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हिन्दू धर्म त्याग कर 'बौद्ध धर्म' अपनाने की धमकी के निहितार्थ

Posted On: 27 Oct, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कुछ रोज पहले आजमगढ़ में एक रैली को संबोधित करते हुए बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की प्रमुख मायावती ने कहा, ‘मैं बीजेपी को खुली चेतावनी देती हूं कि अगर उन्होंने दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों तथा धर्मांतरण करने वाले लोगों के प्रति अपनी हीन, जातिवादी और सांप्रदायिक सोच नहीं बदली तो मुझे भी हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला लेना पड़ेगा.’ हालांकि उन्होंने इसके साथ ही यह भी कहा कि ऐसा करने से पहले वह शंकराचार्यों, धर्माचार्यों तथा भाजपा के लोगों को अपनी सोच बदलने का मौका दे रही हैं. नहीं तो उचित समय पर वह भी अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले लेंगी. हिन्दू धर्म में ही लोग ऐसी धमकी क्यों देते हैं, मुझे इस बात की हैरानी होती है. धर्म में कुछ बुराई है तो उसे दूर करो, हिन्दू धर्म छोड़ने की धमकी क्यों देते हो? राजनीतिक गलियारों में इस बात के कई कयास लगाए लगाए जा रहे हैं कि मायावती ने ऐसा क्यों कहा है. कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान दलित समुदाय के वोट के भाजपा की तरफ खिसकने के चलते ही मायावती ये एक नया राजनीतिक दांव खेल रही हैं. उनके इस दांव से हिन्दू धर्म कमजोर होगा, इसमें कोई संदेह नहीं. हिन्दू धर्म की सबसे ज्यादा फजीहत सत्तालोलुप नेताओं ने ही की है.

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बड़ी संख्या में दलितों को बौद्ध बनाकर भाजपा के दलित वोट बैंक को कमजोर करने की यह बहुत सोची समझी राजनीतिक चाल हो सकती है. मायावती कह भी रही है कि वो अकेले नहीं, बल्कि अपने करोड़ों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लेंगी. ऐसा करने से उन्हें लग रहा होगा कि धर्म परिवर्तन के बाद दलित उन्हें ही वोट देंगे और लोकसभा व यूपी विधानसभा के चुनाव के दौरान भाजपा की तरफ खिसक गया दलित वोटर वापस उनकी तरफ आ जाएगा. हालाँकि उनका ऐसा सोचना भी सत्ता पाने का अभी हसीन ख्वाब भर ही है. उनके इस कार्य से हिन्दू धर्म भले ही कितना भी कमजोर क्यों न हो और उसकी चाहे कितनी भी जगहंसाई क्यों न हो, इससे उन्हें क्या मतलब? सच बात तो यह है कि साम, दाम, भेद और दंड किसी भी तरह से सत्ता हथियाने की चाह रखने वाले नेताओं को हिन्दू धर्म के टूटने या कमजोर होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. आजमगढ़ की रैली में मायावती ने कहा, ‘बीजेपी जातीय संघर्ष करवा कर वोटबैंक की राजनीतिक चाल चल रही है.’ हालांकि उनकी यह बात भी हास्यास्पद ही है. भाजपा ने जातीय संघर्ष तो नहीं कराया है, लेकिन उसने जातीय राजनीति जरूर की है, जो कि सभी दलों के साथ साथ खुद मायावती भी कर रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप मढ़ते हुए मायावती ने कहा, ‘नए भारत के निर्माण की बात कहकर प्रधानमंत्री लोगों को गुमराह कर रहे हैं.’ प्रधानमंत्री मोदी जब नए भारत के निर्माण की बात करते हैं तो वो गरीबों और दलितों के साथ साथ सभी सवा करोड़ भारतियों के उत्थान की बात करते हैं, जबकि मायावती की सोच केवल दलितों के उत्थान तक ही सीमित है, इसलिए प्रधानमंत्री पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाना बिल्कुल बेतुका और हास्यास्पद है. बुधवार को आजमगढ़ की रैली में मायावती ने एक बड़ी मह्त्वपूर्ण बात कही कि बाबा साहब अंबेडकर ने हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था के तहत दलितों और दबे-कुचलों के साथ भेदभाव की परिपाटी को देखकर तत्कालीन शंकराचार्यों और संतों से मजहबी व्यवस्था की इन कमियों को दूर करने का आग्रह किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसी कारण अंबेडकर ने अपने निधन से कुछ समय पहले नागपुर में अपने अनुयायियों के साथ हिन्दू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया था. उनकी बात बिल्कुल सही है, लेकिन मुझे हैरानी इस बात कि है कि मायावती शंकराचार्यों से जातिप्रथा ख़त्म करने की बात क्यों नहीं कहती हैं? हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी बुराई जातिप्रथा यदि ख़त्म हो जाए तो सारे जातिगत भेदभाव भी ख़त्म हो जाएं.

जातिप्रथा ख़त्म हो जाए तो दलितों के साथ साथ हिन्दू धर्म का भी बहुत कल्याण हो. लेकिन यथार्थ की धरातल पर देखें और जांचे-परखें तो यही जबाब मिलेगा कि जातीय व्यवस्था के तवे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वाले नेता भला कब चाहेंगे कि जातिप्रथा ख़त्म हो. रही बात शंकराचार्यों की तो सब शंकराचार्य सवर्ण जाति के हैं. वो जातिप्रथा ख़त्म कर अपना ऐशोआराम और रूतबा भला क्यों कम करना चाहेंगे? उन्हें मानने और सम्मान देने वाले अधिकांशत: लोग ऊँची जाति के ही मिलेंगे. जमीनी सच्चाई यही है कि जातीय व्यवस्था का लाभ लेने वाले दलित भी जातिप्रथा नहीं छोड़ना चाहेंगे. वो बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी दलित ही कहलाना पसंद करेंगे. सारे दलित बौद्ध धर्म अपना लेंगे, ऐसा भी संभव नहीं है. कई राजनीतिक पंडित ये मान रहे हैं कि बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने की बात कहकर मायावती एक तरह से बीजेपी को ब्लैकमेल करना चाहती हैं और उससे कोई गुप्त समझौता कर कुछ विशेष लाभ लेने की फिराक में हैं. आज के दौर में जो सत्तालोलुप राजनीति चल रही है, उसमे यह भी संभव है. अंत में मैं हिन्दुओं से यही कहूंगा कि वो जागरूक हो, संगठित हों और जातीय भेदभाव भुला कर आपस में एक दूसरे का सहयोग और सम्मान करें.



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
October 28, 2017

जातिप्रथा ख़त्म हो जाए तो दलितों के साथ साथ हिन्दू धर्म का भी बहुत कल्याण हो. लेकिन यथार्थ की धरातल पर देखें और जांचे-परखें तो यही जबाब मिलेगा कि जातीय व्यवस्था के तवे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वाले नेता भला कब चाहेंगे कि जातिप्रथा ख़त्म हो. — कई राजनीतिक पंडित ये मान रहे हैं कि बौद्ध धर्म में परिवर्तित होने की बात कहकर मायावती एक तरह से बीजेपी को ब्लैकमेल करना चाहती हैं और उससे कोई गुप्त समझौता कर कुछ विशेष लाभ लेने की फिराक में हैं. आज के दौर में जो सत्तालोलुप राजनीति चल रही है, उसमे यह भी संभव है. अंत में मैं हिन्दुओं से यही कहूंगा कि वो जागरूक हो, संगठित हों और जातीय भेदभाव भुला कर आपस में एक दूसरे का सहयोग और सम्मान करें. बिलकुल सही कहा है आपने आदरणीय सद्गुरु जी, हिन्दू धरम से जाति प्रथा और उंच नीच कभव खत्म हो जाय तो हिन्दुओं को कोई नहीं हरा सकता पर …आप तो सब जानते हैं… आपने बेहतर मुद्दा उठाया है जिस पर सभी को विचार करना ही चाहिए! सादर!

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

मैं हिन्दुओं से यही कहूंगा कि वो जागरूक हो, संगठित हों और जातीय भेदभाव भुला कर आपस में एक दूसरे का सहयोग और सम्मान करें.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

जमीनी सच्चाई यही है कि जातीय व्यवस्था का लाभ लेने वाले दलित भी जातिप्रथा नहीं छोड़ना चाहेंगे. वो बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी दलित ही कहलाना पसंद करेंगे. सारे दलित बौद्ध धर्म अपना लेंगे, ऐसा भी संभव नहीं है.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

सब शंकराचार्य सवर्ण जाति के हैं. वो जातिप्रथा ख़त्म कर अपना ऐशोआराम और रूतबा भला क्यों कम करना चाहेंगे? उन्हें मानने और सम्मान देने वाले अधिकांशत: लोग ऊँची जाति के ही मिलेंगे.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

जातिप्रथा ख़त्म हो जाए तो दलितों के साथ साथ हिन्दू धर्म का भी बहुत कल्याण हो. लेकिन यथार्थ की धरातल पर देखें और जांचे-परखें तो यही जबाब मिलेगा कि जातीय व्यवस्था के तवे पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने वाले नेता भला कब चाहेंगे कि जातिप्रथा ख़त्म हो.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

Leela Tewani प्रिय ब्लॉगर सद्गुरु भाई जी, आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. सब लोगों के जागरुक होने, संगठित होने और जातीय भेदभाव भुला कर आपस में एक दूसरे का सहयोग और सम्मान करने से ही देश आगे बढ़ सकेगा. अत्यंत समसामयिक, सटीक व सार्थक रचना के लिए आभार.

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीया लीला तिवानी जी ! संत लोग कहते हैं कि ‘जातपात पूछे नही कोई, हरि को भजे सो हरि का होइ.’ संतों की इसी वाणी को हिन्दू धर्म का मूल आधार बनाने की जरूरत है ! पोस्ट को सटीक और सार्थक महसूस करने के लिये हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 31, 2017

आदरणीय सिंह साहब ! सादर अभिनन्दन ! पोस्ट से सहमति के लिए धन्यवाद ! कोई नहीं चाहता है कि जातिप्रथा ख़त्म हो ! सब उसका मजा ले रहे हैं और उसके दुष्परिणाम भी भोग रहे हैं ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
October 31, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी उत्तम लेख कई प्रश्न उठाता लेख बौद्ध धर्म माया वती जी को कहाँ समझ में आएगा आज धर्म का इस्तेमाल भी राजनीती के लिए होता है तथागत भिक्षा मांगते कपिल वस्तु पधारे पिता ने स्वागत में कालीन बिछवा दिए युवराज की तरह स्वागत सबसे पहले भगवान बुद्ध ने इशारे से अपने शिष्य आनन्द से कहा इन्हें हटाए महल में पहुंचे यशोधरा दिखाई नहीं दी समझ गये जाते समय उनसे मिल कर नहीं गये थे य्शोद्रा के कक्ष में पहुंचे यशोधरा उनके चरणों में बैठ गयी तथागत ने भिक्षा का पात्र आगे बढाया सर झुका कर यशोधरा ने एकलौते पुत्र राज बंश के उत्तराधिकारी को भिक्षा पात्र में डाल दिया इच्छित भिक्षा पाकर बुद्ध पुत्र की ऊँगली पकड़ कर चल दिए कहाँ महान दर्शन कहाँ यह नेता

sadguruji के द्वारा
November 1, 2017

आदरणीय डॉक्टर शोभा भारद्वाज जी ! सादर अभिनन्दन ! बहुत सुन्दर और पठनीय प्रतिक्रिया आपने दी है ! महात्मा बुद्ध और सत्ता के लोभी नेताओं में जमीन-आसमान का अंतर है ! बुद्ध का पूरा परिवार त्यागी और तपस्वी था ! सत्ता और सांसारिक सुख के भोगी नेता भला उस त्याग और तपस्या का मर्म क्या जाने ! उन्होंने ने तो बौद्ध धर्म को लोंगो को बरगलाकर राजनीति करने का माध्यम बना लिया है ! ब्लॉग पर समय देने के लिए हार्दिक आभार !


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