंग तो अब लगभग पक्की हो ही चुकी है। इसी बहाने दलितों के बीच फिर से अपनी साख बनाने की कोशिश भी वे करेंगी, जिसे भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ओर खींचकर उन्हें राजनीतिक रूप से लगभग पूरी तरह समाप्त कर दिया है। मायावती के प्रति दलितों के उदासीन होने की सबसे बड़ी एक वजह यह भी है कि दलित राजनीति, दलित उत्थान की जगह दलित नेताओं द्वारा अपनी निजी सम्पत्ति पैदा करने और बढ़ाने का साधन बन चुकी है। दलितों और अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले कई नेताओं पर ऐसे आरोप लगे हुए हैं, जिसमे मायावती और लालू यादव भी शामिल हैं।

दलितों की समस्याओं और उनके दुख-दर्द के बारे में कुछ और चर्चा करने से पहले इस सप्ताह की दूसरी महत्वपूर्ण घटना का जिक्र करना चाहूंगा। राष्ट्रपति चुनाव में 65.65 फीसदी मत हासिल करने वाले एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद विजयी घोषित किये गए हैं। अब यह तय हो गया है कि कोविंद ही देश के अगले राष्ट्रपति होंगे। देश के 14वें राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन्होंने सभी को धन्यवाद दिया। राष्ट्र के नाम अपने पहले सन्देश में उन्होंने किसान, मजदूर और गरीब को याद करते हुए कहा कि आज देश में ऐसे कितने ही रामनाथ कोविंद होंगे, जो इस समय बारिश में भीग रहे होंगे। कहीं खेती कर रहे होंगे, कहीं मजदूरी कर रहे होंगे। शाम को भोजन मिल जाए, इसके लिए पसीना बहा रहे होंगे। आज मुझे उनसे कहना है कि परौंख गांव का रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति भवन में उन्हीं का प्रतिनिधि बनकर जा रहा है। दलित समुदाय से जुड़े भारत के नए राष्ट्रपति की यह बात सभी देशवासियों के दिलों को छू गई, लेकिन कटु सत्य यह भी है कि दलितों की दरिद्रता उनके प्रतिनिधियों के ऊंचे पदों पर जाने मात्र से ही दूर नहीं होगी। दलितों की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, सामाजिक व आर्थिक शोषण तथा पिछड़ापन जब तक देश के राजनीतिक दलों और सरकार के लिए अहम मुद्दा नहीं बनेगी, तब तक भारत के दलितों की दरिद्रता दूर नहीं हो सकती।



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntla mishra के द्वारा
July 22, 2017

अच्छा लेख है

sadguruji के द्वारा
July 22, 2017

आदरणीय शकुंतला मिश्रा जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! लेख को सुन्दर महसूस करने के लिए धन्यवाद ! आपकी पारखी नजर ने पोस्ट को सार्थकता प्रदान की ! सादर आभार !

rameshagarwal के द्वारा
July 22, 2017

जय श्री राम आदरणीय सद्गुरुजी बहुत सुन्दर लेख,दलितों को उनके नेता लालू,माया,ऐसे लोग बेफकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे है.खुद देश को चारो तरफ से लूट रहे महाराजो की तरह रह रहे लेकिन दलितों के नाम पर वोट ले कर आरक्षण दिला कर खुद मलाई खा रहे है इसकी समीक्षा फिर से करने की ज़रुरत है.

sadguruji के द्वारा
July 23, 2017

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने बिलकुल सही कहा है कि दलितों को उनके नेता बेफकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे है.खुद देश को हर तरफ से लूट कर महाराजो की तरह से रह रहे हैं ! दलितों के नाम पर मलाई खाने वाले नेताओं के प्रति अब आम जनता को जागरूक होने और इनकी लूटपाट वाली राजनीती ख़त्म करने कि जरुरत है ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 23, 2017

आदरणीय डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी ! सादर अभिनन्दन ! ’यतीन्द्र मोहन सेनगुप्त को नमन : ब्लॉग बुलेटिन’’ में इस पोस्ट को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार ! ब्लॉग बुलेटिन वेबसाइट बहुत अच्छी आपने बनाई है ! ये निरंतर उन्नति करती रहे, यही शुभकामना है ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

Indresh Uniyal आदरणीय सदगुरु जी आपके कथन से सहमत हूँ “आज के युग की अवसरवादी और सुविधाभोगी राजनीति में ये कठिन मार्ग चुनना कम ही दलित नेता पसंद करते हैं. “

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! पोस्ट से सहमति जताने के लिये हार्दिक आभार ! नेताओं को अब तो सत्ता संपत्ती बटोरने और बढाने के लिये चाहिये, गरीबों से क्या लेना देना ! वो लोग गरीबों का हितैषी होने का दिखावा ओर ढोंग-पाखंड भर करते हैं ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. दलितों की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, सामाजिक व आर्थिक शोषण तथा पिछड़ापन जब तक देश के राजनीतिक दलों और सरकार के लिए अहम् मुद्दा बनाकर काम्करने से ही उनका कल्याण होगा. अत्यंत समसामयिक, सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका आभार.

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

आदरणीय लीला तिवानी जी ! सादर अभिनन्दन ! ब्लॉग को सटीक और सारहक महसूस करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद ! राजनैतिक दल गरीबों की लड़ाई लड़ना ही भूल गये हैं, क्योंकि अब उन्हे अफरात दौलत और सुविधा चाहिये ! इसके लिये भले ही किसी से भी हाथ मिलाना पड़े ! ब्लॉग पर समय देने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

Rajkumar kandu आदरणीय सदगुरु जी ! लेख बहुत सुन्दर लगा / आपने मायावती की राजनीति का सही विश्लेषन किया है / दलितों के नाम पर राजनीति करनेवाली मायावतीजी को दलितों का दर्द पता ही नहीं है तभी तो जब सत्ता में थी मात्र अपनी सॅंडल मंगवाने के लिये जेट विमान भेज दिया था और अभी भी उन्होने आसन रास्ता ही चुना है / आपने यह भी बिल्कुल सत्य कहा है दलितों की दरिद्रता उनके प्रतिनिधियों के उँचे पदों पर जाने मात्र से दूर नहीं होगी / सुन्दर लेखन के लिये धन्यवाद /

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दु जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! सुविधाभोगी और अवसरवादी राजनीति नेताओं पर अब इस कधर हावी हो गई है कि उन्हे झूठा और पाखंडी बना डाली है ! एक उदाहरण आपने भी दिया है ! दलितों के नेता उँचे पदों पर जाकर अपनी दरिद्रता तो दूर कर ले रहे हैं, लेकिन दलित बिचारा दरिद्र ही रह जा रहा है ! यही वजह है कि दलितों मे अब किसी एक पारेटि के प्रति पहले जैसी प्रतिबद्धता नही रह गई है ! जहा वो देख रहे हैं कि उनका भला होगा, वहीं चले जा रहे हैं ! सुन्दर ओर सटीक प्रतिक्रिया देने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

Ravi Kant दलितों को सबसे पहले दलित मानसिकता से निकलना होगा. मेरा भतीजा जो कि इंजिनियरिंग द्वितीय वर्ष में है, ने एक बड़ी विचारणीय टिप्पणी की थी. एक बार हम सड़क पर भीम राव अम्बेडकर की प्रतिमा के पास रेड लाइट पर रुके थे. मैने उसे बताया कि अम्बेडकर किस तरह से ब्राह्मणों से नजदीकी से जुड़े थे और कितने यत्न से उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाये थे. उसने गंभीर हो कर बताया कि ‘बड़े पापा, यदि ये कम पढ़े होते तो आज करोड़ों लोग पढ लिख रहे होते !’ बात सही भी है. दलित मानसिकता को बढ़ावा देने वाले मायावती समान नेता दलितों के नाम पर किस प्रकार से पैसे उड़ाती थी, यह दलितों/ गरीबों को समझना चाहिये.

sadguruji के द्वारा
July 24, 2017

आदरणीय रवि कांत जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया आपने दी है ! दलित मानसिकता से न देश का भला हो रहा है और न ही दलितों का ! दलितों मे भी पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरुकता दिनोदिन बढ रही है, लेकिन दलित मानसिकता एक तरह की हीन भावना दलितों मे पैदा कर रही है, जिससे उन्हे उबरना होगा ! नेताओं द्वारा दलितों के नाम पर लूटपाट तो ही रही है ! ब्लॉग पर समय देने के लिये सादर आभार !

Shobha के द्वारा
July 26, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी माया वती तो ड्रामा क्वीन है अब उनका सिंहासन हिल रहा है जो बचा है उसे समेटने की चिंता है

sadguruji के द्वारा
July 31, 2017

आदरणीय शोभा भारद्वाज जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ! वास्तव में ही मौजूदा समय उनके विपरीत है और अब तो बचे खुचे वोटरों को समेटे रखने की चिंता है ! सादर आभार !


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