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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:- भगवान श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक सन्देश

Posted On: 12 Aug, 2017 Junction Forum में

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भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में इस वर्ष सन 2017 में 14 अगस्त को जन्माष्टमी पूरे देशभर में बड़ी धूमधाम से मनाई जाएगी. हिन्दू काल गणना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आज से लगभग 5,235 वर्ष पूर्व हुआ था. उन्होंने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय मथुरा में अवतार लिया था. उस समय संपूर्ण पृथ्वी दुष्टों की आसुरी प्रवृति एवं पतितों के भार से पीड़ित थी, जिसको ख़त्म करने के लिए इस सृष्टि में सर्वव्यापी परमात्मा ने श्रीकृष्ण के रूप में इस धरती पर जन्म लिया और साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग करते हुए इस पृथ्वी को राक्षसी प्रवृति वाले अनगिनत पापियों से मुक्त किया. उन्होंने अर्जुन के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को शाश्वत आध्यात्मिक सन्देश भी दिया. सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में प्रसिद्द महाभारत का युद्ध भी उन्ही के समय में हुआ था, जिसमे एक शांतिदूत से लेकर पांडवों के सहयोगी, धर्मोपदेशक और अर्जुन के सारथी के रूप में उन्होंने बहुत बड़ी भूंमिका निभाई थी.

‘महाभारत’ भारत का एक अनुपम, ऐतिहासिक, धार्मिक, पौराणिक और दार्शनिक काव्यग्रंथ है, जिसके अनुसार कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध से पहले श्री कृष्ण ने गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था. ‘महाभारत’ के भीष्मपर्व के अन्तर्गत एक उपनिषद् के रूप में उस संदेश को जगह दी गई है. भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले उस अनुपम और अदभुद उपदेश गीत को बाद में 18 अध्याय और 700 श्लोक के रूप में संकलित कर ‘श्रीमद्भगवद्‌गीता’ के नाम से प्रकाशित किया गया. ‘श्रीमद्भगवद्‌गीता’ हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक और सर्वश्रेष्ठ है. ‘श्रीमद्भगवद्‌गीता’ में न सिर्फ जीवन के सत्य छिपे हुए हैं, बल्कि हमारी समस्त आध्यात्मिक जिज्ञासाओं के जबाब भी हैं. इस ब्लॉग में ‘श्रीमद्भगवद्‌गीता’ के उन कुछ श्लोकों की चर्चा कर रहा हूँ, जिन पर विचार करने से हमारी बहुत सारी आध्यात्मिक जिज्ञासाओं और शंकाओं का समुचित समाधान मिल सकता है. जो लोग आध्यात्मिक प्रवृति वाले यानि सत्य की खोज में हैं, उन्हें यह ब्लॉग जरूर पढ़ना चाहिए.

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तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥4.34॥

भावार्थ : तत्वज्ञान को तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर समझ. उनको साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलता-पूर्वक प्रश्न करने से वे ज्ञानी और तत्वदर्शी (अनुभवी) महापुरुष तुझे उस तत्त्व-ज्ञान का उपदेश देंगे.

मेरे विचार से, संसार में सत्य, असत्य, पुण्य, पाप, ईश्वर, जीव और माया सभी कुछ है, उसे सही ढंग से समझना ही तत्वज्ञान है. इसी को आत्मबोध या आत्मानुभूति (Self realization) भी कहते है. भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्मबोध पाने का सबसे अच्छा तरिका यह बताया है कि किसी ऐसे तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष की खोज करो, जिन्हे जीव, माया और ईश्वर के बारे में तात्विक जानकारी हो, जो ब्रह्मज्ञानी ही नहीं, बल्कि ब्रह्मनिष्ठ भी हों. ऐसे महापुरुष यदि सौभाग्य से जीवन में मिल जाएँ तो उनका सानिध्य प्राप्त कर उनसे तात्विक ज्ञानार्जन जरूर हासिल करना चाहिए.

भगवान् श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि ऐसे महापुरुष जीवन में बहुत विरले लोंगो को ही बड़े सौभाग्य से मिल पाते हैं, इसलिए ऐसे महापुरुष यदि जीवन में कभी मिल जाएं तो उन्हें को भलीभांति साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करना चाहिए, उनकी यथासामर्थ्य सेवा करनी चाहिए और निर्मल या निश्छल मन से ज्ञानार्जन हेतु प्रश्न पूछना चाहिए. ज्ञानी और तत्वदर्शी अर्थात आध्यात्मिक रूप से अनुभवी महापुरुष जिज्ञासु या शिष्य के हर प्रश्न का अनुभूतिपरक और सही उत्तर देते हैं, जिससे उनकी मन व बुद्धि पूरी तरह से संतुष्ट हो जाती है और ईश्वर-पथ पर चलना सरल हो जाता है.

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥18/66॥

भावार्थ : संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा. मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर.

भगवान् श्रीकृष्ण का यह वचन मुझे सर्वाधिक प्रिय है. बहुत से विद्वान् महापुरुष जो गीता के इस श्लोग की व्याख्या किये हैं, उन्होंने धर्म का अर्थ कर्तव्य कर्मों से जोड़ा है, लेकिन मुझे लगता है कि इसे हिन्दू, मुस्लिम, सिख व ईसाई आदि विभिन्न मत-मतान्तरों से जोड़ के देखना चाहिए. ये बात सही है कि आज से लगभग 5000 पूर्व भगवान् कृष्ण के समय में धर्मों का वो स्वरूप नहीं रहा होगा, जिस रूप में वो आज हैं, लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि विभिन्न तरह के मत-मतान्तर उस समय भी इस संसार में थे. आज संसार के सभी प्रचलित धर्मों (विभिन्न मत-मतान्तरों) के भीतर धर्म के नाम पर जो लड़ाई-झगडे, शोषण, दुकानदारी और तमाम तरह के अन्धविश्वास व कुरीतियों का चलन जारी है, उससे संसार के सब लोग अवगत हैं.

इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि भगवान् श्रीकृष्ण यही कहना चाहते हैं कि तमाम सांसारिक धर्मों से ऊपर उठकर एक निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी परमात्मा की शरण लेनी चाहिए. जो सृष्टि में सर्वत्र व्यापक होने के साथ ही हमारे ह्रदय में भी विराजमान है. उसकी शरण लेने पर हम सभी पापों, दुखों और शोकों से मुक्त हो जाएंगे. आध्यात्म में ‘ईश्वर-प्रणिधान’ का बहुत महत्व है. ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण करने को ही ईश्वर-प्रणिधान कहते हैं, जो मोक्ष प्राप्ति हेतु बहुत जरुरी है. ‘ईश्वर-प्रणिधान’ या ईश्वर की शरण में जाने का सीधा सा अर्थ है कि जीवन में आप अपने कर्तव्य का पालन करें और सुख-दुःख, हानि-लाभ और यश-अपयश सबकुछ परमात्मा के ऊपर छोड़ दें. संसार में सुख-शान्ति से जीने का यह उत्तम मार्ग है.

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌ ॥8.12॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌ ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌ ॥8.13॥

भावार्थ : सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है॥

मेरे अनुभव के अनुसार गीता के ये सबसे अनमोल श्लोक हैं. इन श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने ऊँचे दर्जे के आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति के लिए दीक्षा देने की सही विधि बताई है. ‘ॐ’ का जाप और निराकार ईश्वर का चिंतन, यही सबसे ऊँची दीक्षा है, जिससे कोई भी व्यक्ति सरलतापूर्वक परम गति यानि मोक्ष हासिल कर सकता है. सब जानते हैं कि दीक्षा के नाम पर आज पूरे संसार में अंधेरगर्दी, लूटपाट और अनुयायी बढ़ाने की होड़ सी मची हुई है. कोई धर्मग्रंथों का पाठ करने की सलाह देता है, कोई लम्बे मन्त्र जपवाता है, कोई प्रार्थना करवाता है तो कोई रटने को ‘पांच नाम’ देता है. अपने घरों में तथा बहुत से आश्रमों में लोंगो की पूरी जिंदगी यही सब करते हुए बीत जाती है, लेकिन सच्चे आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति से या कहिये सत्य के साक्षात्कार से वो कोसो दूर रह जाते हैं.

बहुत से लोग तो अपनी कुंठा, असंतुष्टि, क्रोध, मनोविकार और गाली-गलौंज देने की प्रवृत्ति तक नहीं छोड़ पाते हैं. जाहिर सी बात है कि जीवन में वो किसी अनुभवी महापुरुष के पास जा नहीं पाए और उन्हें सही दीक्षा मिल नहीं पाई. बहुत से शिष्य लोग अपने गुरु के बारे में बिना असलियत जाने ये सोचकर बड़े खुश और मुगालते में रहते हैं कि उनके गुरु बहुत पहुंचे हुए हैं. कई आध्यात्मिक पंथों के लोग इसी बात पर बहस और लड़ाई-झगड़ा तक कर लेते हैं कि उनके पंथ के गुरु सबसे ज्यादा ऊंचाई तक पहुंचे हुए हैं. वास्तव में यह एक हास्यास्पद बात ही है. जब ईश्वर एक है तो उससे आगे कोई क्या पहुंचेगा? सही बात तो यह है कि गुरु की अनुभूति से शिष्य का आध्यात्मिक कल्याण तब तक नहीं होने वाला है, जबतक कि गुरु के अनुभव को शिष्य पा न ले. तब तक उसका सारा ज्ञान और अनुभव अधूरा है. संत पलटू साहब ने कहा है-

शिष्य शिष्य सबहिं कहें, शिष्य भया न कोय।
पलटू गुरु की वस्तु को, लखे शिष्य तब होय॥



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

Surendar Agarwal• बहुत सुन्दर लेख !! आपको व अन्य पाठकगण को जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामना ||

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

आदरणीय सुरेन्द्र अग्रवाल जी ! पोस्ट की सराहना के लिये धन्यवाद ! आपको और सभी को जन्माष्टमी पर्व की बहुत बहुत हार्दिक बधाई !

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

Rajkumar kandu- आदरणीय सद्गुरु जी ! हम जैसे सांसारिक मायाजाल में फंसे , अध्यात्म व पारलौकिक क्रियाओं से दूर रहनेवाले जातकों के लिए यह आपका आज का ब्लॉग अत्युत्तम उपहार है । इसके लिए आपकी जितनी भी प्रशंसा की जाए ,कम होगी । अति सुंदर लेख द्वारा अध्यात्म की दुर्लभ शिक्षा हेतु धन्यवाद ।

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दु जी ! ब्लॉग को पसंद करने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद ! संतों के सानिध्य मे रहकर उनकी कृपा से जो कुछ भी थोड़ा बहुत आध्यात्मिक ग्यान और अनुभव मिला है, उसे यथासामर्थ्य बांटने की कोशिश करता हूँ ! इस प्रयास मे सहयोग और समर्थन देने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

Vipin Kumar• अतिउत्तम व्याख्या। एक निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वग्य और सर्वव्यापक ईश्वर को ही भजना चाहिए। उसी की शरण में जाना चाहिए। सभी प्राणियों का वही एक परम हितैशी है।

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

आदरणीय विपिन कुमार जी ! पोस्ट को पसंद कर उसे सार्थकता प्रदान करने के लिये हार्दिक आभार ! आपने बिल्कुल सही कहा है कि सर्वव्यापी निराकार परमात्मा की शरण लेनी चाहिये, जो बाहर ही नही, बल्कि सबके भीतर भी है ! वास्तव मे वही सभी प्राणियों का परम हितैषी और सच्चा साथी है ! प्रतिक्रिया देने के लिये सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

Indresh Uniyal- आदरणीय सदगुरु जी अति उत्तम लेख के लिये धन्यवाद. भगवान श्री कृष्ण महान राजनितिज्ञ, महान रणनितिकार, महा ज्ञानी और महान योद्धा भी थे.

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! आपने सही कहा है कि भगवान श्रीकृष्ण महान राजनीतिग्य, रणनीतिकार, योद्धा और ग्यानी थे ! भगवान जब भी अपनी योगमाया या कहिये पूर्ण शक्ति के साथ अवतार लेते हैं तो उनकी सारी शक्तियाँ भी साथ रहती हैं ! लेख को पसंद करने के लिये धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

Leela Tewani- प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर बहुत सुंदर आलेख के लिए आप बधाई और अभिनंदन के पात्र हैं. ईश्वर-प्रणिधान का सैद्धांतिक और व्यावहारिक अर्थ बहुत अच्छा लगा. अत्यंत सटीक व सार्थक ब्लॉग के लिए आपका आभार.

sadguruji के द्वारा
August 13, 2017

आदरणीय लीला तिवानी जी ! श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आपको, सभी ब्लॉगर मित्रो और कृपालु पाठकों को बहुत बहुत हार्दिक बधाई ! ईश्वर-प्रणिधान या कहिये ईश्वर के समक्ष पूर्ण समर्पण ही आध्यातिम सफलता पाने का मूल आधार है ! आपने ब्लॉग को बहुत सुन्दर और सार्थक महसूस किया और सराहना की, इसके लिये हार्दिक आभार !

rameshagarwal के द्वारा
August 13, 2017

जय श्री राम आदरणीय सद्गुरु जी. सबसे पहले जन्माष्टमी पवन पर्व पर सबलोगो को हार्दिक शुभकामनाये और बधाई. प्राथना है भगवान् कृष्ण राष्ट्र को अपना आशीर्वाद प्रदान करें. कृष्ण जी की शिक्षाए बहुत ही अच्छी हैं, खास कर हमारे देश के लिए जो आतंकवाद से ग्रस्त है. भगवान् कृष्ण का एक सन्देश आतंकवादी को कभी छोड़ना नहीं चाहिए. उसे फ़ौरन मार देना चाहिए, जिससे समाज सुरक्षित हो. श्रीमदभगवतगीता विश्व के कई देशो में पढाई जाती है. हमारे देश में ऐसे ग्रंथो को महत्त्व देना चाइये और शुरू से बच्चो को पढ़ाना चाहिए. इस सुन्दर लेख के लिए बहुत साधुवाद.

rameshagarwal के द्वारा
August 13, 2017

जय श्री राम. ‘आतंकवाद छोड़ना चाहिए’ गलत लिख गए थे. कृपया ऐसे पढ़े. धन्यवाद.

sadguruji के द्वारा
August 14, 2017

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! जय श्रीराम ! सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद ! आपकी बात से सहमत हूँ कि आतंकवादियों को कभी भी फैलने-फूलने नहीं देना चाहिए. वो अपने क्षेत्र व समाज ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए घातक होते हैं ! श्रीमदभगवतगीता स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाना चाहिए, ये समाज और राष्ट्र दोनों के ही हित में है, ऐसा मेरा भी मत है ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 14, 2017

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी ! जय श्रीराम ! लिखते समय शाब्दिक त्रुटियाँ हो जाती हैं. आप उसके लिए परेशान हों, मैंने उसे ठीक कर दिया है !


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