सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

516 Posts

5634 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 15204 postid : 1344081

तेजस्वी यादव जी, आपने क्‍यों नहीं जगाई अपनी अंतरात्मा?

  • SocialTwist Tell-a-Friend

26 जुलाई को नीतीश कुमार ने बिहार में आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस की महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिया. उसके अगले दिन 27 जुलाई को बीजेपी (NDA) की मदद से छठी बार फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए. नीतीश कुमार का कहना है कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर महागठबंधन का साथ छोड़ा है. भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोपों से घिरे लालू परिवार की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि साम्प्रदायिकता से भी ज्यादा बड़ा और गंभीर मुद्दा भ्रष्टाचार का है. उन्होंने लालू परिवार द्वारा अधिक से अधिक सम्पत्ति बटोरने के लालच पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि कफ़न में कोई जेब नहीं होती.

tejaswi

नीतीश कुमार की यू-टर्न वाली राजनीति से तिलमिलाए लालू यादव ने उन पर वार करते हुए कहा कि नीतीश ने हमें धोखा दिया है. लालू ने नीतीश कुमार को पलटूराम और सत्ता का लालची तक कह दिया. नीतीश और लालू परिवार के बीच 26 जुलाई से जारी आरोप-प्रत्यारोप का दौर अभी तक थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अंतरात्मा की आवाज़ को लालू और तेजस्वी न सिर्फ लगातार ललकार रहे हैं, बल्कि चार साल बाद फिर से उनके NDA में जाने पर कई तरह के सवाल भी खड़े कर रहे हैं.

तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार को याद दिला रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने बिहार में चुनाव के समय कहा था कि नीतीश कुमार जी का DNA ही ख़राब है. इस विषय पर अब मोदी जी की राय कैसे बदल गई? तेजस्वी यादव इतने भोले क्यों बन रहे हैं? अपने-अपने फायदे-नुकसान वाली राजनीतिक दृष्टि से विचारें, तो बड़ी सीधी सी बात है कि नीतीश कुमार ने जब NDA का साथ छोड़ा, तो लालू परिवार व कांग्रेस की राजनीतिक संगति में आकर उनका DNA खराब हो गया. अब चार साल बाद जब NDA में वापस आ गए, तो उनका DNA सही हो गया.

कई राजनीतिक दल और नेता आज के राजनीतिक दौर में NDA की तरफ भाग रहे हैं. मानो उसकी संगति राजनीतिक सफलता पाने की एक गारंटी बन चुकी हो. आम जनता के दिलों पर मोदी की जादूगरी और तमाम विपक्षी दलों पर अमित शाह की अदभुत कूटनीतिक विजय यात्रा जारी है. नीतीश पर प्रतिदिन जारी लालू और उनके बेटे का प्रहार उनकी गहरी हताशा और निराशा को जगजाहिर करता है. 2019 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की जो लालटेन लालू यादव जलाने में जुटे हुए थे, उसको जलने से पहले ही नीतीश कुमार ने बुझा दिया है.

लालू यादव ने स्पष्ट रूप से इस बात को कह ही दिया कि नीतीश ने महागठबंधन की भ्रूण हत्या की है. उस भ्रूण की ह्त्या, जिससे लालू यादव और कांग्रेस केंद्र की सत्ता हथियाने का ख्वाब देख रहे थे. एक तरफ जहाँ नीतीश कुमार ने नैतिकता की दृष्टि से NDA में वापस आने के अपने कदम को सही माना है, तो वहीं दूसरी तरफ तेजस्वी यादव ने उनकी नैतिकता और अंतरात्मा की आवाज़ पर तीख़ा वार करते हुए कहा है कि नीतीश कुमार किस नैतिकता की बात करते हैं? बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि किस नैतिकता के आधार पर पूर्व सरकार को गिराया गया? तेजस्वी यादव यहाँ तक कह गए कि नीतीश कुमार अपनी सहूलियत के मुताबिक अपनी अंतरात्मा को जगाते हैं.

यहाँ पर सवाल यह उठता है कि उन्हें भी मौका मिला था, वे अपनी अंतरात्मा को क्यों नहीं जगा पाए? बिहार की सत्ता और उपमुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ से जाने के बाद तेजस्वी यादव की छटपटाहट आम जनता की समझ में आ रही है. गुस्से में वे नीतीश कुमार पर अंतरात्मा की आवाज ठीक से नहीं सुनने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि यदि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुन उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिए होते, तो शायद नीतीश कुमार को महागठबंधन छोड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

रही बात नीतीश कुमार की, तो उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर ही 1999 में रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था, जब एक ट्रेन हादसा हुआ था. लोकसभा चुनाव में जेडीयू की जब करारी हार हुई थी, तब भी उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. नरेंद्र मोदी के एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में चुने जाने के बाद नीतीश कुमार ने NDA का साथ छोड़ दिया था, लेकिन उनकी प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात होती रही. पिछले तीन साल में उन्होंने नरेंद्र मोदी की काबिलियत को बेहतर ढंग से समझा. यही वजह है कि उन्होंने फिर से NDA में जाने का फैसला किया.

नीतीश कुमार एक अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं. उन्हें भलीभांति यह समझ में आ गया कि 2019 में पीएम पद की रेस वो कमजोर विपक्षी दलों के सहारे नहीं जीत पाएंगे और चारा व लारा घोटाले में घिरे लालू परिवार की संगति उनकी साफ-सुथरी इमेज को भी खराब करेगी. तेजस्वी यादव ने नीतीश को अपना अभिभावक, बॉस और दोस्त माना, लेकिन उनसे कुर्सी का बलिदान करना नहीं सीखा, जो कुछ समय बाद सत्ता पर फिर से भारी बहुमत से काबिज करा देती है. इस मामले में तेजस्वी यादव बहुत अनाड़ी साबित हुए.



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

Indresh Uniyal• आदरणीय सदगुरु जी बहुत ही सुन्दर लेख. वैसे नेताओं की अंतरात्मा होती ही कहाँ है? इस शब्द का दुरुपयोग वह अपनी सुविधानुसार करते है. मेरी जानकारी में राजनीति मे सबसे पहले इंदिरा जी ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हरवाने और निर्दलीय उम्मीदवार वी वी गिरि को जिताने के लिये किया था. फिर इस अंतरात्मा की आवाज को फिर से जगाने की कोशिश इस राष्ट्रपति चुनाव में मीरा कुमार ने की, अब नीतीश बाबू भी कह रहे हैं की उनकी अंतरात्मा जाग गयी. पर जब वह भ्रष्ट लालू से गठबन्धन किये थे तब अवश्य उनकी अंतरात्मा सोई हुई होगी. नीतीश कुमार जान गये है की अब वह प्रधानमंत्री नही बन सकते, उधर लालू, राबडी और उनकी पार्टी के नेता बार बार बयान दे रहे थे की अब नीतीश कुमार बूढ़े हो गये हैं और युवा तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिये. बिहार विधानसभा चुनाव में जब राजद को जेडीयू से अधिक सीटें मिली थी तब ही मैने लिख दिया था की यह गठबन्धन टूट जायेगा क्योंकि कुछ समय बाद लालू सत्ता अपने हाथ में हो यह चाहेंगे. वही हुआ भी है.

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट की सराहना के लिये धन्यवाद ! आपने बिल्कुल सही जानकारी दी है ! लालू-नीतीश के बारे मे आपका अनुमान भी सही निकला ! लेख लिखते समय भी अंतर्रात्मा वाली बात पर मुझे हंसी आ रही थी ! नीतीश पर भी बेहद गंभीर आरोप लगा हुआ है ! आपकी बात से सहमत हूँ कि नेताओं की अंतर्रात्मा होती कहन हैं ? वो अपनी सुविधानुसार पापा बदल लेते हैं ! ब्लॉग पर समय देने के लिये धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

Leela Tewani- प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, आपका यह ब्लॉग भी अत्यंत बेबाक लगा. अंतरात्मा तक पहुंचना कोई गुड़ियों का खेल नहीं है. जिसमें मनमर्ज़ी चल जाती है, ज़रा-सी नाराज़गी हुई, कि अपनी-अपनी गुड़िया ले भागे. जो अंतरात्मा तक पहुंच ही नहीं पाता, वह उसे जगाएगा कैसे? अत्यंत समसामयिक, सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका आभार.

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत सही आपने कहा है कि जो अंतरात्मा तक पहुंच ही नही पा रहे हैं, वो उसे जगाएगें कैसे ? वाकई यह कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल नही है ! ब्लॉग को बेबाक, सटीक और सार्थक महसूस करने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

Rajkumar kandu- आदरणीय सद्गुरुजी ! बहुत सुंदर व बेबाक लेख ! आपने तेजस्वी को सही नसीहत दी है । यदि उसने नीतीश से कुछ सीखा होता तो आरोप लगते ही अपना इस्तीफा दे दिया होता और जनता की सहानुभूति का फायदा उठा सकता था । सुंदर लेख के लिए धन्यवाद ।

sadguruji के द्वारा
August 6, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दु जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! तेजस्वी यादव थोड़ी बुद्धिमानी से काम लिये होते तो शायद बात बन गई होती ! राजनीति मे जनता की सहानुभूति पाने के लिये समय समय पर बलिदान देना जरूरी है, तेजस्वी यादाव को अह बात याद रखनी होगी ! पोस्ट की सराहना करने के लिये हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
August 9, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी आत्मा जगाने के लिए अंतरात्मा होनी चाहिए यह सिल्वर स्पून नहीं सोने का हीरों से जड़ा चम्मच लेकर पैदा हुए कुल दीपक हैं

sadguruji के द्वारा
August 10, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! आपने सही कहा है कि सात्विक अंतरात्मा हो तो उसे जगाने का कोई सार्थक महत्त्व है ! नेताओं की कलुषित आत्मा जागने पर भी अपना स्वार्थ और राजगद्दी ही निहारेंगी ! ब्लॉग पर समय देने के लिए सादर आभार !


topic of the week



latest from jagran