सद्गुरुजी

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मुकेश: टूटे दिलों की आह गीतों में समाने वाले अमर गायक

Posted On: 25 Jul, 2017 Special Days में

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भारतीय संगीत इतिहास के सर्वश्रेष्‍ठ गायकों में से एक मुकेश साहब का जन्मदिन 22 जुलाई अभी कुछ रोज पहले ही बीता है। व्यस्तता की वजह से उस समय कुछ नहीं लिख पाया, लेकिन आज कुछ फुरसत मिलते ही उनके बारे में लिखने की इच्छा हुई। उनके जैसी महान शख्सियत के बारे में एक ब्लॉग में बहुत कुछ लिखना संभव नहीं है, फिर भी कोशिश कह रहा हूं। मुकेश साहब के गीत बचपन में रेडियो पर सुनाई देते थे, लेकिन गीत या गायक के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। साल 1972 की बात है, वो रेडियो का युग था। चाहे रेडियो पर कुछ भी प्रसारित हो रहा हो, बस रेडियो का बजना ही बच्चों के लिए खुश होने वाली बात होती थी। घर से बाहर तक, जहां रेडियो बजता मिलता, सुनने के लिए भीड़ जुट जाती थी। मेरी उम्र उस समय लगभग 8 साल की रही होगी. गांव के ही एक युवक को तालाब के किनारे बैठकर पानी में मिट्टी का ढेला फेंकते हुए अक्सर देखता था। गांव की औरतें तालाब के पास से गुजरतीं, तो एक नजर उस युवक पर डाल अपने आंचल से मुंह ढंककर हंसने लगती थीं। कई औरतें साथ रहतीं, तो एक-दूसरे के कान में न जाने क्या ख़ुसर-फुसर कर रहस्यमय ढंग से एक-दूसरे की तरफ देख मुस्कुराने लगती थीं। एकांतप्रेमी उस युवक के पास जाने पर उसके मुंह से हमेशा यही एक गीत सुनाई देता था।

‘हम तुझ से मोहब्बत कर के सनम
रोते भी रहे, हंसते भी रहे
खुश हो के सहे उल्फ़त के सितम
रोते भी रहे, हंसते भी रहे
हम तुझ से मोहब्बत कर के सनम…’

उसकी आवाज अच्छी थी, लेकिन उसकी कही बात मेरी बाल-बुद्धि के पल्ले कुछ पड़ती नहीं थी। बस ये समझ में आता था कि ये भैया कुछ उदास हैं। घर जाकर मां और नानी को सब बात बताता था और उनसे पूछता था कि वो भैया तालाब के किनारे बैठकर क्या गाते हैं व तालाब में ढेला क्यों फेंकते हैं? मां गंभीर होकर रहस्यमय लहजे में कहतीं, ‘मुझे मालूम है, पर तुझे बताऊंगी नहीं’। नानी से पूछता तो मुझे डांटने लगती थीं कि उसके पास क्यों जाते हो? कल से उसके पास मत जाना। छोटी मौसी से पूछता तो वो अपनी साड़ी के पल्लू से मुंह ढककर हंसते हुए कहतीं कि बड़े हो जाओगे न, तब बात समझ में आएगी, अभी क्या बताऊं, बहुत छोटे हो।

कुछ समय बाद मुझे पता चला कि गैर बिरादरी वाली किसी लड़की से उनका लगाव था, जिससे उनकी शादी नहीं हो पाई, इसलिए वो दुखी रहते थे। घरवाले मार-पीटकर जबरदस्ती अपनी बिरादरी में शादी कर दिए थे। वक्त बीतने के साथ-साथ उनके मन के घाव भरे और अंततः अपनी पत्नी को अपना लिए। मेरे मन में बहुत गहरी सहानुभूति उनके लिए थी, जो आज भी उन जैसे आदर्शवादी प्रेमियों के लिए है। मुकेश साहब के गीतों से प्रेम भी उन्हीं के माध्यम से शुरू हुआ, जो समय के साथ-साथ बढ़ता गया और परिपक्व भी हुआ। संयोग से कॉलेज के दिनों में कई आशिक मिजाज दोस्त मिल गए। साल 1986 की बात है, एक मित्र कई दिनों तक कालेज नहीं आए, तो उनका हालचाल जानने उनके घर पहुंच गया. जनाब अपने कमरे में बिस्तर पर आंखे मूंदे हुए लेटकर मुकेश के दर्दभरे गीत सुनते हुए मिले, ‘मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे के तेरा हाल क्या है, के तेरा हाल क्या है…। मैंने उन्हें झकझोरकर जगाया, तो आंखें मलते हुए उठ बैठे। टेप बंद करते हुए मैंने पूछा- आराम से बिस्तर पर लेटकर मुकेश के दर्दभरे गाने सुन रहे हो, कालेज क्यों नहीं आ रहे हो?। गहरी सांस खींचते हुए वो बोले- यार, उसने दिल तोड़ दिया। कालेज पढ़ाई सब बेकार है। अब तो भैया मुकेश ही अपना एकमात्र सहारा हैं।

मैंने उन्हें समझाया- उसी मुकेश भैया ने यह भी तो गाया है कि ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है’। उन्होंने यह भी गाया है कि ‘चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला… तेरा कोई साथ न दे तो तू खुद से प्रीत जोड़ ले, बिछौना धरती को करके अरे आकाश ओढ़ ले, पूरा खेल अभी जीवन का तूने कहां है खेला, चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला…’। मेरी बात मित्र की समझ में आई और कुछ रोज में नॉर्मल होकर कॉलेज आने लगा। घर में पिताजी रेडियो सुनने नहीं देते थे, इसलिए अक्सर अपने उसी मित्र के यहां मुकेश के गाने सुनने पहुंच जाता था। उसके पास टेप रिकॉर्डर था, इसलिए कोई भी मनपसंद गीत सुनने में आसानी होती थी। एक बार उसके यहां पहुंचा, तो एक गीत बज रहा था, ‘दिल जलता है तो जलने दे, आंसू ना बहा फ़रियाद ना कर, दिल जलता है तो जलने दे…’। मैंने मित्र से कहा कि आज केएल सहगल के गीत सुन रहे हो। उसने कहा कि भाई मेरे यह केएल सहगल का नहीं, बल्कि मुकेश का गाया हुआ गीत है। मैंने उससे वाद-विवाद करते हुए झट से शर्त लगा ली। बाद में पता चला कि यह मुकेश का गाया हुआ फिल्म ‘पहली नजर’ का गीत है। यह जानकार मुझे बहुत हैरानी हुई थी।

शर्त हारने के बाद मुकेश साहब के बारे में विस्तार से जानने के लिए एक किताब खरीदा, जिससे मालूम पड़ा कि शुरू-शुरू में मुकेश, सहगल साहब की स्टाइल में गाया करते थे। नौशाद साहब ने उन्हें अपने मौलिक अंदाज में गाने की सलाह दी। साल 1948 में फिल्म ‘मेला’ में नौशाद साहब ने मुकेश से ये गीत गवाया, ‘गाए जा गीत मिलन के, तू अपनी लगन के, सजन घर जाना है’। लोंगो ने मुकेश की सुरीली आवाज़ जब उनके अपने मौलिक अंदाज में सुनी, तो उसे बेहद पसंद किया। उसके बाद मुकेश ने सहगल साहब के अंदाज़ को एक तरफ़ रखते हुए अपने अंदाज में गाना शुरू किया और वक्त के साथ तरक्की करते हुए लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए। साल 1958 में एक फिल्म आई थी ‘यहूदी’, उसका एक गीत आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘ये मेरा दीवानापन है या मुहब्बत का सुरूर, तू न पहचाने, तो है ये तेरी नज़रों का क़ुसूर, ये मेरा दीवानापन है…’। इस गीत को मुकेश साहब ने अपनी जादुई आवाज़ से अमर बना दिया। इस गीत की रिकॉर्डिंग के समय दिलीप कुमार जिद पर अड़े थे कि इस गीत को तलत महमूद से गवाया जाए। संगीतकार शंकर जयकिशन ने उनसे अनुरोध किया कि पहले मुकेशजी को गाने दीजिये, यदि आपको नहीं पसंद आया, तो तहत महमूद जी से गवा लेंगे।

दिलीप साहब ने मुकेश की आवाज में जब इस दर्दभरे गीत को सुना, तो सन्न रह गए। वो गीत सुनकर अपनी सुध-बुध भूल गए थे, होश में आये तो मुकेश को गले लगा लिए। दिलीप कुमार अभिनय के मामले में दर्द के बादशाह यानि ट्रेजडी किंग थे, तो मुकेश आवाज के मामले में। दोनों में ऐसी गहरी दोस्ती हुई कि बहुत से गीत मुकेश ने उनके लिए गाये। राजकपूर के लिए मुकेश ने दो दशक से भी ज्यादा समय तक गाया। 1949 से इस जोड़ी ने ‘छोड़ गए बालम…, जिंदा हूं इस तरह…, रात अंधेरी दूर सवेरा…, दोस्त-दोस्त ना रहा…, जीना यहां मरना यहां…, कहता है जोकर…, जाने कहां गए वो दिन… आदि न जाने कितने यादगार गीत दिए। फ़िल्‍म फ़ेयर पुरस्‍कार पाने वाले मुकेश पहले पुरुष गायक थे। 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से मुकेश का निधन हुआ, जिसकी खबर सुनकर राजकपूर सन्न रह गए थे। उनके मुंह से बस यही निकला कि मैंने अपनी आवाज़ खो दी। टूटे दिल की आह अपने गीतों में समाकर मुकेश सदा के लिए अमर हो गए। निजी जिंदगी में मुकेश बहुत वफादार और संवेदनशील थे। जिस लड़की से प्रेम किया, उसी से विवाह भी किया। हालांकि मंदिर में सम्पन्न हुए उनके अंतर्जातीय विवाह में अंत तक बाधाएं भी बहुत सी आई थीं। बिना पैसे लिए मुकेश ने कई चैरिटेबल कार्यक्रमों में भाग लिया और पूरी ‘राम चरित मानस’ गाई। मुकेश भगवान श्रीराम के परम भक्त थे और प्रतिदिन सुबह रामचरित मानस का पाठ किया करते थे। मनोज कुमार उन्हें ‘कृपाराम’ कहते थे।



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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

Indresh Uniyal अदभुत अकल्पनीय और क्या लिखूं इस लेख के बारे में शब्द नही मिल रहे. मेरी भी बहुत सी पुरानी यादें ताज़ा होगयी. में भी मुकेश का प्रसंसक हूँ. जब पहली बार टेपरिकार्डर खरीदा तो मुकेश के गीतों की ही पहली कैसेट खरीदी शाय्द 1994 के आस पास.

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! आपने सराहना करके इस लेख को प्रस्तुत करने के उद्देश्य और परिश्रम दोनो को ही सार्थकता प्रदान की है ! इसके लिये हार्दिक आभार ! मुकेश हिन्दुस्तानियों के दिलों मे बसते हैं, तन्हाई मे और खामोश रहने वाले टूटे दिलों की तो मानो वो जुबान बन चुके हैं ! आपका टेपरिकार्डर खरीदने का अनुभव और मुकेश का प्रशन्सक होना दोनो सुखद है ! ब्लॉग पर समय देने हेतु हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

मुकेश साहब ने मुस्कुराते हुए मनोज कुमार से कहा, ‘एक फिल्म बनाने जा रहा हूँ, जिसकी कहानी मे एक बहुत बड़ी ट्रेजेडी है.’ मनोज कुमार ने बड़ी उत्सुकता से कहा, ‘सुनाइये, हम भी तो जाने कि कहानी मे कौन सी बड़ी ट्रेजेडी है?’ मुकेश साहब सोफे से उठते हुए बोले, ‘यह तो अमेरिका से आने के बाद ही बताउन्गा.’ वो अमेरिका से लौटे ही नही.

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

हृदय रोगी मुकेश साहब को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास शायद हो गया था. साल 1976 मे अपनी अंतिम यात्रा से पहले मुकेश एक दिन सुबह के समय कुर्ता पायजामा पहने हुए ही मनोज कुमार के घर पहुंच गये. अभिनेता और फिल्म निर्माता मनोज कुमार ने उनका जोरदार स्वागत किया और उन्हे घर के अंदर बैठाकर बड़े प्रेम से पूछा, ‘कहिये कृपारामजी, कैसे आना हुआ?’

Shobha के द्वारा
July 26, 2017

 श्री आदरणीय सद्गुरु जी आपके सभी लेख में निरंतर पढ़ती हूँ मुकेश के गीत उनकी अलग तरह की गम्भीर भर्राई आवाज का जबाब नहीं था सद्गुरु जी मेरी माँ बहुत वृद्ध हैं और बीमार मेरा अधिक समय उनके पास बीतता है इस लिए एक दिन सारे लेख पढ़ती हूँ अपने विचार भी संक्षेप में लिखती हूँ

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

बीमार लड़की की मां अपनी बेटी की बात सुन उदास और परेशान हो गई. वो अपनी बेटी को समझाने लगी कि मुकेश साहब बहुत बड़े और व्यस्त गायक हैं. वो तुम्हारे लिए भला समय कहाँ से निकाल पाएंगे और यदि समय निकालकर यहाँ आ भी गए तो गाने के लिए काफी पैसे मांगेंगे. हम उन्हें इतना पैसा कहाँ से देंगे? मां की बात सुन उसकी बीमार बेटी खामोश हो गई, लेकिन उस लड़की की इच्छा जब डॉक्टर को पता चली तो उसने मुकेश को फोन करके उस लड़की बीमारी और इच्छा के बारे में बताया. मुकेश अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी समय निकालकर आये और बीमार लड़की को उसकी पसंद के गीत सुनाए. उन्होंने कुछ भी पैसा नहीं लिया और लड़की को खुश देख खुश हो उठे.

sadguruji के द्वारा
July 26, 2017

दर्द भरे नगमों के बेताज बादशाह मुकेश साहब की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वो अपने गाये हुए संवेदनशील गीतों की तरह ही अपनी निजी ज़िंदगी में भी बेहद संवेदनशील इंसान थे. दूसरों के दुखदर्द को वो अपना समझते थे और उसे दूर करने का भरसक प्रयास भी करते थे. उनकी संवेदनशीलता और महानता के कई किस्से मशहूर हैं. एक बार अस्पताल में एक लड़की बहुत बीमार अवस्था में भर्ती थी. उसकी बिमारी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही थी और कोई दवा उस पर काम नहीं कर रही थी. सेवा में दिनरात लगी अपनी मां को बहुत चिंतित देख एक दिन लड़की ने अपनी मां से कहा कि मां मै ठीक हो सकती हूँ. बस आप मुकेश को बुला दीजिए. उनसे अपनी पसंद के गाने सुनूँगी और ठीक हो जाउंगी.

sadguruji के द्वारा
July 31, 2017

आदरणीय शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन और वृद्ध माता जी की सेवा में जुटे रहने के लिए बहुत बहुत बधाई ! आप उनकी सेवा करते हुए लेख लिखती हैं और बहुतों के लेख आप पढ़ती भी हैं, यह बहुत बड़ी बात है ! इसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है ! आपने सही कहा कि मुकेश के गाये गीतों का जबाब नहीं ! लेख पढ़ने के लिए हार्दिक आभार ! इधर कई रोज बिजली नहीं थी, इसलिए जबाब देर से दे पा रहा हूँ ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, भारतीय संगीत इतिहास के सर्वश्रेष् ठ गायक मुकेश साहब का बहुत सुंदर परिचय देने के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन. मुकेश कुमार की जादुई आवाज़ ने हर मूड के गाने में एक अलग रंग भर दिया है. अत्यंत सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका हार्दिक आभार.

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी ! सादर अभिनन्दन ! आप ठीक कह रही हैं कि मुकेश ने अपनी जादुई आवाज से हर मूड के गाने मे अलग अलग रंग भरा ! यही उनके गाने की एक विशेष खासियत् भी है ! पोस्ट की सराहना के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

Rajkumar kandu आदरणीय सदगुरुजी ! स्वर्गीय मुकेश जी के बारे में अति सुन्दर जनकारी पढकर बहुत अच्छा लगा / हम लोग कक्षा पांचवीं के विद्यार्थी रहे होंगे जब हमारे नजदीक के एक सिनेमाहाल में फिल्म कभी कभी लगी थी जिसमें मुकेशजी का गाया गीत कभी कभी मेरे दिल में …..काफी धूम मचा चुका था / और हम स्कूल में थे , सिनेमाहाल में वही फिल्म अभी चल ही रही थी की एक दिन उनके स्वर्गवास की खबर से मन उदास हो गया था / तब न संगीत की समझ थी और न गाने के बोल का मतलब ही समझ पाते थे फिर भी उनका गाया गीत अच्छा लगता था . बेहद सुन्दर जनकारी के लिये धन्यवाद .

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दु जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! अपने सही कहा कि बचपन मे न संगीत और न ही गाने के बोल की समझ थी, फिर भी मुकेश के गाने अच्छे लगते थे ! यही स्थिति मेरे साथ भी थी ! पोस्ट की सराहना करने के लिये और ब्लॉग पर समय देने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

Rakesh Kumar Joshi ऋषीजी , बहुत ही अच्छा व सधा हुआ ब्लॉग मुकेश जी पर लिखा | पढने मे आनन्द आया | धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

आदरणीय जोशी जी ! ब्लॉग पर स्वागत है ! ब्लॉग पढने मे आपको आनंद आया, यह जानकर खुशी हुई ! इससे इस पोस्ट को भी सार्थकता मिली ! हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

shirsh Khare बेहद सुन्दर लेख और आपके लेख के मध्यम से याद आया की सभी सदियो के महान गायक मुकेश साहेब की जन्मतिथि निकल गयी और कही कुछ पता तक नही चला मुकेश साहेब के गाने हम सभी छात्रगण अपने कॉलेज के समय मे सुनते और गुनगुनाते रहते थे मुकेश साहेब के गाने मन को शान्ती देते थे/ देते है और देते रहेंगे. आज जब कही पर कोई भी गीत सुनते है मुकेश साहेब के तो 90 के दशक मे अपने महाविध्यालय के दोस्तो के साथ बिताये हर लम्हे जीवित हो जाते है क्योकि हम सभी दोस्तो की पहली पसंद मुकेश साहेब ही थे और हर उत्सव का शुभारम्ब और समाप्ति मुकेश साहेब से ही होता था अब दोस्त देश विदेश मे बस गये और साथ रह गयी है वो सुनहरी यादे मुकेश साहेब और उनके महान गीत धन्यवाद आपका इस लेख के लिये.

sadguruji के द्वारा
August 4, 2017

आदरणीय शीर्ष खरे जी ! सादर अभिनन्दन ! आपके कालेज के अनुभव अच्छे लगे ! आपकी पुरानी यादें भी इसी बहाने ताजा हो गईं ! आज के दौर मे भी बहुत से छात्र मुकेश के गीत पसंद करते हैं ! आगे भविष्य मे भी मुकेश के गीत युवा दिलों की धडकन बने रहेंगे ! ब्लॉग पर समय देने के लिये हार्दिक आभार !


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