सद्गुरुजी

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हमारी शिक्षा व्यवस्था तालिबानी शिकंजे से बाहर कब निकलेगी?

Posted On: 19 Nov, 2017 न्यूज़ बर्थ में

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तन कोमल मन सुन्दर, हैं बच्चे बड़ों से बेहतर
इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं
भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं
इनकी नज़रों में एक हैं, मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे
बच्चे मन के सच्चे सारी जग के आँख के तारे
ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे

मासूम बच्चों के बारे में साहिर लुधियानवी साहब ने फिल्म ‘दो कलियाँ’ के उपरोक्त गीत में वो सबकुछ कह दिया है जो छोटे बच्चों की सबसे बड़ी खासियत होती है. धर्म, भाषा और मंदिर-मस्जिद के नाम पर आपस में लड़ने वाले और सोशल मीडिया के जरिये समाज में वैमनस्य फैलाने वाले लोगों को सदभाव, भाईचारे और बिना किसी भेदभाव के सबसे प्रेम करने के रूप में ईश्वर की सहज सुलभ निकटता आदि के मामले में मासूम बच्चों से सबक हासिल करना चाहिए. अपने को सभ्य, सुशिक्षित और समझदार समझने वाले स्कूल के प्रबंधक और शिक्षित व बुद्धिजीवी कहलाने वाले स्कूल के टीचर मासूम बच्चों के साथ कैसा अमानवीव, असभ्य और खतरनाक व्यवहार कर रहे हैं, आज इसी विषय पर चर्चा करूंगा. सरकारी स्कूलों के जर्जर भवन व मुफ्त वाली पढाई की हालत इतनी ख़राब है कि अधिकतर बच्चे सरकारी स्कूल की बजाय अंग्रेजी माध्यम वाले निजी स्कूलों में पढ़ते हैं. हमारे गाँव के ज्यादातर घरों में बच्चों को पढ़ाने वाला वाला कोई है ही नहीं. अधिकतर घरों की औरतें अशिक्षित हैं. बच्चों के पिता कहीं जाकर दिनभर मजदूरी करते हैं.

किसी घर में कुछ पढ़ा-लिखा कोई बड़ा भाई है तो उसे जुआ खेलने और दारु पीने से ही फुर्सत नहीं है. एलकेजी और यूकेजी में पढ़ने वाले छोटे-छोटे मासूम बच्चों को भारी भरकम बैग पीठ पर लादकर ट्यूशन पढ़ने के लिए जाते हुए देखता हूँ तो भारत की शिक्षा व्यवस्था पर मुझे बहुत अफ़सोस होता है. एक तो तोते जैसी रट्टामार बेहद बुरी शिक्षा और दूसरे स्कूल से लेकर ट्यूशन (गृहशिक्षण) तक में मास्टरों के जुल्मोसितम. भय के साये में जीते मासूम बच्चों की ढेर सी खूबियां और उनके भीतर स्थित नैसर्गिक प्रतिभा ऐसे ख़राब माहौल में भला क्या विकसित होंगी? हमारे देश में तो पूर्वजन्म के संस्कारों और भगवान् के भरोसे ही अधिकतर प्रतिभाएं निखरती हैं. शिक्षा को कमाई का जरिया भर समझने वाले स्कूलों और बच्चों की समस्याओं से पूर्णतः बेखबर केंद्र व राज्य सरकारों की भूमिका नाममात्र भर की है. केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Central Board of Secondary Education या सीबीएसई) द्वारा सीधे संचालित केन्द्रीय विद्यालय और सरकारी विद्यालय उसके सभी नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं.

लेकिन उससे जुड़े देशभर के लगभग छह हजार स्वतंत्र विद्यालय क्या कर रहे हैं, क्या इस बात की सीबीएसई को जानकारी है? जब किसी निजी स्कूल में प्रद्युम्‍न हत्‍याकांड जैसा केस हो जाता है, तभी कुछ देर के सीबीएसई जागती है और उपदेश देकर फिर सो जाती है. निजी स्कूलों के मामले में सीबीएसई की कार्यप्रणाली ठीक वैसी ही है, जैसे कोई ढेर सारे बच्चे पैदा करके उन्हें सड़कों पर भगवान् के भरोसे जीने-मरने को लावारिश छोड़ दे. सीबीएसई से जुड़े हुए देशभर के सारे निजी स्कूल अभिभावकों से न सिर्फ मनमानी फ़ीस वसूल रहे हैं, बल्कि मासूम बच्चों को बुरी तरह से शारीरिक व मानसिक रूप से टॉर्चर (प्रताड़ित) भी कर रहे हैं. लेकिन उनके खिलाफ न तो सीबीएसई कोई कार्यवाही कर रही है और न ही केंद्र या राज्य सरकार. सीबीएसई के नियमों के मुताबिक़ बच्चों को मारना, डांटना अथवा किसी भी तरह से उन्हें अपमानित करना सख्त मना है और इस नियम का पूरी तरह से पालन उससे जुड़े केंद्रीय और सरकारी विद्यालय कर रहे हैं, लेकिन सीबीएसई से संबद्ध निजी स्कूल इस नियम की पूरी तरह से धज्जियां उड़ा रहे हैं.

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मैंने निजी स्कूलों में एलकेजी और यूकेजी में पढ़ने वाले कुछ मासूम बच्चों से बात की. मैंने उनसे पूछा कि क्या आपके स्कूल में टीचर मारते हैं? सब बच्चों ने कहा कि हाँ मारते हैं. सारे टीचर मारते हैं. सबसे ज्यादा तो प्रिंसिपल मैडम मारती हैं. स्कूल के प्रबंधक भी मारते हैं. मैंने एक बच्चे से पूछा कि आपके टीचर क्यों और कैसे मारते हैं? उस बच्चे ने बताया कि टीचर थोड़ा सा पढ़ाती हैं और देर सारा होमवर्क देती हैं. जो बच्चे होमवर्क करके नहीं ले जाते हैं, टीचर उन्हें देर तक खड़ा रखती हैं और फिर जब बच्चे थक जाते हैं तो बहुत जोर-जोर से उनके गाल पर थप्पड़ मार मार कर बैठाती जाती हैं. बच्चों को टीचर किस चीज से मारते हैं? यह पूछने पर ज्यादातर मासूमों ने बताया कि थप्पड़ से गाल, पीठ और सर पर मारते हैं. कुछ ने कहा कि हमारे स्कूल में थप्पड़ और मुक्के के अलावा स्केल और छड़ी से भी मारते हैं. मुझे उनकी बातों में पूरी सच्चाई नजर आई, क्योंकि एक तो मासूम बच्चे झूठ नहीं बोलते हैं. और दूसरे जब मेरी बेटी साढ़े तीन साल की थी और एलकेजी में पढ़ती थी, तब उसे उसकी टीचर ने मारा था.

जब कई बार टीचरों ने मेरी बेटी को मारा तब स्कूल के प्रबंधक से मैंने साफ-साफ़ कहा कि मैं आपके टीचरों और स्कूल के खिलाफ केस करने जा रहा हूँ. यह सुनते ही उनके होश ठिकाने आ गए. मेरी बच्ची जहाँ बैठती थी, वहां दीवाल पर लिखवा दिया, ‘इसे मारना नहीं.’ स्कूल के पढ़ेलिखे बुद्धिजीवी प्रबंधक बच्चों को मारने को प्रसाद देना कहते हैं और इसे जरुरी मानते हैं. स्कूल के प्रबंधक की जब ऐसी तालिबानी सोच होगी तो कम वेतन पर रखे जाने अप्रशिक्षित टीचरों की सोच क्या होगी, जिन्हे पढ़ाना कम और मारना ही ज्यादा आता है. सीबीएसई यदि हर निजी स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगना अनिवार्य कर दे तो इनकी सब पोलपट्टी खुल जाएगी. सीबीएसई के सुझाव देने पर भी निजी स्कूल सीसीटीवी कैमरे नहीं लगवा रहे हैं. केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड इसे अनिवार्य करे और बच्चों के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी करे, जिसे पर बच्चे टॉर्चर की शिकायत कर सकें. निजी स्कूलों की मनमानी फ़ीस वसूली पर भी सीबीएसई अंकुश लगाए. निजी स्कूलों से मिलीभगत के कारण सरकार तो कुछ करने से रही.

देशभर के वो सभी निजी स्कूल जो अभिभावकों से मनमानी फ़ीस वसूल रहे हैं और मासूम बच्चों को बुरी तरह से शारीरिक व मानसिक रूप से टॉर्चर (प्रताड़ित) कर रहे हैं, उनकी मान्यता न सिर्फ रद्द होनी चाहिए, बल्कि उनके खिलाफ सख्त क़ानूनी कार्यवाही भी होनी चाहिए. राज्य सरकारों द्वारा संचालित प्राइमरी स्कूलों में भी बच्चों को टीचर थप्पड़, मुक्का, स्केल और डंडे से पीटते हैं. कुछ दिनों पहले दिल्ली के नगर निगम के एक स्कूल में पांचवीं में पढ़ने वाले एक मासूम को टीचर ने समर्सिबल पम्प वाले पानी के पाइप से पीटा था. बच्चे के शरीर पर जख्मों के लाल निशान उभर आए थे और उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था. बच्चे की गलती महज इतनी थी कि मासूम होमवर्क को रफ कॉपी के बजाय स्कूल की कॉपी में कर लाया था. टीचर की मार से डरा सहमा बच्चा अब स्कूल ही नहीं जाना चाहता है. सबसे बड़ी अफ़सोस की बात यह है कि स्कूल प्रशासन से टीचर की बेरहमी की शिकायत करने पर भी बेरहम टीचर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.

पिछले साल समस्तीपुर के एक सरकारी स्कूल में तैनात एक शिक्षक ने दलित बच्ची को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया था. कक्षा दो में पढ़ने वाली बच्ची को दोपहर के समय स्कूल में मिलने वाली खिचड़ी खाने के बाद क्लास में नींद आ गयी थी. जिससे नाराज शिक्षक ने बच्ची को क्लास से बाहर निकालकर डंडे से इतनी पिटाई की कि मासूम बेहोश होकर गिर पड़ी. पिटाई से बच्ची के दाएं हाथ की हड्डी टूट गई थी. भाजपा की केंद्र सरकार से बड़ी उम्मीद थी कि वो प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कोई बड़ा सुधार करेगी और उसे तालिबानी शिकंजे से बाहर निकलेगी, शिक्षा के नाम पर देश के भविष्य से हो रहा खिलवाड़ रोकेगी, लेकिन उसने इस मामले में अभी तक तो देशवासियों को निराश ही किया है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का भी वही हाल है. एक तरफ जहाँ बच्चे स्कूलों में सुरक्षित नहीं हैं, अध्यापकों द्वारा शारीरिक-मानसिक रूप से प्रताड़ित किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ निजी स्कूलों की मनमानी फ़ीस वसूली से अभिभावक भी बेहद परेशान हैं. सरकार तो कुछ करने से रही, अभिभावकों को ही एकजुट हो संघर्ष करना पडेगा.



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 25, 2017

श्री आदरणीय सद्गुरु जी सार्थक लेख शिक्षा का यह हाल है जिस समय सेशन खत्म होने के बाद फीस ली जाती है पेरेंट्स के हाल बेहाल होते हैं बहुत मजबूरी में खरीददारी करने निकलते हैं एडमिशन में बच्चे की कैपेबिलिटी से अधिक माता पिता कितने पढ़े हैं उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है हमारे परिवारों के बच्चे पढ़ रहे हैं समझ लीजिये एक बच्चे को जन्म देने के बाद दूसरे का खर्च वहन न करने में अपने को लाचार महसूस करने लगते हैं अत : आम घरों में एक ही बच्चा नजर आता है उत्तम लेख सरकारी स्कूलों की हालत क्या लिखूँ एक क्लास में जरूरत से अधिक एडमिशन करने पड़ते हैं


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