सद्गुरुजी

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नवजात शिशु की व्यथा: जाको राखे साइयां मार सके न कोई ...

Posted On: 11 Oct, 2017 Social Issues में

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एक फूल चमन मे ऐसा खिला
जिसे माँ का मिला प्यार नहीं
फेंका गया अंधे कुँए में उसको
दिया जीने का अधिकार नहीं
वो जहरीले साँपों के बीच रहा
परंतु बाल भी बांका हुआ नहीं

लाख व्यस्तता हो, लेकिन कुछ ऐसे विषय अक्सर मिल ही जाते हैं, जिन पर लिखे बिना नहीं रहा जाता. इस ब्लॉग में एक ऐसे नवजात शिशु की चर्चा करना चाहूंगा, जिसे मजबूर माँ ने या उसके व्यथित परिजनों ने एक ऐसे अंधरे कुँए में फेंक दिया, जिसमे एक नहीं बल्कि अनेक छोटे बड़े जहरीले सांप थे. किन्तु नवजात शिशु को काटने की बजाय सांप उससे खेलते रहे और दो दिन तक उसके ऊपर रेंगते रहे. उस अबोध और अनाथ शिशु के रक्षा की जिम्मेदारी भगवान् भरोसे ही थी. भगवान् ने इस भरोसे को तोडा नहीं. सबको जीवन देने वाले भगवान् ने मौत के मुंह में फंसे और भूख से व्याकुल उस शिशु की रक्षा की. सच कहा गया गया है कि, “जाको राखे साइयां मार सके न कोई, बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय.” भगवान् की नजर में सबसे बड़ी चीज जीवन है, जो कि उसका अंश है. अपने अबोध, निराश्रित और अनाथ अंश की रक्षा करना अंशी यानि भगवान् का धर्म है. मेरे एक रिश्तेदार ने उनके गाँव में हाल ही घटी एक सच्ची घटना की जिस तरह से जानकारी दी है, उसे उसी रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.

abandoned-newborn-child-फेंका गया नवजात शिशु

नवजात शिशु किसका था, किसी महिला या अविवाहित लड़की के यौनशोषण की उपज था या मौजमस्ती की, ये भी नहीं पता, पर उसे पैदा होते ही भोर के समय एक छोटे से कपडे में लपेटकर गाँव के बाहर स्थित उस अंधे कुँए में फेंक दिया गया था, जिसमे एक नहीं, बल्कि अनेक छोटे-बड़े जहरीले सांप रहते थे. फेंकने वाले निश्चिन्त थे कि साँपों ने काटा नहीं, कि बच्चा मरा नहीं. लगभग चौबीस घंटे बाद अगले दिन भोर के समय जब लोग शौच को उस तरफ गए तो कुँए से नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनी. कुछ ही देर में गाँव में हल्ला मच गया. अंधे (सूखे) कुँए के पास भारी भीड़ इकट्ठी हो गई. गांववालों ने जब टार्च जलाकर अंधे कुँए में झांका तो उनके रोंगटे खड़े हो गए. जहरीले साँपों के बीच पड़े रोते होते हुए नवजात शिशु को देख कइयों का तो कलेजा मुंह को आ गया. गाँव के प्रधान को खबर मिली तो दौड़ते भागते हुए वो भी आ पहुंचे. कुँए में झाँकने वाली गाँव की महिलाएं बुरा सा मुंह बनाकर शिशु को जन्मदेने वाली माँ को उसकी निर्दयता के लिए गन्दी-गन्दी गालियां दे रही थीं और जीभरके उसको कोस रही थीं.

प्रधानजी जब हाथ में टार्च ले कुँए में झांके तो जहरीले साँपों को बच्चे के इर्दगिर्द रंगते देख डर के मारे उनकी घिग्घी बंध गई. कुछ देर तक मुंह से आवाज ही नहीं निकली. थोड़ी देर बाद अपने दिल की धड़कन पर काबू रख गाँव के युवकों से बोले, “इस बच्चे को जल्दी से कुँए से बाहर निकालो, बिचारा मौत के मुंह में फंसा है. कब कोई सांप काट ले, कुछ पता नहीं.” गाँव का कोई भी युवक कुँए में घुसने को तैयार नहीं हुआ. तब एक बुजुर्ग ने सलाह दी कि किसी सपेरे को बुलाया जाए. आननफानन में जल्द ही पास के गाँव में रहने वाले एक सांप पकड़ने वाले को पकड़कर लाया गया. उसके कुँए के पास आते ही प्रधान ने उससे जल्द से जल्द बच्चे को कुँए से बाहर निकालने और पुरस्कार के रूप में उसे एक हजार रूपये इनाम देने की बात कही. जब हाथ में टार्च लेकर सपेरा कुँए में झांका तो गुस्से से आगबबूला हो बोला, “एक हजार रूपये के लिए मैं इतने सारे जहरीले साँपों के बीच मरने जाऊं?” प्रधान ने उससे पूछा, “तो तू ही बता क्या लेगा?” सपेरा बोला, “पच्चीस हजार से एक रुपया कम नहीं. मंजूर हो तो बोलो नहीं तो जाऊं?”

धार्मिक प्रवृत्ति वाले और मानव जीवन को भगवान् का दिया हुआ अनमोल उपहार समझने वाले प्रधान ने सपेरे से थोड़ी देर मोलभाव किया, लेकिन पच्चीस हजार से नीचे लेने के उसके इरादे से टस से मस न होने पर अंततः एक गहरी सांस लेकर हामी भर दी. सपेरा रस्सी के सहारे कुँए में उतरा और कुछ ही देर में बच्चे को सकुशल कुँए से बाहर निकालकर प्रधान जी के हाथों में सौप दिया. प्रधान नवजात बच्चे और सपेरे को लेकर अपने घर पहुंचे. प्रधान जी का कई बेटे-बेटियों और बहुओं, पोते-पोतियों वाला भरा पूरा परिवार है. भूख से रोते विलखते नवजात शिशु को प्रधान जी ने बड़े अचरज से निहारती अपनी पत्नी के हाथों में दूध पिलाने को सौप दिया. वादे के मुताबिक़ सपेरे को पच्चीस हजार देकर प्रधानजी बिदा किये. गाँव के कई लोगों से प्रधानजी ने बच्चे को गोद लेने को कहा, पर कोई तैयार हुआ. बच्चे की किस्मत देखिये कि कुछ ही दिन बाद शहर से एक बहुत अच्छे घर के निःसंतान दम्पत्ति आये और विधिवत लिखापढ़ी करके बच्चे को गोद ले लिए. प्रधान की पहले बड़ाई करने वाले लोग अब उनकी बुराई करते हुए कहते हैं कि उसने एक लाख में बच्चे को बेच दिया. सच क्या है, ईश्वर जाने, पर प्रधानजी की तारीफ़ करते हुए मैं तो यही कहूंगा-

एक अबोध, अनाथ नन्हां सा गुल
खिला है अब किसी सूने आँगन में
सूनी गोद एक मां की सज गईं है
एक फूल गिरा है उसके आंचल में
कहने वाले अब चाहे कुछ भी कहें
लेते रहें रस, निंदा और लांछन में



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 16, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी लेख पढ़ कर मन भर आया कैसे निर्दयी लोग भी दुनियां में है सरपंच सच्चे अर्थों में सरपंच हैं

sadguruji के द्वारा
October 17, 2017

आदरणीया शोभा भारद्वाज जी ! वाकई बहुत दुखद घटना थी, लेकिन ईश्वर की कृपा से अंत सुखद हुआ ! सरपंच ने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया ! ब्लॉग पर आने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Ravinder Sudan आदरणीय सदगुरु जी,बहुत हृदयविदारक घटना से अवगत करवाने के लिये बहुत धन्यवाद. कुछ तो लोग कहेंगें लोगों का काम है कहना, लोगों ने पच्चीस हजार देते समय तो नहीं कहा की चलो हम भी योगदान दे दें, जब किसी भलेमानस ने गोदलिया तो बात बनाने वाले बातें बनाने लगे इन्हें शर्म आने के बजाय बात बनाने का कोई हक नहीं. इस तरह की घटनाएं पढ़कर मुझे सदैव एक विचार आता है. मैं कई ऐसे व्यक्तियों से मिल चुका हूँ जो 75-85 की उम्र में वृद्ध आश्रम अथवा नौकर रखकर शेष जीवन व्यतीत करते हैं. अधिकांश अपनी पेंशन (औसत 50 हजार और करोड़ों का मकान, बैंक में औसत एक करोड़) से शेष जीवन बिताते हैं. वह अपनी संपत्ती अपनी मृत्यू के पश्चात अपनी सन्तान अथवा रिश्तेदारों को नहीं देना चाहते क्योंकि वे लोग इन वृद्धों की परवाह नही करते. परंतु मैने स्वयम् उनकी मजबूरी देखी है अंत समय में उनके रिश्तेदार ही उनकी संपत्ती ले जाते हैं. मुझसे बातचीत के दौरान उनकी इच्छा थी की कोई ऐसी ईमानदार संस्था हो जो उनके पैसे को उनकी मृत्यू के पश्चात वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचा सके. परंतु अधिकांश को दान देकर धोखा मिला. यहाँ तक की मंदिर गुरुद्वार समितियों तक ने उनका पैसा हड़प लिया. एक तरफ जरूरतमंद बिना पैसों के जान गवाँ देते है दूसरी और सहायता देने वाले भी हैं पर बेईमानों के कारण नहीं देते. यदि कोई ऐसी संस्था पहल करके ऐसे दानकर्ताओं को विश्वास दिलाये की पैसा सही जगह पहुँचाया जायेगा तो जरूरतमंदों का भला हो सकता है. मैने स्वयम् 25000/ रुपया एक संस्था को एक बच्चे के ईलाज के लिये दिया था पर पैसा मिल जाने के बाद उन्होने कोई संपर्क ही नहीं किया की क्या हुआ.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीय रविन्द्र सूदन जी ! पोस्ट की सराहना के लिये धन्यवाद ! आपने हमारे समाज मे वृद्धों की चिंताजनक स्थिति जो बयान की है, वो हकीकत है ! एक बच्चे के इलाज के लिये आपने सहृदयता दिखाते हुए एक बड़ी रकम दान दी, इसके लिये साधुवाद ! संस्था को आपसे स्मपर्क करना चाहिये था ! आप स्वयं जाकर् पता कीजिये कि बच्चे का इलाज हुआ या नही ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Rajkumar kandu आदरणीय सद्गुरु जी ! बहुत ही हृदयद्रावक घटना का आपने वर्णन किया है । लेकिन उस निर्दयी मां की मौजूदगी के बावजूद हमारा समाज प्रधान जी जैसे सहृदय इंसानों से भी समृद्ध है । प्रधानजी की आलोचना करनेवालों के बारे में क्या कहा जा सकता है । आलोचना तो भगवान राम की भी हुई थी । जबकि उसकी भलमनसाहत को देखते हुए दावे से कहा जा सकता है कि प्रधान जी ने उस बेऔलाद दंपत्ति का आंगन खुशियों की किलकारी से भरने के लिए ही वह बच्चा उन्हें सौंपा होगा । बेहद सुंदर लेखन के लिए आपका धन्यवाद ।

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दुजी ! ग्राम प्रधान ने न सिर्फ बच्चे की प्राण रक्षा की, बल्कि उसे एक ऐसे घर तक पहुँचाया, जहां पर उसका पालन् पोषण निसन्देह अच्छे ढंग से होगा ! आपके सहयोग ओर समर्थन के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, लोकोक्ति जाको राखे साइयां मार सके न कोई की सत्यता को सिद्ध करने वाले इस लाजवाब ब्लॉग के लिए आप बधाई व अभिनंदन के पात्र हैं. इंसानियत से सराबोर, सटीक व सार्थक रचना के लिए आपका हार्दिक आभार.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी, पोस्ट को पसंद करने के लिये धन्यवाद !


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