सद्गुरुजी

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दिवाली: अंधेरे में जो बैठे हैं नज़र उन पर भी कुछ डालो

Posted On: 18 Oct, 2017 social issues में

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उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम
जिधर भी देखूं मैं अंधकार अंधकार
अँधेरे में जो बैठे हैं नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालों
बुरे इतने नहीं हैं हम जरा देखो हमे भा लो
अरे ओ रौशनी वालो…


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आजादी के बाद देश में सर्वत्र फैली गरीबी व भूखमरी देखकर देश के महान कवि और हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार प्रदीप जी ने ‘उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम’ शीर्षक के नाम से एक कविता लिखी थी, जिसे बाद में एक गीत के रूप में वर्ष 1969 में बनी हिंदी फिल्म ‘सम्बन्ध’ में लिया गया था. आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी हमारे देश के गरीबों की भूखमरी, बदहाली और बेकारी की समस्या में कोई बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आ पाया है. हिन्दुस्तान की अस्सी फीसदी जनता आज भी रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार जैसी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पाने के लिए दिनरात जूझ रही है. रोजगार, उन्नति और अमीरी से भरपूर जीवन पाने वाले और तमाम तरह के ऐशोआराम से भरपूर घरों में रहने वाले देश के बीस फीसदी लोग ही वस्तुतः खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं. इन रौशनी में जीने वाले बीस फीसदी लोगों का क्या ये फर्ज नहीं बनता है कि गरीबी के अँधेरे में जीने वाली देश की अस्सी फीसदी आबादी के लिए वो कुछ ऐसा करें, जिससे उन्हें रोजगार, शिक्षा और उन्नति करने का एक उपयुक्त वातावरण मिले.


कफ़न से ढँककर बैठे हैं हम सपनों की लाशों को
जो किस्मत ने दिखाए देखते हैं उन उन तमाशों को
हमें नफरत से मत देखो जरा हम पर रहम खा लो
अरे ओ रौशनी वालों
अँधेरे में जो बैठे हैं नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालों…


देश के तमाम नेता आम जनता से गरीबी दूर करने के झूठे वादे करते हैं और चुनाव जीतकर सत्ता में आते ही सारे वादे भूलकर अपनी आने वाली कई पीढ़ियों के लिए धन बटोरना और सत्ता से लम्बे समय तक चिपके रहने का मार्ग तलाशना शुरू कर देते हैं. अधिकतर गरीबों के सपने बहुत बड़े नहीं होते हैं, वो रोजगार, दो जून की रोटी, वस्त्र, सुरक्षा, एक साधारण सा मकान पाने और इज्जत से भरी जिंदगी जीने तक ही सीमित है. हिन्दुस्तान को आजादी मिले सत्तर साल हो गए, लेकिन हमारे देश-प्रदेश की सरकारें आज तक अधिकतर गरीबों के इन सपनो को साकार नहीं कर पाई हैं. केंद्र और राज्य सरकारें, जब गरीबों का भला करना हो तो खजाना खाली होने का बहाना बनाना शुरू कर देती हैं. जनता से अनेक तरह के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में तथा पेट्रोल, डीजल और दारू (शराब) आदि से अथाह धन वसूलती हैं, लेकिन उसका अधिकतर हिस्सा मंत्रियों, सांसदों, विधायकों की सेवा और अनेक तरह के सही-गलत सरकारी खर्चों की भेंट चढ़ जाता है. इन खर्चों में कटौती हो तो गरीबों का कुछ भला हो.


हमारे भी थे कुछ साथी, हमारे भी थे कुछ सपने
सभी वो राह में छूटे, वो सब रूठे जो थे अपने
जो रोते हैं कई दिन से, जरा उनको भी समझा लो
अरे ओ रौशनी वालों
अँधेरे में जो बैठे हैं नज़र उन पर भी कुछ डालो
अरे ओ रौशनी वालों…


दिवाली के अवसर पर रात के समय शहर की ओर दूर दूर तक जहाँ भी नजर जाती है, रौशनी से जगमगाते हुए एक से बढ़कर एक आलिशान भवन दिखाई देते हैं. शहर से बाहर गाँव-देहात और छोटी बस्तियों पर नजर डालिये तो अधिकतर जगहों पर गरीबी और बदहाली नजर आती है. कल हमारे पूरे शहर भर में जिस तरह से सैकड़ों करोड़ की खरीदारी हुई और हर तरह के बाजार गुलजार रहे, उससे तो यही लगा कि बाजार पर नोटबंदी और जीएसटी का कोई असर नहीं है. लोगों के पास पैसे हैं और हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी अब पूरी तरह से सही पटरी पर है. अब फिर वही अनुत्तरित यक्ष प्रश्न उठ खड़ा होता है कि जब सब कुछ सही है तो फिर हमारे देश की अस्सी फीसदी आबादी गरीबी, बेकारी और बदहाली का दंश क्यों झेल रही है? केवल सरकार के प्रयास से देश की गरीबी नहीं मिटने वाली है. देश की बीस फीसदी जो मध्यम और उच्चवर्गीय जनता है, उसकी भी जिम्मेदारी बनती है कि वो गरीबों की मदद करें और उन्हें रोजगार दें. कूड़ा फेंकने वाले बच्चों को पढ़ाने वाले देहरादून के एक सज्जन के बारे में कल पढ़ा तो बहुत अच्छा लगा.


ऐसे लोगों को सौ-सौ बार नमन. देश में ऐसी ही पहल की सख्त जरूरत है. मीडिया में छपी एक खबर के अनुसार देहरादून में आईएसबीटी के समीप इलाहाबाद बैंक शाखा में गार्ड के रूप में तैनात विजेंद्र सिंह ने सड़कों पर कबाड़ बीनने वाले 15 गरीब बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा अपने ऊपर लिया हुआ है. भूतपूर्व सैनिक विजेंद्र सिंह अपनी तनख्वाह और पेंशन का एक बड़ा हिस्सा उन गरीब बच्चों पर खर्च कर रहे हैं, जो कूड़ा बीनकर अपने घर का खर्चा चलाते हैं और जिनके मां-बाप के पास अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है. विजेंद्र सिंह इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि कबाड़ बीनकर बच्चों का एक अच्छा भविष्य नहीं बनेगा और बड़े होकर वो हमारे देश के अच्छे नागरिक भी नहीं बन पाएंगे. इसलिए वो शाम को बैंक की ड्यूटी के बाद नियमित रूप से बैंक परिसर में ही गरीब बच्चों को 2 घंटे का निशुल्क ट्यूशन देते हैं. बच्चों को स्कूली पढ़ाई पढ़ाने के साथ ही उनकी अंदरूनी प्रतिभा को निखारने के लिए वो समय-समय पर खेल, डांस और सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन भी कराते रहते हैं.


तीन वर्ष से विजेंद्र सिंह ऐसी उत्कृष्ट समाज सेवा कर रहे हैं और बच्चों के बीच वो गार्ड अंकल के रूप में मशहूर हो चुके हैं. बच्चों को किताब, कॉपी, पेंसिल और जरूरत की अन्य चीजें उनके प्यारे गार्ड अंकल ही उपलब्ध कराते हैं. विजेंद्र सिंह का मानना है कि गुजारे के लिए दो जून की रोटी हर कोई कमा लेता है, लेकिन अपने जीवन में यदि हम गरीब और बेसहारा जरूरतमंदों की कोई मदद न कर पाएं, तो हमारा जीना ही व्यर्थ है. विजेंद्र सिंह की ऊँची सोच और निःस्वार्थ भाव से की जा रही समाज सेवा को हम सैल्यूट करते हैं. सबके लिए सर्वसुलभ और निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने की झूठी डींग हांकने वाली केंद्र व राज्य सरकारों को शर्म आनी चाहिए. देश को समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिए भाई विजेंद्र सिंह जैसे महान नागरिकों की सख्त जरूरत है. सरकार को ऐसे लोगों को पुरस्कृत करना चाहिए. सही मायने में तो ऐसे लोग ही देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने के वास्तविक हकदार हैं. अंत में आप सभी को दिवाली की बहुत-बहुत बधाई.



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8 प्रतिक्रिया

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October 18, 2017

सच्चाई को बखूबी बयान किया है आपने,दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

sadguruji के द्वारा
October 19, 2017

आदरणीया शालिनी कौशिक जी ! पोस्ट की सराहना करने के लिए धन्यवाद ! आपको भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Indresh Uniyal आदरणीय सदगुरु जी दीपावली की हार्दिक शुबकामनाएं. दीपावली के अवसर पर आपने अत्यंत ही सुन्दर लेख लिख कर जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाया है. मेरे एक बड़े भई ( बुआ के लड़के) भी गरीब बच्चों को फ्री ट्यूशन पढ़ाते हैं और उन्हे किताब, कापी, पेंसिल भी अपने पास से देते हैं, मेरे बड़े भाई भी गरीब बच्चों को मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते हैं. मेरे बड़ी बहन भी गरीब बच्चो की फीस, कापी, किताब का खर्चा स्वयं उठाती है.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीय इंद्रेश उनियाल जी ! आपको भी दिवाली की हार्दिक बधाई ! इस बार कम पटाखे चले, दिये खूब जले, इसलिये दिवाली बहुत अच्छी लगी ! आपके आदरणीय भाई और बड़ी बहन बहन जी गरीब बच्चों की निस्वार्थ भाव से जो सेवा कर रहे हैं, उसके लिये उन्हे सेल्यूट करना चाहिये ! मुझे बहुत खुशी हुई ! ब्लॉग पर समय देने और पोस्ट की सराहना करने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, दीपावली की हार्दिक बधाई. देश की चिंता से सराबोर दीपावली का एक अनूठा चित्र प्रस्तुत करने के लिए अभिनंदन. अत्यंत सटीक व सार्थक रचना के लिए आभार.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी ! आपको भी दिवाली की हार्दिक बधाई ! दीपावली पर हमारे समाज के ऐसे लोंगो पर दृष्टि डालना जरूरी है, जो जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं ! यह ब्लॉग उन्हे ही समर्पित हैं ! आपने ब्लॉग को अनूठा, सटीक व सार्थक महसूस किया, इसके लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Rajkumar kandu आदरणीय सद्गुरु जी ! ब्लॉग बहुत सुंदर व आपकी देश के लिए चिंता बड़ी वाजिब लगी । यह एक विडंबना ही है कि कवि प्रदीप जी ने जो सवाल आज से पचास साल पहले उठाये थे वह आज भी बना हुआ है । आज भी गरीबी , बेरोजगारी ,अशिक्षा ,स्वास्थ्य संबंधी समस्यायें जस की तस हैं । सरकारें आती रहेंगी व जाती रहेंगी लेकिन उनको जो करना है वही करेंगी । गरीबों के लिए कुछ हो न हो माननीयों को कोई तकलीफ नहीं होना चाहिए यही सभी सरकारों की नीति है । अब बदलाव के लिए जनता को ही आगे आना होगा जैसा कि कवि जी ने अपने गीत के माध्यम से आवाहन किया है । बेहद सुंदर लेख के लिए आपको धन्यवाद । आपको व आपके समस्त हितचिन्तकों , पाठकों व परिजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीय राजकुमार कान्दु जी ! पोस्ट को पसंद करने तथा सार्थक और विचारणीय प्रतिक्रिया देने के लिये हार्दिक आभार ! आपने सही कहा है कि सरकारी नीति बस यही है कि गरीब भले ही भूखों मारते रहें, पर माननीय जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों की फ़ौज को कोई तकलीफ न हो ! आम जनता जबतक सरकारी खर्चे कम करने के लिये कोई बड़ा आन्दोलन नही करेगी, तबतक गरीबों के जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी नही होंगी ! ब्लॉग पर समय देने और दिवाली की बधाई देने के लिये हार्दिक आभार !


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